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Hindustan Special: बिहार के कोसी इलाके में भी अब चाय की होगी खेती असम के वैज्ञानिक देंगे प्रशिक्षण

अब बिहार में हो रही चाय की खेती का रकबा और इसकी गुणवत्ता बढ़ेगी। किसानों की आय बढ़ाने के लिए उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ देशभर में इसका प्रचार-प्रसार भी किया जायेगा।

Hindustan Special: बिहार के कोसी इलाके में भी अब चाय की होगी खेती असम के वैज्ञानिक देंगे प्रशिक्षण
Malay Ojhaप्रतीक कुमार,भागलपुरTue, 14 Nov 2023 08:52 PM
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अब बिहार में हो रही चाय की खेती का रकबा और इसकी गुणवत्ता बढ़ेगी। किसानों की आय बढ़ाने के लिए उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ देशभर में इसका प्रचार-प्रसार भी किया जायेगा। इसको लेकर बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर और असम कृषि विश्वविद्यालय के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किया है। इसके तहत बिहार में वर्षों से उपेक्षित चाय की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। इसकी न सिर्फ ब्रांडिंग की जा सकेगी, बल्कि खेती और मार्केटिंग से लोगों को रोजगार भी मिलेगा और आय भी बढ़ेगी। करार के तहत असम के वैज्ञानिक यहां आकर वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित करेंगे। किसानों को प्रशिक्षित करने के लिए मास्टर ट्रेनर तैयार करेंगे। ये मास्टर ट्रेनर प्रगतीशील किसानों को प्रशिक्षण देंगे। कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सत्यनारायण कुमार ने बताया कि अभी तक किशनगंज के सिर्फ पांच प्रखंडों में ही चाय की खेती होती है। वह भी वैज्ञानिक तरीके से नहीं होती है। यहां किसान पौधों का रखरखाव ठीक से नहीं करते हैं। प्रोसेसिंग ठीक से नहीं करते हैं। मार्केटिंग एवं वैल्यू एडीशन नहीं आता है। इस कारण उन्हें जो आय हो सकती है, वह नहीं हो रही है।

किशनगंज में अभी चाय की 11 फैक्ट्रियां
प्राचार्य ने बताया कि अभी किशनगंज में ही चाय की खेती होती है और यहां अभी 11 फैक्ट्री हैं। लेकिन यहां चाय की खेती की जो क्षमता है, वह नहीं हो रही है। इसलिए इस क्षमता को बढ़ाना है। इतना ही नहीं, आसपास के अन्य जिलों की भी भौगोलिक स्थिति यही है। इसलिए कटिहार, मधेपुरा, पूर्णिया, सहरसा, सुपौल आदि कोसी के जिलों में इसकी खेती शुरू की जाएगी और यहां की संभावनाओं के अनुसार उसे बढ़ावा दिया जाएगा। इसमें टी बोर्ड ऑफ इंडिया और टी रीसर्च एसोसिएशन के साथ मिलकर भी काम किया जाएगा। बाद में उस विवि से हॉर्टिकल्चर, फ्लोरीकल्चर आदि में भी काम होगा। बीएयू और असम विवि के करार के तहत दोनों विवि के बीच छात्र एक्सचेंज प्रोग्राम भी होगा।

असम की तरह यहां भी 30 बार पत्ते तोड़े जाएंगे
असम में चाय के खेत में साल में 30 बार पत्ते तोड़े जाते हैं, जबकि यहां पर आठ से 10 बार पत्ते टूटते हैं। वह भी मशीन से तोड़ा जाता है। इससे पौधों को भी नुकसान होता है। इसलिये छोटी मशीन तैयार की जाएगी ताकि यहां भी 30 बार पत्ते तोड़े जा सकें। डॉ. कलाम कृषि कॉलेज में दो एकड़ में चाय की खेती और शोध पर काम होगा। यहां असम से पौधे लाये जायेंगे और यहां टिश्यू कल्चर लैब में नये पौधे तैयार किये जायेंगे और उसे किसानों को दिये जायेंगे। असम के वैज्ञानिक यहां आयेंगे और यहां खेतों की मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर करने के साथ खेत को कैसे तैयार किया जाये इसको बतायेंगे। शोध केन्द्र में कीट रोग पर लगाम लगाने का प्रयास होगा।

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