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Hindustan Special: छठ पर बिना अरता-पात के नहीं संपन्न होती है पूजा, विदेशों तक है डिमांड

सारण जिले के झौंआ गांव में बने अरता पात की फिजी, सूरीनाम, मॉरीशस के अलावा अमेरिका, इंग्लैंड व अन्य देशों में भी पहुंच है। छठ के पांच माह पहले से ही इस गांव की महिलाएं अरता पात बनाने लगती हैं।

Hindustan Special: छठ पर बिना अरता-पात के नहीं संपन्न होती है पूजा, विदेशों तक है डिमांड
Malay Ojhaउमेश कुमार पाठक,छपराThu, 16 Nov 2023 10:51 PM
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सारण के पारंपरिक उत्पादों में अरता पात की अलग ही पहचान रही है। लोकआस्था से जुड़े महापर्व छठ में इसकी मांग काफी बढ़ जाती है। सारण जिले के झौंआ गांव में बने अरता पात की फिजी, सूरीनाम, मॉरीशस के अलावा अमेरिका, इंग्लैंड व अन्य देशों में भी पहुंच है। छठ के पांच माह पहले से ही इस गांव की महिलाएं अरता पात बनाने लगती हैं। यहां की बेटियां जब मायके से ससुराल जाती हैं तो अपने साथ यह हुनर भी ले जाती हैं। राज्य के कई जिलों के व्यापारी पहले से ही आर्डर देते हैं और तैयार होने पर ले जाते हैं। हालांकि इस दौरान बिचौलिए हावी रहते हैं और इसका नर्माण करने वालों मुनाफा कम होता है।

लाल रंग वाले अरता पात का उपयोग छठ में सूर्य देव को अर्घ्य देने के लिए होता है। पिछले करीब सात दशक से यह गांव पवित्र अरता पात के लिए जाना जाता है। अरता पत्ते ने गांव को स्थाई पहचान दी है। छठ में मानों पूरा गांव लाल महावर में रंग जाता है। ग्रामीण यशवंत प्रसाद बताते हैं कि यहां के बनाये अरता पात की बिक्री झारखंड के विभिन्न शहरों में भी होती है। गांव की लालपति देवी बताती हैं कि इसे बनाने में बड़ी मेहनत है। पहले अकवन की रुई खरीदकर मैदा में मिलाना, रंग का घोल बनाना, फिर सबको मिलाकर उबालना और मिट्टी के बरतन में रुई को गोल आकार देते हुए रंग डालना। यह प्रक्रिया है अरता पात बनाने की। गांव के ज्यादातर लोग इस काम में लगे हैं। छठ के पहले यहां हर घर के आगे, खेतों व उसकी पगडंडियों पर, झुरमुटों में बिछे लाल पत्ते बड़े जतन से सुखाए जाते हैं।

बाजारवाद का हुआ शिकार:
झौंवा का अरता पात भी बाजारवाद का शिकार है। इसे बनाने वाले मेहनतकशों को उसका वाजिब हक नहीं मिलता है। अरता पात की कीमत बाजार में आते-आते दोगुनी तो हो जाती है लेकिन गांववालों को उनकी बिक्री के लिए थोक खरीदार की बाट जोहनी पड़ती है। सैदपुर झौंवा गांव के लोग पिछले सात दशकों से इस पत्ते के निर्माण में जुटे हैं। पीढ़ियां गुजरती गईं और लाल पत्ता यहां के प्राय: सभी घरों में जीविका का अंग बनता गया। इसकी लोकप्रियता और उपयोगिता यह है कि इसे बनाने का हुनर और पत्ता वहां भी पहुंच गया जिस क्षेत्र में यहां की बेटियां ब्याही गईं। इस लिहाज से दो घरों की संस्कृति जोड़ने के साथ अरता पत्ता आर्थिक समृद्धि का भी जरिया बन जाता है।

व्यवसाय का दर्जा देने की जरूरत:
अरता पात निर्माण को व्यवसाय बनाने की जरूरत है ताकि यहां के लोगों का जीवन स्तर सुधरे। यह मानना है यहां की युवा पीढ़ी का, जिन्होंने अपने गांवों में पात बनते तो सालों से देखा है पर उन्हें बनाने वालों की तकदीर संवरते कभी नहीं देखी है। युवक धर्मनाथ कहते हैं कि महंगाई बढ़ गई। सब सामान ऊंची कीमत पर खरीदनी पड़ती है। व्यवसाय तो बस ललक और हुनर को जिंदा रखने के लिए है वरना लाभ तो बेहद कम है। इसे बनाने में शारीरिक नुकसान होता है। रुई को उबालते, धुंए को झेलते कई लोग टीबी के शिकार हो गए है। इलाज में भी मुश्किल होती है। यदि इसे व्यवसाय का दर्जा मिल जाए तो लोगों को आर्थिक मदद मिलेगी।

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