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बरसात में शादी, जाड़े में तलाक; महागठबंधन सरकार के 17 महीने में नीतीश को लालू से दूर ले गए ये 17 कांड

बिहार में लालू यादव और नीतीश कुमार की दोस्ती फिर टूट चुकी है। नीतीश ने आरजेडी के साथ सरकार चलाने में दिक्कत का हवाला देते हुए महागठबंधन सरकार का इस्तीफा दे दिया। अब वो बीजेपी के साथ सरकार बना रहे हैं।

बरसात में शादी, जाड़े में तलाक; महागठबंधन सरकार के 17 महीने में नीतीश को लालू से दूर ले गए ये 17 कांड
Ritesh Vermaलाइव हिन्दुस्तान,पटनाSun, 28 Jan 2024 04:48 PM
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बिहार की राजनीति के बडे़ भाई लालू यादव और छोटे भाई नीतीश कुमार की दोस्ती एक बार फिर टूट गई है। 17 महीने लंबी चली इस पारी में 17 ऐसे कांड हुए जिससे लालू और नीतीश एक-दूसरे से दूर होते गए और बात यहां तक पहुंच गई कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों का इंडिया गठबंधन बनाने के सूत्रधार नीतीश वापस बीजेपी के ही पास पहुंच गए हैं। नीतीश ने अगस्त 2022 में बनी महागठबंधन सरकार का जनवरी 2024 में इस्तीफा देने के बाद एनडीए सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है। सरकार में बीजेपी की तरफ से सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा उनके नए डिप्टी सीएम होंगे। बीजेपी के पूर्व डिप्टी सीएम लिस्ट में शामिल तारकिशोर प्रसाद, रेणु देवी और सुशील मोदी को मौका नहीं मिला। एक संक्षिप्त नजर डालते हैं 17 कांड पर जिससे महागठबंधन सरकार का दूसरी बार पतन हो गया है।

1. फरार रहते कानून मंत्री की शपथ, विवाद के बाद कार्तिक सिंह का इस्तीफा- नीतीश के नेतृत्व में महागठबंधन की दूसरी सरकार बनने के अगले ही दिन कानून मंत्री कार्तिक सिंह पर लंबित केस और वारंट को लेकर विवाद खड़ा हो गया। बीजेपी ने आरोप लगाया कि फरार रहते हुए कार्तिक ने शपथ ली। कार्तिक को पहले कानून से गन्ना मंत्री बनाया गया और फिर उसी महीने इस्तीफा हो गया। शुरू में ही आरजेडी कोटे के मंत्री की वजह से इस विवाद ने नीतीश के मन में खटास का बीज बो दिया।

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2. चोरों का सरदार विवाद और मंत्री सुधाकर सिंह का इस्तीफा- नीतीश सरकार से आरजेडी कोटे के मंत्रियों में दूसरा इस्तीफा हुआ सुधाकर सिंह का जो कृषि मंत्री रहते सार्वजनिक रूप से खुद को चोरों का सरदार बता रहे थे। नीतीश को लेकर जगदानंद सिंह के बेटे सुधाकर के तेवर ने दो महीने तक आरजेडी और जेडीयू के रिश्तों में तनाव भरे रखा। आखिर में 2 अक्टूबर को सुधाकर सिंह ने इस्तीफा दिया। नीतीश के खिलाफ सुधाकर का बोलना जारी रहा।

3. मंत्री चंद्रशेखर की विवादित बयानबाजी- आरजेडी कोटे के तीसरे मंत्री चंद्रशेखर महागठबंधन सरकार के दौरान रामचरितमानस को लेकर लगातार विवादित बयान देते रहे। नीतीश कुमार ने कई बार कहा कि किसी को ऐसी बात नहीं करनी चाहिए जिससे किसी की भावना आहत हो लेकिन चंद्रशेखर चुप नहीं हुए। लालू ने इस मामले में कोई निर्णायक हस्तक्षेप नहीं किया। चंद्रशेखर नीतीश के पसंसीदा आईएएस अफसर केके पाठक से अलग लड़ते रहे। कुछ दिन पहले ही नीतीश ने उनको शिक्षा से हटाकर गन्ना में भेजा था। कार्तिक को भी इस्तीफा से पहले कानून से हटाकर गन्ना ही भेजा गया था।

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4. देवी-देवता के खिलाफ आरजेडी विधायक फतेह बहादुर कुशवाहा की बयानबाजी- शिक्षा मंत्रालय से हटाकर गन्ना विभाग में भेजे गए मंत्री चंद्रशेखर की ही तरह आरजेडी के विधायक फतेह बहादुर कुशवाहा भी लगातार देवी-देवताओं के खिलाफ बोलते रहे। फतेह ने कभी देवी दुर्गा पर सवाल उठाया तो कभी मां सरस्वती पर। नीतीश की नाराजगी के बाद भी लालू ने इनको कंट्रोल नहीं किया।

5. तेजस्वी यादव के सीएम बनने पर जगदानंद सिंह की बयानबाजी, सुनील सिंह का नीतीश पर लगातार हमला- प्रदेश रजाद अध्यक्ष जगदानंद सिंह महागठबंधन सरकार बनने के कुछ महीने बाद से ही तेजस्वी यादव को सीएम बनाने की बात करने लगे। सिंह के बयान का ये मतलब निकाला जाता था कि नीतीश और लालू के बीच कोई डील हुई है जिसमें तेजस्वी को सीएम बनाने की कोई तारीख मुकर्रर है। इसे नीतीश की ताकत को कमतर दिखाने की कोशिश के तौर पर लिया गया। जगदानंद की भी बयानबाजी लंबे समय तक चली। लालू यादव के करीबी और राबड़ी देवी के मुंहबोले भाई सुनील कुमार सिंह ने भी लगातार नीतीश को सोशल मीडिया पर घेरा जिसे रोकने में आरजेडी नाकाम रही।

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6. तमिलनाडु में बिहारियों की कथित पिटाई और फिर सनानत विरोधी बयान- तमिलनाडु में पहले तो बिहार के मजदूरों की कथित पिटाई की वजह से महागठबंधन में तनाव पैदा हुआ क्योंकि तमिलनाडु में सरकार चला रही डीएमके कांग्रेस की सहयोगी है। बाद में डीएमके प्रमुख और सीएम स्टालिन के बेटे उदयनिधि के सनातन विरोधी बयानों की वजह से नीतीश नाराज हो गए। दक्षिण भारत के वोटरों को साधने के चक्कर में डीएमके नेताओं के सनातन विरोधी बयानों से हिन्दी पट्टी में बीजेपी को कांग्रेस और उसके सहयोगियों पर हमला बोलने का मौका देने से नीतीश व्यथित थे।

7. राहुल गांधी को दूल्हा बताकर लालू यादव ने नीतीश को और दुखी किया- पटना में इंडिया गठबंधन की पहली बैठक में ना संयोजक की बात हुई और ना पीएम कैंडिडेट की। बस ये तय हुआ कि सब साथ रहेंगे, सब साथ लड़ेंगे। लेकिन उसी बैठक में लालू यादव ने राहुल गांधी को दूल्हा और बाकी सबको बाराती कह दिया जिससे नीतीश राजनीतिक रूप से असहज हुए। इंडिया गठबंधन के सूत्रधार नीतीश को लालू से इशारों में राहुल को आगे बढ़ाने की उम्मीद नहीं थी।

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8. इंडिया गठबंधन की बेंगलुरु मीटिंग में नीतीश को संयोजक नहीं बनाना- इंडिया गठबंधन की पहली बैठक के बाद बेंगलुरु में जब दूसरी मीटिंग हुई तो लगा कि इस बार नीतीश को संयोजक बना दिया जाएगा। लेकिन वो बैठक भी बिना इस पर चर्चा के खत्म हो गई। इसकी वजह से नीतीश बिना मीडिया के सामने आए निकल गए। 

9. सितंबर से ही इंडिया गठबंधन में लटका सीट बंटवारा- इंडिया गठबंधन में नीतीश चाहते थे कि सीट का बंटवार जल्दी हो जाए जिससे पार्टी को सीट पता हो और फिर पार्टी कैंडिडेट तय करके मैदान में उतर जाए। नीतीश ये कहते रहे कि बीजेपी से लड़ना है तो मजबूती से लड़ना होगा। लेकिन मुंबई में इंडिया गठबंधन की तीसरी बैठक के बाद 1 सितंबर को जो जल्द सीट बंटवारे की बात हुई वो कांग्रेस ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए दिसंबर तक ठंडे बस्ते में डाल दी। और संयोग देखिए कि अब तक बिहार में सीट बंटवार नहीं हुआ था।

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10. ममता बनर्जी द्वारा मल्लिकार्जुन खरगे का नाम बतौर पीएम कैंडिडेट बढ़ाना- इंडिया गठबंधन की चौथी बैठक में भी नीतीश को संयोजक बनाने पर बात नहीं हुई। उलटा ममता बनर्जी ने कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पीएम कैंडिडेट बनाने की बात उछाल दी ताकि विपक्ष की तरफ से एक दलित चेहरा पीएम कैंडिडेट हो। नीतीश यहां से उखड़ गए। इसके बाद बीजेपी से उनकी बैकडोर बातचीत शुरू हो गई।

11. जेडीयू का आरजेडी में विलय का दबाव- सूत्रों का कहना रहा कि लालू यादव सीट बंटवारे की बातचीत में जेडीयू के आरजेडी में विलय की बात करते थे जिससे नीतीश चिढ़ रहे थे। नीतीश तो जीतनराम मांझी की हम को जेडीयू में मिलाना चाहते थे जिसके कारण मांझी एनडीए में चले गए। लालू सीट बंटवारे में तर्क देते थे कि दोनों दल एक हो जाएंगे तो सीट बंटवारा आसानी से हो जाएगा। नीतीश जेडीयू के अस्तित्व की कीमत पर कुछ भी करने को तैयार नहीं थे। यहां से लालू और नीतीश की सीधी तनातनी शुरू हो गई। 16 अक्टूबर को नीतीश आखिरी बार लालू से मिलने राबड़ी आवास गए थे और उसके तीन महीने बाद दही-चूड़ा भोज पर 15 जनवरी को।

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12. तेजस्वी को सीएम बनाने का दबाब बढ़ा रहे थे लालू यादव- सूत्रों का कहना है कि इधर कुछ समय से लालू यादव इस बात के लिए नीतीश पर दबाव बढ़ा रहे थे कि अब उनके बेटे और डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को सीएम बना दिया जाए। नीतीश पहले ही साफ कर चुके थे कि 2025 के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी ही नेतृत्व करेंगे लेकिन 2024 तक वो पद पर बने रहेंगे। लालू चाहते थे कि तेजस्वी सीएम के तौर पर ढंग का कार्यकाल देख लें ताकि उनकी खुद की छवि बन सके। नीतीश कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं थे इसलिए उन्होंने सरकार ही बदलने का विकल्प चुना जिसके लिए बीजेपी बेताब बैठी थी। बीजेपी 2024 के लोकसभा चुनाव में एक-एक सीट का हिसाब रख रही है और नीतीश के उस कैंप में रहने से होने वाले सीटों के नुकसान को उसे अंदाजा था। बिहार में कौन सीएम बनेगा, बीजेपी के लिए ये अभी बाद का मुद्दा है।

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13. शासन-प्रशासन में लालू यादव की दखलअंदाजी- सूत्रों का कहना है कि लालू यादव जब पटना में रहते हैं तो शासन और प्रशासन में यथासंभव दखल देते हैं। लोग उनके पास कोई काम लेकर चला जाता था तो वो बिना किसी संकोच के अफसरों को फोन लगा देते थे जो बात नीतीश को चुभ रही थी। वो पटना में सत्ता का एक और केंद्र बनता पंसद नहीं कर रहे थे।

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14. मनोज झा ठाकुर कविता विवाद- संसद में आरजेडी सांसद के ठाकुर कविता विवाद से भी नीतीश काफी नराज हुए। जेडीयू के कई नेताओं ने नीतीश की नाराजगी को आवाज दी और कहा कि इस तरह की कविता को पढ़ने की कोई जरूरत नहीं थी जिससे एक समुदाय आहत हो। नीतीश को एक समय के बाद ये लगा कि आरजेडी उनकी सुनती ही नहीं है। ना लालू ने सुधाकर को रोका, ना चंद्रशेखर को चुप कराया, ना फतेह बहादुर की बोलती बंद कराई और फिर मनोज झा की कविता से राजपूतों की नाराजगी।

15. महागठबंधन में सीट बंटवारा का विवाद- इंडिया गठबंधन में सीट बंटवारा में छह दलों की डिमांड पूरी नहीं हो पा रही थी और उसमें जेडीयू ने अपनी सिटिंग 16 सीटों पर कोई बातचीत नहीं करने की शर्त रख दी। बची हुई 24 सीट में आरजेडी, कांग्रेस और तीनों लेफ्ट पार्टी का इगो संतुष्ट नहीं हो रहा था। नीतीश के सामने सीटें कम लेने और कुछ सिटिंग सीट छोड़ने का दबाव था जिसके लिए वो तैयार नहीं थे। बीजेपी उन्हें 2019 की तरह 17 सीट का डील देने को तैयार बताई जा रही है।

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16. ललन सिंह आरजेडी झुकाव विवाद- नीतीश और लालू के बीच दूरी की एक वजह कथित तौर पर ललन सिंह की लालू से बढ़ती नजदीकी भी बताई जाती है। चर्चा ये रही है कि तेजस्वी को सीएम बनाने की लालू की कोशिश में ललन सिंह सहयोगी बनते नजर आ रहे थे। नीतीश ने इसलिए ललन सिंह के पर कतरे। पहले तो ललन सिंह से लोकसभा चुनाव लड़ने के नाम पर इस्तीफा करवाया और फिर जेडीयू अध्यक्ष बन गए ताकि गठबंधन बदलने का फैसला लेने में कोई बाधा ना पैदा कर सके।

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17. शिक्षक बहाली और दूसरे काम का श्रेय लेने की नीतीश और तेजस्वी में होड़- अक्टूबर के बाद से ही नीतीश और लालू के रिश्तों में खटास ने खटपट और फिर खाई का रूप ले लिया। इसलिए नवंबर के बाद से महागठबंधन सरकार के काम का श्रेय लेने की होड़ लग गई। 2 नवंबर को शिक्षक नियुक्ति पत्र वितरण में मंच पर तेजस्वी का फोटो नहीं था तो बाद में तेजस्वी की पार्टी ने कई पोस्टर लगवाए। उसके बाद से तेजस्वी को सरकारी विज्ञापनों में कम तरजीह मिल रही थी। स्वास्थ्य विभाग तक के विज्ञापन में तेजस्वी का फोटो नहीं लगता था। श्रेय की ये लड़ाई आज सुबह भी दिखी जब सरकार का पतन तय देखकर आरजेडी ने बिहार के सारे अखबारों में पहले पेज पर विज्ञापन देकर तेजस्वी को पिछले 17 महीने में जातीय गणना समेत बाकी काम के लिए धन्यवाद दिया है।

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