लव-कुश राजनीति में सरनेम बदलकर कुशवाहा बने थे उपेंद्र, सम्राट चौधरी चमके तो गिरा भाव!

लाइव हिन्दुस्तान, पटना
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Upendra Kushwaha News: रालोमो अध्यक्ष का नाम पहले उपेंद्र प्रसाद सिंह था। लव-कुश राजनीति में सरनेम बदलकर उपेंद्र कुशवाहा बने थे। लेकिन, सम्राट चौधरी के चमकने के बाद उनकी पूछ में आ रही कमी अब दिखने लगी है।

लव-कुश राजनीति में सरनेम बदलकर कुशवाहा बने थे उपेंद्र, सम्राट चौधरी चमके तो गिरा भाव!

Upendra Kushwaha News: राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद उपेंद्र हमेशा से कुशवाहा नहीं लिखते थे। 2000 के विधानसभा चुनाव में जब वह जन्दाहा से समता पार्टी के टिकट पर पहली बार विधायक बने थे, तब उनका नाम उपेंद्र प्रसाद सिंह था। वैशाली जिले के जन्दाहा में माता-पिता के नाम पर बने मुनेश्वर सिंह मुनेश्वरी समता कॉलेज में शिक्षक रहे उपेंद्र ने लव-कुश राजनीति के लिए प्रसाद सिंह को हटाकर नाम में स्पष्ट कोइरी सरनेम कुशवाहा जोड़ा था। कहते हैं कि बिहार में लव-कुश की राजनीति पर सवार होकर छा गए पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ही उपेंद्र प्रसाद सिंह को सरनेम बदलकर उपेंद्र कुशवाहा बन जाने की सलाह दी थी।

बिहार की राजनीति में लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) राजनीति के सूत्रधार रहे नीतीश कुमार और शकुनी चौधरी की जोड़ी टूटने के बाद कुशवाहा राजनीति में नीतीश कुमार ने उपेंद्र को आगे बढ़ाया। तब से कुश का राजनीतिक वजन उपेंद्र कुशवाहा लेकर चलते रहे। उपेंद्र कुशवाहा जब नीतीश कुमार से अलग हुए तो नीतीश कुमार ने वैशाली से ही उमेश कुशवाहा को आगे बढ़ाया, लेकिन वो उपेंद्र जैसी पहचान और ताकत नहीं हासिल कर सके।

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मजबूरी में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कोइरी वोटरों को एनडीए गठबंधन के साथ जोड़े रखने के लिए लंबे समय तक कुशवाहा को भाव दिया है। लेकिन शकुनी के बेटे सम्राट चौधरी के चमकने से उपेंद्र कुशवाहा का भाव लगातार घट रहा है। डिप्टी सीएम और फिर सीएम बनने के बाद कोइरी समेत पिछड़ी जातियों के बीच सम्राट चौधरी का वजन और ताकत बढ़ा है। बीजेपी को कोइरी वोट के लिए आगे उपेंद्र की बहुत जरूरत नहीं है। उपेंद्र के बेटे दीपक प्रकाश को एमएलसी नहीं बनाने के पीछे भाजपा का यही आत्मविश्वास है।

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बिहार में भाजपा ने नीतीश की बनाई गैर यादव पिछड़ा और अति पिछड़ा की राजनीतिक जमीन पर खुद का ऐसा कोइरी नेता खड़ा कर लिया है, जो सबसे ताकतवर आदमी है और आक्रामक राजनीति भी करता है। सम्राट चौधरी के पीछे जाति-बिरादरी के लोग लामबंद हो चुके हैं। एक वह दौर भी था, जब उपेंद्र कुशवाहा के साथ राजनीतिक ऊंच-नीच होने पर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया की बाढ़ आ जाती थी। एक यह दौर भी है, जब उनके बेटे दीपक प्रकाश का मंत्री पद जाने की उलटी गिनती चल रही है और छिटपुट चर्चा हो रही है। भाजपा के दरबार में उपेंद्र कुशवाहा का वोल्टेज घटने का जो दौर अब शुरू हुआ है, वो कहां जाकर रुकेगा, ये तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन सम्राट चौधरी ने लव और कुश की राजनीति के एक खंभे से बाकी नेताओं को उतारना शुरू कर दिया है।

कभी नई पार्टी, कभी विलय; यहां-वहां की चंचल राजनीति से उपेंद्र कुशवाहा की धार हुई कमजोर

उपेंद्र कुशवाहा सज्जन छवि के बावजूद चंचल राजनीति की वजह से अपनी साख खोते गए। जनता दल से समता पार्टी, फिर अपनी पार्टी, फिर नीतीश के बुलाने पर जेडीयू में विलय, फिर अलग होकर नई पार्टी। नीतीश ने कुशवाहा को विधानसभा में नेता विपक्ष तक बनाया, लेकिन वो उनके साथ भी लंबी पारी नहीं खेल सके। 2013 में जेडीयू से निकलकर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) बनाई, जिसका नीतीश के बुलावे पर 2021 में विलय करके जेडीयू संसदीय बोर्ड अध्यक्ष बने। फिर 2023 में अलग हो गए और राष्ट्रीय लोक जनता दल बना लिया। वही पार्टी अब राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नाम से चल रही है।

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चार दशक के राजनीतिक सफर में उपेंद्र कुशवाहा बिहार के दोनों प्रमुख गठबंधन के साथ रह चुके हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब नीतीश भाजपा के खिलाफ लड़ रहे थे, तब कुशवाहा एनडीए के साथ थे। नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री बने। लेकिन जब नीतीश ने 2017 में एनडीए में वापसी की, कुशवाहा बेचैन होकर एक साल में निकल गए। 2019 का लोकसभा चुनाव विपक्षी महागठबंधन के साथ लड़े। 2020 का विधानसभा चुनाव एनडीए और महागठबंधन से अलग मायावती और ओवैसी के साथ तीसरा गठबंधन बनाकर लड़े। फिर थक-हारकर 2024 के चुनाव से पहले भाजपा के पास लौटे और एनडीए में तब से टिके हैं। 2014 में जिस बीजेपी ने उनको 3 सीट दी, उसी ने 2024 में 1 सीट पर समेट दिया।

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लंबे समय तक एक जगह नहीं टिक पाना कुशवाहा की कमजोरी है, जिसका उन्हें कभी फायदा मिला है और कभी नुकसान हुआ है। दीपक को एमएलसी नहीं बनाने के बाद उपेंद्र ने आक्रामक तेवर दिखाते हुए बेटे के इस्तीफा से इनकार करके गेंद भाजपा के पाले में डाल दिया है। लेकिन, बिहार में भाजपा का रथ अब सम्राट चौधरी खींच रहे हैं। भाजपा दीपक प्रकाश के साथ आगे जो करती है और जैसा करती है, उसमें सम्राट चौधरी के असर और उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक भविष्य का संकेत छुपा होगा।

Ritesh Verma

लेखक के बारे में

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रीतेश वर्मा पत्रकारिता में 25 साल से अलग-अलग भूमिका में अखबार, टीवी और डिजिटल में काम कर चुके हैं। दैनिक जागरण के साथ बिहार में 5 साल तक जिला स्तर की प्रशासनिक और क्राइम रिपोर्टिंग करने के बाद रीतेश ने आईआईएमसी, दिल्ली में दाखिला लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई की। एक साल के अध्ययन ब्रेक के बाद रीतेश ने विराट वैभव से दोबारा काम शुरू किया। फिर दैनिक भास्कर में देश-विदेश का पेज देखा। आज समाज में पहले पन्ने पर काम किया। बीबीसी हिन्दी के साथ आउटसाइड कंट्रीब्यूटर के तौर पर जुड़े। अखबारों के बाद रीतेश ने स्टार न्यूज के जरिए टीवी मीडिया में कदम रखा। रीतेश ने टीवी चैनलों में रिसर्च डेस्क पर लंबे समय तक काम किया है और देश-दुनिया के विषयों पर तथ्यपरक जानकारी सहयोगियों को आगे इस्तेमाल के लिए मुहैया कराई है। सहारा समय और इंडिया न्यूज में भी रीतेश रिसर्च का काम करते रहे। इंडिया न्यूज की पारी के दौरान वो रिसर्च के साथ-साथ चैनल की वेब टीम के हेड बने और इनखबर न्यूज पोर्टल को बतौर संपादक शुरू किया। लाइव हिन्दुस्तान के साथ एडिटर- न्यू इनिशिएटिव के तौर पर पिछले 6 साल से जुड़े रीतेश फिलहाल उत्तर प्रदेश और बिहार की खबरों और दोनों राज्यों की टीम को देखते हैं। और पढ़ें
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