
सुपौल : नदियों के सूखने से अर्थव्यवस्था को नुकसान, पर्यावरण-स्वास्थ्य पर भी असर
त्रिवेणीगंज में बड़ी और छोटी नदियों के सूखने से मछुआ समुदाय की आजीविका पर संकट आ गया है। पहले मछली पकड़कर जीवन यापन करने वाले मछुआरों को अब रोज़ी-रोटी के लिए पंजाब और दिल्ली जाना पड़ रहा है। नदियों के सूखने के कारण धोबी और नाविक समुदायों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि नदियों के संरक्षण की आवश्यकता है।
त्रिवेणीगंज, निज प्रतिनिधि। इलाके की अधिकांश बड़ी और छोटी नदियों के सूखने व नदियों के भू जल स्तर में हाल के बर्षो में आई गिरावट से आसपास के मछुआ समुदायों की आजीविका पर भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है।मालूम हो कि ये नदियां लंबे समय तक स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही हैं, लेकिन अब इनके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। इलाके के मछुआ समुदाय के लोग बताते हैं कि पहले वेलोग रोज़ाना मछली पकड़कर अपने परिजन का पेट भरते थे घर परिवार चल जाता था, लेकिन नदी में पानी नही रहने से मछलियां लगभग खत्म हो चुकी हैं।
डपरखा गांव के मछुआरे पाँचू मुखिया कहते हैं, इलाके के अधिकांश नदी सूख गई है,उसमेपानी नही है फलतः जाल डालने का कोई मतलब नहीं रह जाता है।रोजी रोटी के के लिए पंजाब दिल्ली जाना पड़ रहा है।इससे मछली पकड़ने के साथ-साथ जाल बनाने जैसे सहायक रोजगार भी बंद हो गए हैं। इसके साथ ही पानी नही रहने से नदियों में नाव चलाने का काम भी लगभग बंद हो चुका है। इससे नाविकों की रोज़ी-रोटी छिन गई है और उन्हें परम्परागत व्यबसाय छोड़कर दूसरा काम करना पड़ रहा है। नाव चलाने वाले नाविकों का कहना है कि अब उनके पास कोई वैकल्पिक रोजगार नहीं है। इसी तरह अधिकांश नदी के सूख जाने का असर धोबी समुदाय के व्यापार पर भी पड़ा है। पहले वे नदी के पानी से कपड़े धोते थे, लेकिन अब उन्हें मोटर चलाकर पानी की व्यवस्था करनी पड़ती है, जिससे न सिर्फ उनका खर्च बढ़ गया है।बल्कि असुविधा का भी सामना करना पड़ रहा है। बैद्यनाथ रजक कहते हैं कि , बिजली और पानी का खर्च इतना बढ़ गया है कि काम अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है। लोगों का आरोप है कि नदियों में अवैध खनन, अंधाधुंध जल दोहन,नदियों के जमा सिल्ट ,भूजल स्तर में लगातार हो रही गिरावटऔर पर्यावरणीय उपेक्षा के कारण नदियों की यह हालत हुई है। प्रशासन से नदियों के संरक्षण और प्रभावित लोगों के लिए वैकल्पिक रोजगार की मांग कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते नदियों को पुनर्जीवित करने के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है। जिले की बड़ी और छोटी नदियों के लगातार सूखने से पर्यावरण एवं जनस्वास्थ्य पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। जिले के विभिन्न शहरों के आगे–पीछे से गुजरने वाली कई नदियों की धाराएं विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। नदियां गाद से भरकर खतरनाक रूप ले चुकी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार नदी की तलहटी ऊंची होने, आर्सेनिक की समस्या और जल संकट की आशंका बढ़ गई है। आम लोग भी बाढ़ के साथ आने वाली मछलियों के स्वाद से वंचित होने की शिकायत कर रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता एवं नदी–पोखर बचाओ अभियान के संयोजक राजेश जी चौधरी ने बताया कि नदियां धीरे-धीरे बरसाती बन गई हैं। नियमित प्रवाह बाधित होने से गाद की मात्रा बढ़ रही है, जिससे छठ घाट समेत नदी से जुड़े स्थान खतरनाक हो गए हैं। पर्यावरणविद् डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि त्रिवेणीगंज शहर की दोनों दिशाओं से बहने वाली नदियों के सूखने से लोक आस्था, विश्वास और पूजा-पाठ पर संकट उत्पन्न हो गया है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर सुपौल जिले में दिखाई दे रहा है। वर्षा का औसत 1100–1200 मिलीमीटर से घटकर 600–700 मिलीमीटर रह गया है। गर्मी के दिनों में तापमान लगातार 40–42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने से लोग बीमार पड़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि जिले के छातापुर, जदिया, बलुआ, केवटी, सहित कई ग्रामीण क्षेत्रों में आर्सेनिक युक्त पानी गंभीर बीमारी का कारण बन रहा है। भूजल स्तर में लगातार गिरावट से जल संकट और आर्सेनिक की समस्या बढ़ी है। चौर, नासी और पोखरों के सूखने से पर्यावरण संतुलन बिगड़ गया है। नदियों के सूखने से डॉल्फिन, सोस, ऊदबिलाव जैसे जलीय जीव विलुप्त हो चुके हैं। ऐसी स्थिति में नदियों को पुनः प्रवाहित करना समय की मांग है। किसान शंभू भगत, मुकेश सहनी और राम आशीष यादव ने बताया कि सुरसर नदी से जदिया, कोरियापट्टी, रामपुर जीवछपुर सहित कई क्षेत्रों के किसानों को पहले काफी लाभ मिलता था। वर्तमान में जल संकट के कारण सिंचाई और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ गई हैं। नदी किनारे बसे गांवों में गर्मी के दिनों में पेयजल की भारी किल्लत हो जाती है और लोग पानी के लिए जूझने को मजबूर हैं।

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