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कभी नीतीश-लालू ने बुलंद किया था 'सौ में साठ' का नारा, अब आरक्षण का दायरा 75% तक पहुंचाया

बिहार में आरक्षण संसोधन अधिनियम लागू हो गया है। जिसके तहत रिजर्वेशन का दायरा 60 से 75 फीसदी तक बढ़ गया है। कभी लालू-नीतीश ने सौ में साठ का नारा दिया था। और अब हकीकत में बदल दिया है।

कभी नीतीश-लालू ने बुलंद किया था 'सौ में साठ' का नारा, अब आरक्षण का दायरा 75% तक पहुंचाया
Sandeepहिन्दुस्तान ब्यूरो,पटनाWed, 22 Nov 2023 09:05 AM
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बिहार में राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद आरक्षण संशोधित अधिनियम लागू हो गया है। इसके साथ ही राज्य सरकार की नौकरियों और तमाम शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के नए मानक लागू हो गए हैं। लेकिन आरक्षण दायरा बढ़ाने की मांग काफी पुरानी है। कभी नीतीश कुमार और लालू प्रसाद ने पिछड़ों के लिए 60 फीसदी आरक्षण का नारा बुलंद किया था। अब यह उनके ही समय में हकीकत बन रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 75 फीसदी कर दिया है, इसमें 65 फीसदी पिछड़ों-अति पिछड़ों, एससी-एसटी के लिए है। 

डॉ. राम मनोहर लोहिया ने 60 के दशक में पिछड़ी जातियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए नारा दिया था-‘संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’। करीब छह दशक बाद यह विचार जमीन पर उतरा है। इसे अमलीजामा पहनाने के लिए नीतीश कुमार ने पहले जातीय सर्वे करवाया और सभी जातियों की आर्थिक स्थिति की भी जानकारी एकत्र की। इसमें पिछड़ी जातियों का पिछड़ापन सामने आया। इसी की परिणति आरक्षण की सीमा में बढ़ोतरी के रूप में हुई है। 

मालूम हो जिन नेताओं ने भारतीय समाज और राजनीति को सबसे ज्यादा प्रभावित किया, उनमें लोहिया भी प्रमुख हैं। खासकर उत्तर भारत की राजनीति आज जैसी है और समाज की संरचना जिस तरह बदली है और पिछड़ी जातियों का जिस तरह शासन में हिस्सा बढ़ा है, उसकी मूल परिकल्पना राममनोहर लोहिया की ही थी। इसलिए उन्हें भारत की मूक क्रांति का नायक कहा जाता है। ग्वालियर में रानी के खिलाफ एक दलित को लड़ाकर, चुनाव को रानी बनाम मेहतरानी बनाने वाले भी लोहिया ही थे। दरअसल, लोहिया के नारे संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ को कांग्रेस के भीतर भी पिछड़ा वर्ग के लोगों ने सूत्रवाक्य के रूप में मान लिया। चौधरी चरण सिंह ने इस आवाज को और बुलंद किया।

इसी बीच बिहार में कर्पूरी ठाकुर सीएम बने। इसके बाद तो पिछड़ों की राजनीति तेजी से आगे बढ़ी। गैर कांग्रेसवाद ने इस नारे को पकड़ लिया। 1967 में 9 राज्यों में कांग्रेस की हार हो गयी। इसी समय 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी और इसके बाद बिहार के बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग का गठन हुआ। जनता पार्टी की सरकार जाते-जाते आयोग ने रिपोर्ट दे दी। आयोग ने माना कि देश में 52 फीसदी पिछड़े हैं। 1989 में वीपी सिंह की सरकार बनने के बाद आयोग की सिफारिशों को आधार मानकर पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण देने का निर्णय लिया गया।

इधर, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के केन्द्र में आ चुके थे। उन्होंने पिछड़ा वर्ग की राजनीति को आगे बढ़ाया। 2005 में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने पिछड़ों को सशक्त बनाने के अपने संकल्प को फिर से दोहराया। हालांकि उन्होंने इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे सभी वर्गों के पिछड़ों को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने इसी हिसाब से योजनाएं बनायीं और उसे कार्यान्वित किया। गौरतलब है कि राज्य में आरक्षण की सीमा बढ़ाने का फैसला सर्वसम्मति से लिया गया है। सभी दलों ने सदन में इसका समर्थन किया था।

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