पांच साल बाद सड़क पर कैसे उतरे तेजस्वी यादव? 11 साल बाद राजद का राजभवन मार्च

लाइव हिन्दुस्तान, पटना
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लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने 11 साल बाद बुधवार को पटना में राजभवन (लोकभवन) मार्च किया। तेजस्वी यादव भी 5 साल इस मार्च में सड़क पर पैदल चलकर आंदोलन और संघर्ष करते दिखे। तेजस्वी ने गिरफ्तारी भी दी।

Tejashwi Yadav RJD March
पटना में राज्यपाल के आवास तक राजद के मार्च का नेतृत्व करते तेजस्वी यादव

बिहार में छात्र आंदोलन पर एके 47 से फायरिंग और पेपर लीक पर बुधवार को राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव ने राजभवन (लोकभवन) मार्च किया। पटना में गांधी मैदान के जेपी गोलंबर से लोक भवन तक के मार्च के दौरान पुलिस ने आयकर गोलंबर के पास आंदोलनकारियों पर वाटर कैनन चलाया और पानी की बौछार के बीच तेजस्वी यादव समेत पार्टी के कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। सबको बाद में छोड़ दिया जाएगा। पुलिस ने एहतियातन पटना जंक्शन और अन्य इलाकों से मार्च के रास्ते की तरफ आने वाली सड़कों पर यातायात नियंत्रित कर दिया गया था। पुलिस ने डाकबंगला चौक पर ही मार्च को रोकने की पूरी तैयारी कर रखी थी, लेकिन राजद वर्कर वहां सुरक्षा घेरा तोड़कर आगे बढ़ गए। मार्च को आयकर गोलंबर के पास रोक लिया गया।

राजनीति को औपचारिकता और जरूरत भर करने के लिए परिवार और पार्टी के नेताओं के सवाल का सामना कर रहे तेजस्वी यादव का मार्च राजद के लिए काफी महत्वपूर्ण है। लालू की पार्टी ने 11 साल बाद राजभवन मार्च का आह्वान किया था। इस 11 साल में वो मुश्किल से 3-4 साल सरकार में रही। राजद ने इससे पहले 2015 में आखिरी बार राजभवन मार्च किया था। लालू यादव तब सरकार से 2011 की जनगणना से जातीय गणना की रिपोर्ट जारी करने की मांग कर रहे थे। तेजस्वी खुद 5 साल से ज्यादा समय के बाद सड़क पर पैदल मार्च करते आंदोलन में संघर्ष करने उतरे। मार्च 2021 में सरकार के एक प्रस्तावित कानून के खिलाफ तेजस्वी सड़क पर थे। उस विधेयक में बगैर वारंट के किसी को पूछताछ के लिए उठाया जा सकता था। तेजस्वी को तब भी गिरफ्तार कर लिया गया था। पुलिस ने उस दिन विधानसभा में विपक्षी विधायकों के साथ बदसलूकी भी की थी, जिस पर काफी बवाल हुआ था।

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ऐसा नहीं है कि राजद और तेजस्वी शांत बैठे हैं। सरकार के खिलाफ अलग-अलग तरह से तेजस्वी बोलते-लिखते रहते हैं। मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर तेजस्वी ने ही विपक्षी नेताओं को 2018 में जुटाया था। विपक्षी गठबंधन के भारत बंद या बिहार बंद में राजद पीछे नहीं रहा कभी। पिछले साल 9 जुलाई को एसआईआर पर बिहार बंद में राहुल गांधी आए थे तो तेजस्वी और दूसरे विपक्षी नेता भी साथ थे। तेजस्वी जनादेश अपमान यात्रा, आरक्षण बढ़ाओ यात्रा, बेरोजगारी हटाओ यात्रा, जन विश्वास यात्रा और वोटर अधिकार यात्रा के जरिए लोगों के बीच बने हुए हैं। लेकिन राजद के कार्यकर्ताओं और समर्थकों में संघर्ष करने और लड़ने का जोश भरने वाला कोई आंदोलन लंबे समय से होता नहीं दिखा। यह मार्च उस तेवर में वापसी का प्रयास है।

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फिर सवाल उठता है कि जिन तेजस्वी यादव की विदेश यात्रा के लिए पार्टी का स्थापना दिवस भी तय तारीख से पहले मनाया जाता हो या जिनके कम समय प्रचार करने से बांकीपुर के चुनाव में कैंडिडेट की जमानत भी जब्त हो जाती है, उनको प्रेस कॉन्फ्रेंस, मीडिया बाइट और ट्वीट से आगे बढ़कर अब मार्च क्यों करना पड़ा। इसका जवाब छुपा है बदलते राजनीतिक मसलों और नौजवान पीढ़ी के तेवर में। जंतर-मंतर आंदोलन के बाद धर्मेंद्र प्रधान की सफलता से उत्साहित जेन-जी आक्रामक शैली की राजनीति और विरोध से आकर्षित हो रही है। उनसे सीखकर जेन अल्फा के स्कूली बच्चे भी अब बेंच से लेकर टीचर तक पर आंदोलन कर दे रहे हैं। राजनीति को ड्यूटी की तरह लेने वाले नेताओं के ऐसे में पिछड़ने के आसार हैं। तेजस्वी की आरामतलब राजनीतिक वारिस की जो छवि बनी या बनाई गई है, वह उससे बाहर निकलने के लिए मार्च में सड़क पर उतरे।

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दूसरा, बिहार की राजनीति में नवंबर 2025 के चुनाव में कुछ खास नहीं कर पाए प्रशांत किशोर का बांकीपुर उप-चुनाव जीतना और राजद का जमानत जब्त कराकर तीसरे नंबर पर पहुंचना कमाल का असर दिखा रहा है। बांकीपुर से यह मैसेज गया है कि यादव और मुसलमान ही नहीं, सवर्णों ने भी प्रशांत किशोर का हाथ पकड़ लिया। यह बदलाव नीतीश कुमार की पीठ पर दो दशक से सत्ता और विपक्ष खेल रही भाजपा और आरजेडी दोनों के लिए खतरे की घंटी है। तेजस्वी ने जन सुराज की एक जीत से राज्य में पैदा हुई राजनीतिक हलचल का समय रहते सक्रिय होकर समाधान नहीं खोजा तो बांकीपुर की तरह राजद का यादव-मुसलमान समीकरण दूसरे इलाकों में भी टूट सकता है।

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जन सुराज पार्टी ने इस मान्यता पर भी बट्टा लगा दिया है कि लालू और जंगलराज की याद दिलाकर राजद को हराने का फॉर्मूला आगे भी काम करेगा। प्रशांत किशोर का विधानसभा जाना और 2030 के चुनाव को टारगेट करना, एनडीए गठबंधन को भी नए चुनावी तरीके खोजने को मजबूर करेगा। अब ध्रुवीकरण से ही काम चल जाएगा, इसकी गारंटी नहीं है। प्रशांत ने लंबे समय से दो गठबंधनों के बीच फंसी बिहार की राजनीति को तीसरी तरफ देखने का एक विकल्प दिया है। इस बात की पहली व्याकुलता विपक्षी खेमे में दिखनी स्वाभाविक है। तेजस्वी का 5 साल बाद सड़क पर उतरना, विपक्षी कैंप में तीसरे विकल्प के उभरने की संभावना भर से पैदा बेचैनी की पहली अभिव्यक्ति है।

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राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयंत जिज्ञासु ने तेजस्वी यादव के मार्च को लेकर कहा कि यह सरकार को उत्तरदायी बनाने के लिए है। उन्होंने कहा- ‘सरकार कोई हो, प्रदर्शनकारियों से सार्थक संवाद कर कोई रास्ता निकालने की अपेक्षा उससे की जाती है। वाजिब मांगों को लेकर प्रदर्शनरत, सरकार से असहमत और सतर्क नागरिक किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे सुंदर मनुष्य नजर आता है। सामान्य प्रदर्शन के दौरान उसे नियंत्रित करने के नाम पर AK 47 चलाना अक्षम्य अपराध है। इसका आदेश देने वाले शीर्ष अधिकारी पर कार्रवाई नहीं करना सरकार के अलोकतांत्रिक, गैर-जवाबदेह और गैर-ज़िम्मेदार होने की निशानी है। तेजस्वी प्रसाद के नेतृत्व में आज का राजभवन मार्च सरकार को उत्तरदायी बनाने के लिए है ताकि नियमित ढंग से त्रुटिहीन परीक्षा हो और पक्षपात से परे ससमय नतीजे आएं।’

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Ritesh Verma

लेखक के बारे में

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रीतेश वर्मा पत्रकारिता में 25 साल से अलग-अलग भूमिका में अखबार, टीवी और डिजिटल में काम कर चुके हैं। दैनिक जागरण के साथ बिहार में 5 साल तक जिला स्तर की प्रशासनिक और क्राइम रिपोर्टिंग करने के बाद रीतेश ने आईआईएमसी, दिल्ली में दाखिला लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई की। एक साल के अध्ययन ब्रेक के बाद रीतेश ने विराट वैभव से दोबारा काम शुरू किया। फिर दैनिक भास्कर में देश-विदेश का पेज देखा। आज समाज में पहले पन्ने पर काम किया। बीबीसी हिन्दी के साथ आउटसाइड कंट्रीब्यूटर के तौर पर जुड़े। अखबारों के बाद रीतेश ने स्टार न्यूज के जरिए टीवी मीडिया में कदम रखा। रीतेश ने टीवी चैनलों में रिसर्च डेस्क पर लंबे समय तक काम किया है और देश-दुनिया के विषयों पर तथ्यपरक जानकारी सहयोगियों को आगे इस्तेमाल के लिए मुहैया कराई है। सहारा समय और इंडिया न्यूज में भी रीतेश रिसर्च का काम करते रहे। इंडिया न्यूज की पारी के दौरान वो रिसर्च के साथ-साथ चैनल की वेब टीम के हेड बने और इनखबर न्यूज पोर्टल को बतौर संपादक शुरू किया। लाइव हिन्दुस्तान के साथ एडिटर- न्यू इनिशिएटिव के तौर पर पिछले 6 साल से जुड़े रीतेश फिलहाल उत्तर प्रदेश और बिहार की खबरों और दोनों राज्यों की टीम को देखते हैं। और पढ़ें
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