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बिहार में यादवों का नेता कौन; आरजेडी और बीजेपी में किसका पलड़ा भारी?

बीजेपी ने पहली बार नित्यानंद राय को आगे कर गोवर्धन पूजा पर यदुवंशियों का मिलन समारोह आयोजित किया। वहीं दूसरी ओर आरजेडी प्रमुख लालू यादव ने बीजेपी की पहल को यदुवंश को खंडित करने की साजिश करार दिया।

बिहार में यादवों का नेता कौन; आरजेडी और बीजेपी में किसका पलड़ा भारी?
Malay Ojhaलाइव हिन्दुस्तान,पटनाWed, 15 Nov 2023 07:45 PM
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बिहार में यदुवंश पर दावेदारी को लेकर सियासी संग्राम छिड़ गया है। बीजेपी ने पहली बार नित्यानंद राय को आगे कर गोवर्धन पूजा पर यदुवंशियों का मिलन समारोह आयोजित किया। वहीं दूसरी ओर आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने बीजेपी की पहल को यदुवंश को खंडित करने की साजिश करार दिया। दरअसल,बिहार सरकार की हालिया रिपोर्ट ही बताती है कि अभी वहां कुल 209 जातियां हैं और इन सभी में सबसे अधिक यादव जाति के सदस्य हैं। इनकी आबादी एक करोड़ 86 लाख 50 हजार 119 है, जो कुल आबादी का 14.266 प्रतिशत है। अब इसी 14 फीसदी आबादी को अपनी ओर खिंचने के लिए आरजेडी और बीजेपी जुटी हुई हैं। अब ये तो आने वाले चुनाव में ही पता चलेगा कि क्या लालू यादव की आरजेडी के कोर वोटर यादव समुदाय को बीजेपी अपने पाले में ला पाएगी या नहीं?

इतिहास के पन्नों को पलटने पर देखते हैं कि जब 1990 में बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल को जीत मिली। तब वीपी सिंह ने मुख्यमंत्री के पद के लिए रामसुंदर दास का पक्ष लिया था जबकि चंद्रशेखर रघुनाथ झा के पक्ष में थे। ऐसे में लालू ने हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल को इस पद के लिए आंतरिक चुनाव कराने पर रजामंद कराया। करपुरी ठाकुर के निधन के बाद विपक्ष के नेता बने लालू का मानना था कि इस पद पर उनकी स्वाभाविक दावेदारी है। उन्हें इसमें जीत मिली और उन्होंने बिहार की कमान संभाली। इसके बाद लालू ने कभी मुड़ कर नहीं देखा।

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जब भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने राममंदिर के निर्माण के मुद्दे पर 1990 में रथयात्रा निकाली, तो लालू ने बिहार के समस्तीपुर में उनका रथ रोका और आडवाणी को गिरफ्तार किया। उससे उन्हें 1989 के भागलपुर दंगे से स्तब्ध मुसलमानों का व्यापक समर्थन मिला। अब मुसलमानों और ओबीसी का कांग्रेस का विशाल जनाधार लालू के साथ था और उन्होंने वस्तुत: किसी जागीरदार की तरह बिहार पर राज किया। उनपर अपराध और अराजकता को बढ़ावा देने के आरोप लगे। उनके विरोधियों ने उनपर जंगल राज के आरोप लगाए।

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बड़े वोट बैंक को साधने की कोशिश
जातीय गणना की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में यादवों की संख्या 14.26 फीसदी है। अगर इसमें से 20-30 फीसदी यादवों को पार्टी ने अपनी ओर कर लिया तो वह तीन-चार फीसदी हो जाती है। इतनी आबादी भाजपा के कोर वोटर मानी जाने वाली कई जातियों पर भारी पड़ेगी। पार्टी का मानना है कि पिछले दो लोकसभा चुनावों में यादवों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा को वोट दिया था। उसे और पक्का करने के लिए ही भाजपा इस बार बढ़-चढ़कर सामाजिक सम्मेलन करने जा रही है।

महागठबंधन को मात देने की है योजना  
दरअसल, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार का समीकरण कुछ और था। 2014 में जदयू के अकेले चुनाव लड़ने से लड़ाई त्रिकोणीय हो गया था जिसका लाभ भाजपा को मिला। वहीं 2019 में जदयू के साथ चुनाव लड़ने के कारण भाजपा को शत-प्रतिशत (17) सीटों पर सफलता हासिल हुई। इस बार चुनावी समीकरण अलग है। भाजपा के साथ छोटे दल हैं तो दूसरे खेमे में  राजद, कांग्रेस व वामदलों के साथ जदयू भी खड़ा है। 2015 के विधानसभा चुनाव का समीकरण लगभग यही था। उस चुनाव में महागठबंधन को दो-तिहाई सीटें मिली थी। उस चुनावी परिणाम से सशंकित भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में वह तमाम प्रयास करती दिख रही है जो अब तक उसने नहीं किया है।

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