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चुनावी समर में नहीं दिखेगा जार्ज का तूफान और रघुनाथ की हुंकार

Former Defence Minister George Fernandes dies in Delhi (File Pic)

बिहार की चुनावी सभाओं में लगभग छह दशक तक जिन नेताओं को एक साथ दो पीढ़ियों ने वर्षों तक सुना और देखा उनकी मौजूदगी इस बार नहीं दिखेगी। जार्ज साहब की सभाओं के गवाह अनिल सिन्हा ने कहा वे पिछले लोकसभा चुनाव में भी सक्रिय नहीं थे। मगर उनके जीवित होने का एहसास ही कार्यकर्ताओं में जोश भर देता था।  

पिछले पैंतीस साल से  मुजफ्फरपुर लोकसभा का शायद ही कोई चुनावी मंच होगा जिसमें जार्ज साहब की चर्चा न हो। 1980 की एक चुनावी सभा को याद करते हुए उन्होंने कहा कि  कार्यक्रम दो बजे का था। जार्ज तीन घंटे विलंब पांच बजे आए। एक भी आदमी सभा से नहीं खिसका। आए और हाथ उठाया...चारों ओर जार्ज जिंदाबाद के नारे लगने लगे। विलंब के लिए माफी मांगी तो हजारों हाथ एक साथ खड़े हो गए। कहा आप बस बोलते रहिए। तीन घंटे क्या तीन दिन तक इंतजार करेंगे। भाषण में हाथ भांजना, रेफरेंस के लिए अखबारों को लहराना और विपक्षियों पर हमले का अंदाज। बहुत याद आएंगे ये सब। उनके विरोधी पार्टी के एक नेता ने बताया कि जार्ज साहब का जादू ऐसा था कि उनकी सभा में छिपकर कई कांग्रेसी भाषण सुनते थे। नौ बार लोस चुनाव जीतने वाले जॉर्ज फर्नांडिस का इसी साल 29 जनवरी को निधन हो गया।

सभा में एलपी शाही भी याद आएंगे
ऐसी ही एक और शख्सियत एलपी शाही को उत्तर बिहार इस बार बहुत याद करेगा। कांग्रेस के पर्याय हो चुके एलपी शाही आजादी के बाद से ही राजनीतिक क्षितिज पर इस कदर चमके कि छह दशक की उनकी चमक वैसी ही बनी रही। एलपी शाही के साथ कई चुनावों में सक्रिय रहे मुकेश सिंह ने बताया धीरे-धीरे भाषण शुरू करना और फिर शब्द-शब्द में ओज भर देना उनकी खासियत थी। जब मैं तीस साल का था तो अपने 65 वर्षीय पिता के साथ  उनका भाषण सुनने गया था। अंदाज कीजिए तालियों के लिए दोनों के हाथ एक साथ उठते थे। यही उनकी खासियत थी। दो-दो पीढ़ियों का एक साथ नेतृत्व करते थे। शालीनता और आत्मीयता उनकी  सबसे बड़ी ताकत थी। मंच से नीचे उतरते ही हर व्यक्ति से वैसे मिलते थे जैसे वह कार्यकर्ता नहीं बल्कि परिवार का सदस्य हो।  1952 से लेकर निधन तक लगभग छह दशक तक एलपी शाही के शालीन व्यक्तित्व का प्रभाव बना रहा। कई लोकसभा क्षेत्रों में वे कांग्रेस की नैया पार लगाते रहे। 1952 से 1984 तक लगातार विधायक और 1984 में मुजफ्फरपुर से एमपी चुने गए एलपी शाही राजीव गांधी की सरकार में शिक्षा मंत्री भी बने। लंबे समय से बीमार एलपी शाही का 9 जून 2018 को निधन हो गया।  

रघुनाथ झा ने संघर्ष कर आसमान पाया
जमीन पर संघर्ष करते हुए आसमान पा लेने वाले एक और नेता थे, रघुनाथ झा। 1990 में लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले रघुनाथ झा अंतिम समय तक तक राजद के लिए खेवनहार बने रहे । मुखिया से लेकर केंद्रीय मंत्री तक का सफर करने वाले स्व. झा का सीतामढ़ी ,शिवहर, मोतिहारी, बेतिया, गोपालगंज से लेकर उत्तर और मध्य बिहार में जबरदस्त प्रभाव था। चार दशक के अपने संसदीय जीवन में रघुनाथ झा लगातार अपनी पार्टी राजद के खेवनहार बने रहे। अस्वस्थ होने के बावजूद पिछला चुनाव उन्होंने प. चंपारण से मजबूती से लड़ा था। हालांकि वे हार गए थे। 15 जनवरी 2018 को उनका निधन हो गया।

अनवारुल व रघुनाथ पांडे की खास पहचान
उत्तर बिहार के कई लोकसभा क्षेत्रों को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाले अनवारूल हक की कमी भी  इस बार पार्टी और जनता को जबरदस्त खलेगी। सीतामढ़ी-शिवहर के साथ ही उत्तर और पूर्व बिहार में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती थी। 1999 में शिवहर के सांसद चुने गए थे। चुनाव प्रचार में पार्टी इनका जबरदस्त इस्तेमाल करती थी। 12 अगस्त 2016 में उनका निधन हो गया। इसी तरह जब-जब कोई चुनाव आता है मुजफ्फरपुर के एक और चर्चित नेता रघुनाथ पांडे की चर्चा जरूर होती है। चुनाव लड़ने के उनके तरीके, बूथ मैनेजमेंट तथा समय की पाबंदी के उनके किस्से लोग बताते नहीं थकते हैं। लंबे समय तक उत्तर बिहार की राजनीति में सक्रिय रहे रघुनाथ पांडे का निधन 24 सितम्बर 2001 को हो गया था। 

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  • Web Title:George Fernandes storms will not appear in Bihars election season