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Hindi News बिहारआरजेडी भूमिहार तो बीजेपी यादवों को साधने में जुटी, चुनाव से पहले बनाई खास रणनीति

आरजेडी भूमिहार तो बीजेपी यादवों को साधने में जुटी, चुनाव से पहले बनाई खास रणनीति

बिहार के भूमिहार के बारे में कई तरह की कहावतें प्रचलित हैं। इनके बारे में माना जाता है कि आबादी कम होने पर भी राजनीतिक रूप से ये हमेशा प्रभावी रहे हैं। माहौल बनाने में इनका कोई जोड़ नहीं है।

आरजेडी भूमिहार तो बीजेपी यादवों को साधने में जुटी, चुनाव से पहले बनाई खास रणनीति
Malay Ojhaलाइव हिन्दुस्तान,पटनाMon, 13 Nov 2023 05:24 PM
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बिहार में नीतीश सरकार द्वारा 2 अक्टूबर 2023 को जातीय गणना की रिपोर्ट जारी करने के बाद से राज्य की सियासत में जाति की राजनीति शुरू हो गई है। प्रमुख राजनीति पार्टियां अलग-अलग जातियों को रिझाने में जुट गई हैं। आरजेडी और बीजेपी बात करें तो दोनों ही राजनीतिक दलों ने भूमिहार और यादव समुदाय को अपने पाले में लाने के लिए खास रणनीति बनाई है। बिहार में जातीय गणना के आंकड़ों के हिसाब से भूमिहारों की आबादी 2.86 प्रतिशत है। इससे पहले यह आंकड़ा करीब साढ़े चार प्रतिशत था। लालू यादव की पूरी कोशिश है कि बीजेपी के पाले से सवर्ण वोटों को खासकर भूमिहारों को अपने पाले में करें। वहीं बीजेपी भी कहां पीछे रहने वाली है। आरजेडी के कोर वोटर यादव समुदाय को अपने पाले में लाने के लिए बीजेपी ने गोवर्धन पूजा के मौके पर यादव सम्मेलन का आयोजन किया है। बीजेपी की ओर से दावा किया गया है कि 15 हजार से अधिक यादव पार्टी की सदस्यता लेंगे। 

बिहार के भूमिहार के बारे में कई तरह की कहावतें प्रचलित हैं। इनके बारे में माना जाता है कि आबादी कम होने पर भी राजनीतिक रूप से ये हमेशा प्रभावी रहे हैं। माहौल बनाने में इनका कोई जोड़ नहीं है। गौर करने वाली बात है कि बिहार में महागठबंधन सरकार का नेतृत्व जेडीयू कर रही है। इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह हैं। ललन सिंह भूमिहार जाति के हैं। बिहार की सरकार में कांग्रेस भी शामिल है। इस पार्टी के बिहार अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह हैं। वे भी भूमिहार बिरादरी से आते हैं। बिहार से ही मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं गिरिराज सिंह। वे बेगूसराय से लोकसभा के सांसद हैं। गिरिराज सिंह भी भूमिहार जाति के हैं। बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं विजय कुमार सिन्हा। राज्य में बीजेपी और जेडीयू के गठबंधन वाली सरकार में वे विधानसभा के अध्यक्ष थे। विजय कुमार सिन्हा भी भूमिहार जाति के हैं। आरजेडी को छोड़ कर बाकी छोटी बड़ी पार्टियों में भूमिहार टॉप पर हैं।

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2005 के बाद बिहार की सत्ता में आरजेडी बाहर है। मतलब सीएम की कुर्सी तक लालू परिवार की पहुंच नहीं है। 2019 में तो लोकसभा से भी लालू की पार्टी आउट हो गई। ऐसे में लालू यादव मुस्लिम के साथ सवर्णों को साधने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों की माने तो संख्या बल भले कम है लेकिन भूमिहार के बाहुबल और उनके दिमाग का लोहा तो सब मानते हैं। इस समाज के लोगों को बीजेपी का परंपरागत वोटर माना जाता है। जिसपर अब आरजेडी की नजर है। लालू यादव और राबड़ी देवी की सरकार में भूमिहार और यादवों के बीच कई जातीय संघर्ष हुए, लेकिन अब तो आरजेडी का मन भी बदल गया है। बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने भूमिहारों से समर्थन की अपील की। वे बोले आप चिंता न करें, अभी मेरा बहुत लंबा राजनीतिक सफर है। आपका दरवाजा हमारे लिए खुला रहना चाहिए। बिना बीजेपी का नाम लिए उन्होंने कहा कि कुछ लोग आपको ठगते रहते हैं।

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वहीं दूसरी ओ बीजेपी आरजेडी के कोर वोटर माई (मुस्लिम और यादव) समीकरण को साधने में जुट गई है। यादवों को अपनी ओर लाने और मुसलमानों का प्रतिकार कम करने के लिए भाजपा ने विशेष रणनीति बनाई है। भाजपा द्वारा पटना के बापू सभागार में यादव सम्मेलन को इसी कड़ी से जोड़कर देखा जा रहा है। यादवों को केंद्रित कर बिहार भाजपा पहली बार इस तरह का कोई बड़ा आयोजन कर रही है। वैसे तो यह आयोजन बिहार भाजपा की ओर से हो रहा है लेकिन इसके मुख्य सूत्रधार व कर्ता-धर्ता केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय हैं। पार्टी की यह भी कोशिश है कि उस दिन के आयोजन में दल के केंद्रीय नेतृत्व से किसी वरीय नेता को बुलाया जाए। केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव को उस दिन के कार्यक्रम में बुलाने की बात चल रही है। सम्मेलन में यादवों को रिझाने का भी पूरा इंतजाम किया गया है। इसके लिए महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण का अभिनय करने वाले दिग्गज अभिनेता नीतीश भारद्वाज को बुलाया गया है। वे भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का मंचन करेंगे। 

बड़े वोट बैंक को साधने की कोशिश
जातीय गणना की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में यादवों की संख्या 14.26 फीसदी है। अगर इसमें से 20-30 फीसदी यादवों को पार्टी ने अपनी ओर कर लिया तो वह तीन-चार फीसदी हो जाती है। इतनी आबादी भाजपा के कोर वोटर मानी जाने वाली कई जातियों पर भारी पड़ेगी। पार्टी का मानना है कि पिछले दो लोकसभा चुनावों में यादवों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा को वोट दिया था। उसे और पक्का करने के लिए ही भाजपा इस बार बढ़-चढ़कर सामाजिक सम्मेलन करने जा रही है।

महागठबंधन को मात देने की है योजना  
दरअसल 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार का समीकरण कुछ और था। 2014 में जदयू के अकेले चुनाव लड़ने से लड़ाई त्रिकोणीय हो गया था जिसका लाभ भाजपा को मिला। वहीं 2019 में जदयू के साथ चुनाव लड़ने के कारण भाजपा को शत-प्रतिशत (17) सीटों पर सफलता हासिल हुई। इस बार चुनावी समीकरण अलग है। भाजपा के साथ छोटे दल हैं तो दूसरे खेमे में  राजद, कांग्रेस व वामदलों के साथ जदयू भी खड़ा है। 2015 के विधानसभा चुनाव का समीकरण लगभग यही था। उस चुनाव में महागठबंधन को दो-तिहाई सीटें मिली थी। उस चुनावी परिणाम से सशंकित भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में वह तमाम प्रयास करती दिख रही है जो अब तक उसने नहीं किया है।