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सुपौल : किसानों की एटीएम 'बांस' को नहीं मिल रहा सरकारी संरक्षण

सुपौल : किसानों की एटीएम 'बांस' को नहीं मिल रहा सरकारी संरक्षण

संक्षेप:

कोसी-सीमांचल क्षेत्र में किसान बांस की खेती को एक स्थायी आय के स्रोत के रूप में देखते हैं, लेकिन सरकारी योजनाएं जमीनी स्तर पर अनुपस्थित हैं। किसानों को उच्च गुणवत्ता के बांस की किस्में और उचित मूल्य नहीं मिल रहे हैं। कृषि विभाग का कहना है कि वे प्रयास कर रहे हैं, लेकिन बजट और संसाधनों की कमी चुनौती बनी हुई है।

Dec 14, 2025 10:08 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, सुपौल
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त्रिवेणीगंज, निज प्रतिनिधि। कोसी-सीमांचल का इलाका इन दिनों एक अनकही उम्मीद और उपेक्षा की कहानी बुन रहा है। इस इलाके में खेतों में बांस की लंबी लहलहाती कतारें हर जगह दिखती हैं। किसानों के लिए यह केवल एक पौधा नहीं बल्कि हर मौसम में पैसा देने वाला एटीएम है। लेकिन सरकारी घोषणाओं के बाद भी न तो इनकी उन्नत किस्म मिलती हैं , न ही किसानों को उचित कीमत मिल रही हैं। बांस की खेती को प्रोत्साहन देने वाली सरकारी योजनाएं धरातल पर उतरने के बजाय सरकारी फाइलों में ही बंद है। किसानों को इंतजार है किसी भागीरथ का जो इन्हें सरजमी पर उतार सके।

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कोसी की उपजाऊ और नम मिट्टी बाँस की खेती के लिए काफी उपयुक्त मानी जाती है। यही वजह है कि यहां के किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ बांस भी उगाते रहे हैं। वैसे डोम जाति के हजारों परिवारों के लिए बांस न केवल आजीविका का स्रोत है, बल्कि पीढ़ियों से जीविका का मुख्य आधार भी बना हुआ है। इस समुदाय के लोग बांस से बने उत्पाद के सहारे ही पीढ़ी दर पीढ़ी से अपनी परिवार का पालन पोषण करते रहे हैं। किसान दीपनारायण यादव कहते हैं कि धान-गेहूं तोसाल में एक बार उपजता है, लेकिन बांस हर समय कमाई देता है। एक बार लगाओ, सालो साल तक आमदनी लेते रहो। राज्य सरकार ने बांस उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अनुदान की घोषणा की थी, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बहुत दूर है। कृषि विभाग की ओर से अब तक न तो अनुदान की कोई स्पष्ट प्रक्रिया बताई गई है और न ही किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बाँस की किस्मों की जानकारी दी गई है। इस बाबत कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजीव रंजनकहते हैं कि अगर किसानों को सही प्रशिक्षण और अच्छी प्रजातियां मिलें, तो बांस की खेती इस क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है। लेकिन प्रशिक्षण का घोर अभाव है। कोसी क्षेत्र में आज भी बांस का उपयोग घर बनाने, शादी-ब्याह के मंडप, छप्पर और फेंसिंग में होता है। यानी यह केवल खेती नहीं, स्थानीय जीवन का अभिन्न हिस्सा है। बावजूद इसके, नीतिगत स्तर पर इसे प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। इधर, इस बाबत अनुमंडल कृषि उद्यान अधिकारी पंकज कुमार का कहना है कि कृषि विभाग बांस की खेती को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन बजट और मानव संसाधन की कमी एक बड़ी चुनौती है। विभाग उन्नत प्रजाति के पौधे उपलब्ध करा रहा है। बता दें कि कोसी क्षेत्र के किसान बांस में भविष्य की खेती देख रहे हैं। सरकार यदि समय रहते ठोस कदम उठाए, तो यह क्षेत्र बांस उद्योग का हब बन सकता है। वरना यह अनमोल संपदा उपेक्षा की बेंत तले टूटती चली जाएगी।