
सुपौल : गली-गली पसीना बहाने के साथ सोशल मीडिया से भी प्रचार पर जोर
बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार का तरीका बदल रहा है। राजनीतिक दल अब सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं, क्योंकि मोबाइल कनेक्शनों की संख्या बढ़ी है। भाजपा ने सोशल मीडिया पर विज्ञापन जारी करने की अनुमति मांगी है। इस बार चुनावी गीतों की मांग कम हो गई है, और इवेंट कंपनियों पर अधिक निर्भरता बढ़ रही है।
सुपौल, हिन्दुस्तान संवाददाता। बिहार विधानसभा में चुनाव प्रचार का ट्रेंड बदल रहा है। मोबाइल फोन यूजर्स की लगातार बढ़ रही संख्या की वजह से राजनीतिक दलों का गली-गली पसीना बहाने के साथ सोशल मीडिया मंच से भी प्रचार करने पर जोर है। जिले के पांचों विधानसभा चुनाव में उतरे तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों ने 9 नवंबर तक फेसबुक, एक्स और यू-ट्यूब समेत सोशल मीडिया मंचों पर विज्ञापन प्रसारित करने की अनुमति मांगी है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय की ओर से जांच करने के बाद विज्ञापनों को प्रसारित करने की मंजूरी दी गई है, जबकि तथ्य मानकों के अनुरूप नहीं होने की वजह से कुछ विज्ञापनों को अस्वीकृत कर दिया गया है।

सोशल मीडिया पर विज्ञापन प्रसारित करने की अनुमति लेने में भाजपा सबसे आगे है। आंकड़ों के मुताबिक जिले में मोबाइल कनेक्शनों की संख्या आबादी से ज्यादा है। जिले में 14 लाख से ज्यादा मोबाइल कनेक्शन हैं। ऐसे में सोशल मीडिया जनता तक संदेश पहुंचाना बहुत आसान हो गया है। उपनिर्वाचन कार्यालय के मुताबिक, सोशल मीडिया पर चुनाव प्रचार के लिए विज्ञापन बनाने समय कई नियमों का पालन करना जरूरी है। इन विज्ञापनों में सेना की वर्दी और लोगो का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति से संबंधित कोई बयान नहीं दिया जा सकता है। देश की अखंडता को प्रभावित करने वाले चित्र या बयान नहीं दिए जा सकते हैं, जो विज्ञापन इन मापदंडों पर खरा नहीं उतरे, उन्हें स्वीकृति नहीं दी गई है। चुनाव प्रचार के लिए चार दिन बचा है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल अपनी पूरी ताकत चुनाव प्रचार में झोंक देंगे। अंतिम सप्ताह में सोशल मीडिया पर प्रचार वॉर भी बढ़ने की उम्मीद है। इस साल चुनाव में प्रत्याशियों के प्रचार में बजने वाले रोचक गीत कम सुनाई पड़ रहे हैं। वाहन और रिक्शे में बंधे लाउड स्पीकर पर बजने वाले रोचक चुनावी गीत भी बैनर-पोस्टर की तरह गायब हैं। इसकी जगह सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा है। इस बार विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों ने चुनावी गीतों से दूरी बनाई है। रिकॉर्डिंग स्टूडियो में चुनावी गीत तैयार करने वाले गीतकार, संगीतकार, गायक प्रत्याशियों की बाट जोह रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी घोषित होने के तुरंत बाद स्टूडियो में चुनावी गीत तैयार करने वालों की कतार लगी थी। स्टूडियो संचालक समय से गीत तक तैयार नहीं कर पा रहे थे। अब हालात बदल गए हैं। अब प्रत्याशियों को रोचक गीतों के माध्यम से प्रचार में दिलचस्पी नहीं रही। मल्लिक चौक स्थित रिकॉर्डिंग स्टूडियो के आंनद कुमार ने बताया कि चुनावी गीत रिकॉर्ड कराने वालों की संख्या 75 फीसदी तक घट गई है। पहले 30-40 प्रत्याशियों के गीत रिकॉर्ड करने के ऑर्डर मिलते थे। इस चुनाव में एक दर्जन भी ऑर्डर नहीं मिले। शहर के ही एक और स्टूडियो संचालक ने बताया कि इस बार चुनावी गीत की मांग बहुत कम है। गीतकार, संगीतकार और गायकों के पास काम नहीं है। यहां भी 80 फ़ीसदी तक रिकॉर्डिंग का काम कम है। पार्टी और प्रत्याशी चुनाव प्रचार के लिए इवेंट कंपनियों का सहारा ले रहे हैं। ये कंपनियां चुनावी गीतों को तवज्जो नहीं दे रहीं हैं। बड़ी पार्टी के नेताओं का कहना है कि प्रचार का वही तरीका अपनाया जा रहा है जो लाभदायक हो। इसमें भी इवेंट कंपनी मदद करेगी।

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