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बिहार में लू का कहर: गरीबों का कोई माई-बाप नहीं, न पानी मिलता है और न ठौर-छांव

कमला नेहरू नगर के जालंधर महतो सुबह चार बजे उठते हैं। रेलवे स्टेशन रिक्शा लेकर पहुंच जाते हैं। दस बजे तक रिक्शा चलाने के बाद शरीर जवाब देने लगता है। इसके बाद किसी छायादार पेड़ की तलाश कर उसके नीचे बैठ कर शाम होने का इंतजार करते हैं। शाम में आठ बजे तक रिक्शा चलाते हैं। इस बीच जो थोड़ी बहुत कमाई होती है उससे गुजारा चलता है। जालंधर महतो 1980 से रिक्शा चला रहे हैं। पहली बार गर्मी की यह स्थिति देखकर जालंधर महतो ने बताया कि ऐसी गर्मी तो पहले कभी महसूस नहीं हुई। 

गर्म हवा, धूल भरी धूप के साथ लू के थपेड़ों के बीच केवल जालंधर महतो ही नहीं बल्कि राम ईश्वर पासवान, उमेश, महेंद्र, अनिल यादव, श्याम बिहारी पासवास जैसे सैकड़ों मजदूर और रिक्शा चालक हैं, जिनकी रोजी रोटी तेज धूप के कारण प्रभावित होती है।  कमला नेहरू बस्ती के रहने वाले राम ईश्वर पासवान ने बताया कि 1982 से रिक्शा चला रहे हैं। पहले सड़क पर सरकारी नल होते थे, जहां हम प्यास बुझाते थे। बुद्ध मार्ग में एक पेड़ के नीचे बैठे राम ने बताया कि धूप में देर तक रिक्शा नहीं चला पाते हैं। 

ग्राहक के इंतजार में रहते पूरा दिन, नहीं आता कोई 
सड़क किनारे खुमचा वालों की स्थिति और भी खराब है। सुबह से ग्राहक का इंतजार करते हैं। जीपीओ किनारे सत्तू बेच रहे उमेश पासवान ने बताया कि मजदूर इलाके के लोग अधिक सत्तू पीने को आते थे। लेकिन उनकी भी अभी कमाई नहीं होती है, इस कारण ग्राहक नहीं आते है। वही आम पन्ना बेच रहे राजमनी ने बताया कि आम पन्ना नहीं बिकता है तो वो खराब हो जाता है। 

गांव छोड़कर कमाने के लिए शहर आए हैं। हर दिन 400-500 रुपये कमा लेते हैं, लेकिन दो दिन से 200 रुपये भी कमाना मुश्किल हो गया है। देखिए न तीन बज गए हैं और अभी तक सिर्फ 50 रुपये कमाये हैं...इतना कहकर सुनीत पासवान गंदे बोतल में रखे पानी को पीने लगे। फिर गमछे को मोड़कर सिर के नीचे दबाये और अपने रिक्शे पर उकड़ू होकर सोने की कोशिश करने लगे...। वैशाली के सराय अफजल गांव से राजधानी आये सुनीत की स्थिति तो एक उदाहरण भर है, राजधानी के लगभग सभी रिक्शेवालों की यही स्थिति है। गर्मी के कारण सुबह दस बजे के बाद रिक्शा चलाना लगभग बंद कर दे रहे हैं। 

सुपौल बाजार से राजधानी में आकर रिक्शा चला रहे 70 वर्षीय नूर मोहम्मद  पूछने पर कहने लगे- आसमान से आग बरस रहा है। सड़क पर लोग निकल ही नहीं रहे हैं, तो रिक्शेवाले की कमाई कहां से होगी। 10 बजे से सिन्हा लाइब्रेरी के पास ही हूं और तीन बज गए हैं। एक भी सवारी नहीं मिली। पास में पॉलिथीन में सतुआ रखकर खा रहे ठेला चालक बैद्यनाथ महतो कहने लगे, दो दिन से कोई कमाई नहीं हो रही है। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कैसे पेट चलेगा। 

गांधी मैदान ही सहारा
राजधानी में गर्मी का कहर जारी है। लोग घरों से कम निकल रहे हैं। एसी और कूलर लगातार चल रहे हैं, लेकिन कुछ जिंदगियां ऐसी हैं जो चौबीसों घंटे सड़क पर ही रह रही हैं। ऐसे में गर्मी की मार ये लोग कैसे झेल रहे हैं, सोचनेवाली बात है। राजकिशोर मंडल करीब 65 साल के हैं। गांधी मैदान में एक पेड़ के नीचे बैग लेकर बैठे हैं। दोपहर के दो बजे हैं। पूछने पर कहने लगे-1970 से राजधानी की सड़कों पर ही रह रहा हूं। दिहाड़ी मजदूर का काम करता हूं। इसी बैग में मेरा समान है। रोज कमाता हूं, सड़क किनारे के होटल में खाता हूं और सड़क किनारे ही सोता हूं। लेकिन तीन दिन से कोई काम नहीं मिला है। आज तो सुबह में ही हिम्मत नहीं हुई इधर-उधर जाने की। बस सतुआ खाया हूं और गांधी मैदान में पेड़ के नीचे आकर आराम कर रहा हूं। मुजफ्फरपुर में धरहरा गांव के राजकिशोर मंडल की तरह राजधानी में हजारों ऐसे गरीब हैं जिनकी जिंदगी सड़क पर ही चलती है, लेकिन गर्मी की मार से इन सब हलकान हैं। 

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  • Web Title:Heat wave Impact on common life in Bihar