सुपौल : जिले में संचालित हैं हजारों स्कूल-कोचिंग, रजिस्ट्रेशन महज 313 का
सुपौल जिले में निजी स्कूल संचालक नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। अधिकांश स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, जैसे प्रसाधन और खेल मैदान। अभिभावकों से मनमानी फीस वसूली जा रही है, और कई स्कूल अवैध रूप से हॉस्टल चला रहे हैं। शिक्षा विभाग की कार्रवाई की आवश्यकता है।

सुपौल, एक प्रतिनिधि। जिले में निजी स्कूलों के संचालकों द्वारा नियमों को ताक पर रखकर स्कूलों का संचालन किया जा रहा है। क्षेत्र में संचालित ज्यादातर निजी स्कूलों में निर्धारित मापदंडों का अभाव है। यहां तक कि बुनियादी सुविधाएं भी निजी स्कूलों में उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। इन स्कूलों का निरीक्षण तो प्रतिवर्ष शिक्षा विभाग के अधिकारियों के द्वारा किया जाता है। इसके बाद भी निर्धारित मूलभूत मापदंडों के बिना निजी स्कूलों का संचालन शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है। बताया जाता है कि निजी स्कूलों के संचालन के लिए शिक्षा विभाग से मान्यता लेनी पड़ती है।
इसके लिए मानक निर्धारित किए गए हैं, जिनका पालन मान्यता प्राप्ति के पूर्व ही सुनिश्चित करना होता है। इन मानकों में स्कूल के संचालन के लिए पर्याप्त रूप से भवन की उपलब्धता के अलावा अन्य जरुरी अधोसंरचना का होना भी अतिआवश्यक है। लेकिन जिले भर में संचालित स्कूल किराए के ऐसे मकानों में चल रहे हैं, जहां आवश्यक सुविधाओं की घोर कमी है। गौरतलब है कि कई स्कूल वर्षों से संचालित हैं और आज भी किराए के कच्चे मकानों में चल रहे हैं। जबकि नियमों के अनुसार निर्धारित समयावधि के बाद स्कूलों का अपना भवन होना अनिवार्य है। वहीं कई स्कूल ऐसे भी हैं जो बांस से निर्मित भवनों में ही निजी स्कूलों का संचालन किया जा रहा है। किराए के मकानों में चल रहे, इसके अलावा फायर बीग्रेड से एनओसी लेना भी अनिवार्य है। लेकिन निजी कई स्कूलों में न तो प्रसाधन की सुविधा है और न ही बैठने की समुचित व्यवस्था। एक ही कमरे में कई कक्षाएं लगाई जाती हैं। निजी स्कूलों में छात्र/छात्राओं के लिए अलग-अलग प्रसाधनों की व्यवस्था अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। लेकिन अलग-अलग तो दूर कई स्कूलों में तो एक भी प्रसाधन नहीं है। विद्यार्थियों के समुचित शारीरिक विकास के लिए स्कूलों में खेल मैदान का होना अनिवार्य है। लेकिन वर्षों से चल रहे निजी स्कूलों में आज भी खेल मैदान उपलब्ध नहीं है। वहीं निजी स्कूल के संचालक अभिभावकों से मनमानी फीस वसूलते हैं। जिनमें भवन निर्माण से लेकर अलग-अलग सुविधाओं के नाम पर फीस ली जा रही है। उसके बावजूद निजी स्कूलों द्वारा अनिवार्य अधोसंरचना के विकास पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। निजी स्कूल चलाना अब एक व्यवसाय बन गया है, मनमानी फीस वसूलने के बाद अब ज्यादातर निजी स्कूलों में सामिग्रयों की बिक्री को भी तरजीह दी जाने लगी है। स्कूलों में ही दुकानें खोल कर बच्चों को पुस्तक, कॉपी से लेकर यूनिफॉर्म तक की बिक्री की जाती है। कमाई के लिए स्कूलों द्वारा मनमाना पाठ्यक्रम लागू कर दिया जाता है। वहीं बच्चों को पुस्तकों के साथ ही कापियां तक स्कूल से ही खरीदने पर मजबूर किया जाता है। जबकि विभाग के द्वारा ऐसा कोई नियम नहीं है, लेकिन इसके बावजूद कई स्कूलों द्वारा यूनिफॉर्म से लेकर टाई, बेल्ट, बैग व अन्य सामग्रियां बेची जा रही हैं। जिले के विभिन्न क्षेत्र में लगभग तीन सौ से अधिक कोचिंग सेंटर बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहा है। इसके अलावे 100 से अधिक निजी स्कूलों में अवैध रूप से हॉस्टल चलाया जा रहा है। इसके बाद भी शिक्षा विभाग के अधिकारी इस बात से अनजान बने हुए हैं। कई निजी स्कूल जहां अवैध रूप से हॉस्टल चल रहे हैं, उसके संचालक अब स्कूल में हॉस्टल संचालित होने से इंकार करने लगे हैं। उनका कहना है कि वह लोग स्कूल में छात्रों को पढ़ाते हैं। इस संबंध में डीपीओ प्रवीण कुमार ने बताया कि जिले भर में कुल 313 निजी स्कूल व कोचिंग सेंटर का रजिस्ट्रेशन है। उन्होंने कहा कि बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे स्कूल व कोचिंग सेंटरों को चिह्नित कर कार्रवाई की जाएगी। बताया कि पोर्टल पर जिले में 436 विद्यालय हैं, लेकिन 313 निजी स्कूलों का संबंधन हुआ है। निजी स्कूल का हर साल संबंधन किया जाता है। कुछ निजी विद्यालय में हॉस्टल संचालन की सूचना मिल रही है, जहां विभागीय कार्रवाई की जाएगी।

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