सुपौल : कोसी के बालू में उग रही खुशहाली, तरबूज-खीरा किसानों को कर रहा मालामाल
कोशी के रेतीले बालू पर किसान अब तरबूज, खीरा और ककड़ी की खेती कर रहे हैं। यूपी और हरियाणा के किसान इस क्षेत्र में कृषि तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। पहले बंजर मानी जाने वाली यह जमीन अब उनकी समृद्धि का जरिया बन गई है। स्थानीय किसान भी अब नए तरीके सीखकर इस खेती में शामिल हो रहे हैं।

वीरपुर, एक संवाददाता। कोशी के रेतीले बालू पर उगती यह हरियाली अब सिर्फ फसल नहीं, बल्की किसानों के सपनों और समृद्धि की नई कहानी लिख रही है। कभी बंजर मानी जाने वाली कोसी नदी के पूर्वी तटबंध के भीतर की रेतीली जमीन अब किसानों के लिए सोना उगल रही है। यूपी और हरियाणा से आए प्रगतिशील किसानों ने अपनी मेहनत और आधुनिक खेती तकनीक से इस बालू को उपजाऊ बना दिया है। बसंतपुर प्रखंड के सातनपट्टी, भगवानपुर और रतनपुर पंचायतों में करीब 100 एकड़ से भी अधिक भूमि पर तरबूज, खीरा, ककड़ी और नेनुआ की खेती की जा रही है। यहां तैयार होने वाले तरबूज और खीरे की सप्लाई पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर की मंडियों तक हो रही है।
वहां इनके स्वाद और मिठास की खास मांग है। खास बात यह है कि इस खेती से प्रभावित होकर अब स्थानीय किसान भी बड़े पैमाने पर तरबूज और सब्जियों की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बागपत से आए किसान इरफान बताते हैं कि वर्ष 2011 में वे सुपौल जिले में घूम-घूमकर फेरीवाले के रूप में कपड़ा बेचने आए थे। इसी दौरान उन्होंने देखा कि कोसी तटबंध के अंदर बलुआही जमीन बाढ़ के बाद खाली पड़ी रहती है। ऐसे में उन्हें आइडिया आया कि क्यों ना इस पर खेती की जाए। इसके बाद अगले साल उन्होंने एक बीघा जमीन लीज पर ले ली और खेती की शुरुआत की। मुनाफा बढ़ता गया तो अब 10 बीघा में तरबूज की खेती कर रहे हैं। इरफान बताते हैं कि उन्हें मार्केट जाने की जरूरत नहीं पड़ती है। बड़े व्यापारी उनकी खेत पर ही पहुंचकर सारा तरबूज खरीद लेते हैं। इससे अच्छा मुनाफा हो रहा है। कोरोना काल से पहले शुरू हुई यह पहल अब हर साल का सिलसिला बन चुकी है। दिसंबर-जनवरी में यूपी के बागपत, लखीमपुर और सहारनपुर जैसे जिलों से किसान यहां पहुंचते हैं। कोशी नदी का जलस्तर कम रहने पर ये किसान स्थानीय जमीन मालिकों से जमीन लीज पर लेकर जून तक खेती करते हैं और फिर बाढ़ का पानी बढ़ने पर अपने गांव लौट जाते हैं। बागपत से आए किसान सिराजुद्दीन के अनुसार 10 बीघा जमीन पर 10 हजार जगहों पर गड्ढा खोद कर हर एक गड्ढे में चार तरबूज के पौधा लगाया । इन चार अलग-अलग पौधों में एक सीजन में 4 से 5 तरबूज फलते है । तरबूज की खेती में 30 हजार रुपए का खर्चा बीज पर आता है । जबकि, 10 बीघा खेत में गड्डा खोदने में 50 हजार की मजदूरी और इसके बाद पौधों को अलान देने के लिए 700 रुपए का खर-पतवार खरीदना पड़ता है । नवंबर के पहले सप्ताह में पौधे लगाए जाते हैं, जिसमें से अप्रैल से तरबूज तैयार होना शुरू हो जाता है । वे बताते हैं कि 6 महीने तक इसी बलुआही इलाके में झोपड़ी बना कर परिवार के साथ रहते है । जहां उनकी पत्नी रसीदा और भाई तस्लीम के अलावा गांव के चार मजदूर भी काम करते हैं । जरूरत के हिसाब से पंपसेट से पटवन किया जाता है । मजदूरी में भी छह माह में पौने तीन लाख का खर्च आता है । उन्होंने बताया की अभी इस सीजन में खीरा का थोक भाव 20 से 30 रुपया मिलता था जो अभी 5 रुपए प्रति किलो बाजार में जाकर बेचना पर रहा है। जिसकी भरपाई अन्य फसलों से उम्मीद है पूरी हो जाएगी। लखीमपुर के किसान करमुल , समसुद्दीन ,एकरामुल बताते हैं कि यहां की जमीन सस्ती और आसानी से मिल जाती है, जिससे लागत कम होती है और मुनाफा बढ़ जाता है। पहले जिस जमीन को स्थानीय किसान अनुपजाऊ मानते थे, अब वही उनकी आमदनी का जरिया बन रही है। स्थानीय संतोष मेहता, लालू कुमार दास और पिंटू मेहता, लालू मेहता, संजीव मेहता जैसे किसान अब बाहर से आए किसानों को अपना गुरु मानकर खेती के नए तरीके सीख रहे हैं और खुद भी तरबूज की खेती शुरू कर चुके हैं। हालांकि शुरुआत में भाषा और रहन-सहन को लेकर दिक्कतें आईं, लेकिन अब स्थानीय लोगों से घुलने-मिलने के बाद बाहरी किसान यहां खुद को अपना सा महसूस करते हैं। वे खेतों में ही झोपड़ी बनाकर रहते हैं और सीजन खत्म होने पर वापस लौट जाते हैं। स्थानीय लोग इन्हें ‘चैया’ के नाम से जानते हैं।कहते हैं अधिकारीतरबूज को गर्म मौसम और धूप की जरूरत होती है। स्थानीय किसानों को इस तरह की उन्नत खेती से सीख लेकर अपनी आय बढ़ानी चाहिए। इससे क्षेत्र की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। --संजीव कुमार तांती, डीएओ, वीरपुर
लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।


