सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले में उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश जैसे मंत्री अवैध, हटवाने के लिए PIL दाखिल

लाइव हिन्दुस्तान, पटना
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Deepak Kushwaha Supreme Court PIL: उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश के MLC नहीं बनने से मंत्री पद पर पैदा संकट सुप्रीम कोर्ट में एक PIL से गहरा गया है। कोर्ट ने पुराने फैसले में ऐसे मंत्री को अवैध माना था।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले में उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश जैसे मंत्री अवैध, हटवाने के लिए PIL दाखिल

Deepak Prakash Kushwaha Supreme Court PIL Case: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा विधान परिषद चुनाव में नजरअंदाज कर दिए गए राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश कुशवाहा का मंत्री पद गंभीर संकट से घिर गया है। छह महीने की समय-सीमा के अंदर विधायक या एमएलसी नहीं बनने के बाद भी दीपक प्रकाश को दोबारा सम्राट चौधरी की सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर हो गई है। पीआईएल दायर करने वाले राकेश कुमार सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय की डबल बेंच के एक पुराने फैसले के आधार पर दीपक प्रकाश को फिर से मंत्री बनाने को चुनौती दी है। MLC बनकर सदन में पहुंचने का मौका चूक गए दीपक के त्यागपत्र से कुशवाहा ने यह कहनकर इनकार कर दिया है कि एक महीना ही हुआ है, वो क्यों इस्तीफा देगा।

उपेंद्र कुशवाहा गैर-सदस्यों के मंत्री बनने पर 6 महीने के अंदर किसी सदन में पहुंचने के नियम को 7 मई 2026 से जोड़ रहे हैं, जब सम्राट कैबिनेट के विस्तार में दीपक को दूसरी बार मंत्री बनाया गया था। इससे पहले दीपक प्रकाश कुशवाहा पूर्व सीएम नीतीश कुमार की सरकार में 20 नवंबर 2025 से 15 अप्रैल 2026 तक पहली बार मंत्री रह चुके थे। नीतीश ने सरकार के 6 महीने पूरे होने से पहले ही राज्यसभा सांसद बनने के लिए इस्तीफा दे दिया और कैबिनेट ही भंग कर दी। नीतीश सरकार ही चल रही होती तो 20 मई को दीपक के 6 महीने के अंदर सदन पहुंचने की मियाद खत्म हो जाती।

पंजाब में गैर-विधायक को दोबारा मंत्री बनाने को असंवैधानिक बता चुका है कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस आरसी लाहोटी और जस्टिस केजी बालकृष्णन की बेंच ने 17 अगस्त 2001 को अपने फैसले में विधानसभा के एक कार्यकाल (5 साल) के अंदर गैर-विधायक को इस्तीफा का ब्रेक देकर या सरकार पुनर्गठन के आधार पर विधायक नहीं बनने के बाद भी दोबारा मंत्री बनाने को असंवैधानिक करार दिया था। मामला पंजाब के मंत्री तेज प्रकाश सिंह का था। तेज प्रकाश सिंह को हरचरण सिंह बरार सरकार में 9 सितंबर 1995 को पहली बार मंत्री बनाया गया था। 6 महीने में वो विधायक नहीं बने और 6 महीने पूरे होने से पहले 8 मार्च 1996 को इस्तीफा दे दिया।

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पंजाब में उस समय 1992 के चुनाव के बाद 10वीं विधानसभा चल रही थी। कांग्रेस की सरकार थी। 10वीं विधानसभा के पहले सीएम बेअंत सिंह की 1995 में आतंकी हमले में हत्या के बाद बरार को सीएम बनाया गया था। तेज प्रकाश सिंह के इस्तीफा देने के कुछ समय बाद कांग्रेस ने सीएम बदलने का फैसला किया। राजिंदर कौर भट्टल 10वीं विधानसभा में 21 नवंबर को तीसरी सीएम बनीं और 23 नवंबर को उन्होंने तेज प्रकाश सिंह को फिर से मंत्री बना लिया। तेज प्रकाश तब भी विधायक का पद नहीं हासिल कर पाए थे। हाईकोर्ट में इसके खिलाफ याचिका दायर हुई, लेकिन उच्च न्यायालय ने 3 दिसंबर 1996 को याचिका खारिज कर दी।

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याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को चूक बताया। सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में फैसला सुनाते हुए तेज प्रकाश सिंह को बिना किसी सदन में पहुंचे दूसरी बार मंत्री बनाने के कदम को गलत, अलोकतांत्रिक, अवैध और असंवैधानिक करार दिया था। कोर्ट ने इसको संविधान की भावना के खिलाफ बताया था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि इस फैसले का कोई असर अब होना नहीं है, लेकिन भारतीय संविधान के आर्टिकल 164 (4) के महत्व को देखते हुए इस मसले को स्पष्ट करना अहम है।

तेज प्रकाश सिंह जैसा ही दिख रहा दीपक प्रकाश का केस

बिहार में दीपक प्रकाश कुशवाहा का मामला पंजाब के तेज प्रकाश सिंह जैसा ही दिख रहा है। जैसे बरार सरकार में 6 महीने पूरा करने से पहले तेज प्रकाश ने इस्तीफा दे दिया था, उसी तरह बिहार में दीपक के 6 महीने पूरे होने से पहले नीतीश ने ही कैबिनेट भंग कर दी। कुछ अंतराल के बाद जैसे राजिंदर कौर भट्टल ने नई सरकार में तेज प्रकाश को बिना विधायक बने दोबारा मंत्री बनाया, उसी तरह सम्राट चौधरी ने नई सरकार में दीपक कुशवाहा को बिना सदन पहुंचे फिर मंत्री बना लिया।

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विधायक या विधान पार्षद बने बिना दीपक प्रकाश के दूसरी बार मंत्री बनने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में राकेश सिंह की याचिका पर अब सबकी नजर रहेगी। उपेंद्र कुशवाहा ने एक महीना गिनाकर यह साफ कर दिया है कि वो 6 महीने की मियाद नवंबर में जोड़ रहे हैं। इस्तीफा क्यों देगा- कहना साफ इशारा है कि दीपक त्यागपत्र के मूड में नहीं हैं। ऐसे में बीजेपी कुशवाहा पर दबाव बनाकर दीपक से मंत्री पद छोड़ने कह सकती है। कुशवाहा नहीं माने तो संभावना यह भी है कि कोर्ट का नोटिस आने के बाद जवाब दाखिल करने से पहले दीपक को सरकार ही बर्खास्त कर दे। बेटे की शहादत से जहां कुशवाहा को राजनीतिक फायदा मिल सकता है, वहीं सरकार असहज सवालों से बच जाएगी।

Ritesh Verma

लेखक के बारे में

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रीतेश वर्मा पत्रकारिता में 25 साल से अलग-अलग भूमिका में अखबार, टीवी और डिजिटल में काम कर चुके हैं। दैनिक जागरण के साथ बिहार में 5 साल तक जिला स्तर की प्रशासनिक और क्राइम रिपोर्टिंग करने के बाद रीतेश ने आईआईएमसी, दिल्ली में दाखिला लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई की। एक साल के अध्ययन ब्रेक के बाद रीतेश ने विराट वैभव से दोबारा काम शुरू किया। फिर दैनिक भास्कर में देश-विदेश का पेज देखा। आज समाज में पहले पन्ने पर काम किया। बीबीसी हिन्दी के साथ आउटसाइड कंट्रीब्यूटर के तौर पर जुड़े। अखबारों के बाद रीतेश ने स्टार न्यूज के जरिए टीवी मीडिया में कदम रखा। रीतेश ने टीवी चैनलों में रिसर्च डेस्क पर लंबे समय तक काम किया है और देश-दुनिया के विषयों पर तथ्यपरक जानकारी सहयोगियों को आगे इस्तेमाल के लिए मुहैया कराई है। सहारा समय और इंडिया न्यूज में भी रीतेश रिसर्च का काम करते रहे। इंडिया न्यूज की पारी के दौरान वो रिसर्च के साथ-साथ चैनल की वेब टीम के हेड बने और इनखबर न्यूज पोर्टल को बतौर संपादक शुरू किया। लाइव हिन्दुस्तान के साथ एडिटर- न्यू इनिशिएटिव के तौर पर पिछले 6 साल से जुड़े रीतेश फिलहाल उत्तर प्रदेश और बिहार की खबरों और दोनों राज्यों की टीम को देखते हैं। और पढ़ें
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