सुपौल : हाईटेक युग में भी परंपरा को जीवंत कर रहे कुनौली के कुम्हार

सुपौल : हाईटेक युग में भी परंपरा को जीवंत कर रहे कुनौली के कुम्हार

संक्षेप:

कुनौली में दीवाली के त्योहार पर मिट्टी के दीपों की मांग में कमी आई है। आधुनिकता के चलते लोग अब मोमबत्तियों और इलेक्ट्रिक लाइटों को प्राथमिकता दे रहे हैं। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरा के अनुसार...

Oct 17, 2025 01:41 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, सुपौल
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कुनौली,निज प्रतिनिधि। इस आधुनिक युग में हाइटेक स्टाईल के दौरान आभी भी मिट्टी के बने दीप ज्योति पर्व के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने की पूर्व में थे। दीपावली को लेकर आमलोगों का उत्साह चरम पर है। विभिन्न व्यापारों से जुड़े कारोबारी भी अपनी तैयारी में जुट गये हैं। इस पर्व में दीपों की मांग सबसे अधिक होती है। दीपावली पर मिट्टी के दियों की बिक्री में कमी आ गई है। अब रेडीमेड दिये, मोमबत्ती व चायनीज बिजली की लाइटों ने अब मिट्टी के दिये का स्थान ले लिया है। जरूरत के मुताबिक कुम्भकारों द्वारा मिट्टी के दीये ' कलश ' चौमुखी दीप 'छोटा दीप ' लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति आदि का निर्माण तेजी से किया जा रहा है।

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दीपावली में पूर्व की अपेक्षा अब आधुनिकता की झलक अधिक दिखाई दे रही है। खासकर शहरी क्षेत्रों में लोग दीप से अधिक मोमबत्ती और इलेक्ट्रेनिक सजावट को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली रहने के बावजूद परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए मुख्य रूप से दीपों का ही इस्तेमाल किया जाता है। सुबह से शाम तक मिट्टी के साथ जूझते तथा चाक के सहारे कलश ' डिबिया ' दीप ' धुपदानी का निर्माण कर अपने लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने वाले कुम्भकार शिव नारायण पंडित, देवजी पंडित ' रामू पंडित ' सत्तो पंडित आदि कहते हैं कि अब उनका कारोबार मंदा हो चुका है। मिट्टी के साथ जलावन का दाम भी पहले की अपेक्षा ज्यादा हो चुका है। पहले की तरह अब बांस का पता भी नहीं मिलता है। खर पतवार गेहूं का भूसा भी ऊंची कीमत में लाना पड़ता है। इसके अलावा अब लोगों का मिट्टी के बर्तन के प्रति झुकाव भी कम हो गया है। कुम्भकारों की राय है कि पहले दीपावली से दो तीन महीना पहले ही सामान बनाने लगते थे। लेकिन मांग के अनुकूल तब भी मिट्टी के बर्तनों की किल्लत रहती थी । लेकिन अब यह स्थिति नहीं है। बाजार में इलेक्ट्रोनिक दीपों के आने से शहरी क्षेत्रों में प्रतिकूल असर पड़ा है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी के बर्तनों की मांग पूर्ववत ही है।