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राहुल सांकृत्यायन से लेकर भिखारी ठाकुर तक आते थे सोनपुर मेले में

सोनपुर मेला

आजादी के पहले और कुछ बाद तक हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला साहित्यिक गतिविधियों का एक बड़ा सालाना केन्द्र हुआ करता था। लेकिन 90 के दशक से वे सारी परंपराएं या तो बंद हो गईं या उनका प्रवाह क्षीण हो गया, जो मेले की शान हुआ करती थीं। अंग्रेजों ने बेशक इस मेले को विश्व का सबसे बड़ा पशु मेला कहा था। लेकिन इसके समानांतर साहित्यिक- सांस्कृतिक चेतना भी भारतीय जन जीवन का आईना बनकर मेले में खड़ी रही।  

यह मेला साहित्य सर्जन की उर्वर भूमि रहा है। यही कारण है कि राहुल सांकृत्यायन, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री, साहित्य के दधीचि आचार्य शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, मथुरा प्रसाद दीक्षित,अर्जुन सिंह अशांत आदि  बड़े साहित्यकार भी इस मेले में आए थे। उद्देश्य था-मेले में उमड़ने वाले जन सैलाब को देखना, उन्हें अपनी रचनाओं का पात्र बनाना और उनके जीवन के खुरदुरे यथार्थ को व्यक्त करना। यह पूरा मेला ग्रामीण जीवन का शुरू से ही जीवंत दस्तावेज रहा है।

आसपास के बुजुर्ग अपने बुजुर्गों से सुनी कहानी बताते हैं, लगभग सौ साल पहले तक देश के रजवाड़ों के कैंपों में शास्त्रीय संगीत की महफिलें तो जमती ही थीं, कविता और शेरों-शायरी की दिलकश छटा भी बिखरती थी। तब मेले में सूफी संप्रदाय के रचनाकार भी आते थे और सात दिनों तक सूफी साहित्य और सुफियाना गीतों के जलवे कायम रहते थे। खास बात यह कि सूफी रचनाकार अपने कार्यक्रम की शुरुआत अमीर खुसरो की इस रचना से किया करते थे-

गोरी सोवत सेज पर मुख पर डाले केस
चल खुसरो घर आपनो, रैन भई सब देश।
दरअसल, यह गीत खुसरो ने अपने गुरु निजामउद्दीन औलिया के निधन के शोक में लिखा था। इसका अर्थ गंभीर और संसार की नश्वरता से जुड़ा है लेकिन कुछ लोग इसे शृंगारपरक रचना मानने की भूल कर बैठते हैं। इस गीत के बाद ही खुसरों के दूसरे गीतों की चर्चा हुआ करती थी। अब वो बात नहीं पर वह परंपरा किसी न किसी रूप में अपने को प्रकट करती हुई कायम है। मेले के सांस्कृतिक आयोजनों में आज भी दमादम मस्त कलंदर और छाप तिलक सब छीनी रे  मोसे नैना मिलाई के....जैसे सूफी गीत का दबदबा बना हुआ है। दूसरी तरफ मेले के कबीर सत्संग शिविरों में कबीर साहित्य पर लगातार तीन दिनों तक चर्चा चलती थी और आज भी वह परंपरा बनी हुई है। लेकिन कवि सम्मेलन या किसी प्रकार के साहित्य सम्मेलन जैसे कार्यक्रम अब नहीं होते। 

हाजीपुर राजनारायण कॉलेज के राजनीति विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष, कई पुस्तकों के रचयिता एवं समीक्षक डॉ. ब्रज कुमार पांडेय कहते हैं, मेले में 1942 के पहले बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का सम्मेलन हुआ था। उस सम्मेलन में देश के नामी-गिरामी साहित्यकार पहुंचे और साहित्य की दशा और दिशा पर चर्चा चली थी। मेले में राहुल सांकृत्यायन भी आया करते थे। उन्होंने अपनी पुस्तक- बोल्गा से गंगा तक में सोनपुर मेले का उल्लेख किया है। महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने तो मेले का भ्रमण कर एक लंबी कविता लिखी। महाकवि आरसी प्रसाद सिंह का भी मेले से खास लगाव था। कवि सम्मेलन हुआ करते थे और उनमें राज्य के बड़े कवियों की भागीदारी होती थी। इधर मेले में साहित्यिक आयोजनों में कमी आयी है जबकि समाज  इसकी जरूरत महसूस करता है। 

डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकों के लेखक कवि शालिग्राम सिंह ‘अशांत’ कहते हैं, मेले में साहित्यिक आयोजन कभी बुलंदी पर था, अब उसकी याद ही शेष है। 25 साल पहले तक कवि सूर्य कुमार शास्त्री की पहल पर हर साल मेले के मुख्य सांस्कृतिक मंच पर कवि सम्मेलन का आयोजन होता था, जिसमें  मैं भाग लिया करता था। कवि रामचंद्र सिंह त्यागी मंच का संचालन किया करते थे। पटना के गोपी वल्लभ, कलाधर, हाजीपुर के हरेकृष्ण, समस्तीपुर के राजमणि राय मणि, द्वारिका राय सुबोध, रेल कवि लालसा लाल तरंग आदि कई चर्चित कवि भाग लेते थे।  लेकिन, बाद में उस स्तर पर वह परंपरा समाप्त हो गई। 

कवि कपिलदेव सिंह कहते हैं कि 60 के दशक तक मेले में भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले जन कवि भिखारी ठाकुर भी आते थे। बिदेसिया उनका सबसे महत्वपूर्ण नाटक के जरिए वे ग्रामीण जीवन की आर्थिक व्यथा की कहानी भी कहा करते थे।
आज भी सोनपुर मेला सीना तान कर खड़ा है। बाजारवाद के दौर में भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। आज भी इस मेले में पूरा गांव दिखता है। हमारी संस्कृति दिखती है। आज भी इस मेले में छोटी-छोटी खुशियां खरीदते हुए गांव के लोग दिखते हैं। शहरी बाबू भी यहां आकर अपने बचपन में खो जाते हैं, तभी तो अपने बेटे को कंधे पर लेकर मेला देखते नजर आते हैं। सच कहिए तो हमारी संस्कृति सोनपुर मेले में हमेशा जीवंत दिखती है। हाल के दिनों में पर्यटन विभाग की ओर से गीत-संगीत के कार्यक्रम कराए जा रहे हैं। लोग भी जुट रहे हैं, लेकिन इनके जरिए कोई संदेश फूटता हुआ नहीं दिखता। दूसरी तरफ साहित्यिक गतिविधियां भी ठप पड़ गई हैं। अगर इन सब चीजों पर फिर से पहल हो, तो सोनपुर मेले की जीवंतता और बढेगी। जब देश-दुनिया के साहित्यकार-कलाकार यहां आएंगे, तो एक दूसरी छवि का निर्माण होगा और बिहार का गौरव सोनपुर मेला फिर से सबको अपने पास बुलाएगा।

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  • Web Title:Rahul Sankrityayan and Bhikhari Thakur come to Sonpur fair