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1 अक्तूबर, 2020|9:32|IST

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Bihar Vidhan Sabha Election 2020: लालू के लाल के साथ क्‍या कांग्रेस दोहरा पाएगी अपना पिछला प्रदर्शन

कहते हैं कि राजनीति में कुछ भी हो सकता है। जो आज साथ हैं कल विरोधी हो सकते हैं और जो कल तक धुर विरोधी थे वे कभी भी साथ आ सकते हैं। बिहार की राजनीति में महागठबंधन का हिस्‍सा बनकर कांग्रेस, मंडल राजनीति से पहले के दौर जैसी मजबूत स्थिति में लौटने के लिए कसमसा रही है। 2015 में 41 सीटों पर लड़कर 27 सीटें जीत लेने से उसके हौसले बुलंद हैं। राजनीति का यह संयोग भी दिलचस्‍प है कि मंडल राजनीति केे जिस दौर मेें प्रदेश से कांग्रेस का सफाया हो गया था, उस दौर के नायक रहे लालू यादव के बेटे तेजस्‍वी यादव ने ही आज महागठबंधन की कमान सम्‍भाल रखी है। अब देखना ये है कि लालू के लाल का समर्थन पाकर कांग्रेस अपना पिछला प्रदर्शन दोहराने में किस हद तक कामयाब हो पाती है।

2015 के चुनाव परिणामों से मिले अनुकूल संकेतों ने पार्टी के रणनीतिकारों को नई उम्‍मीद से भर दिया है। देश की आजादी के बाद के पांच दशकों मेें ज्‍यादातर वक्‍‍‍त तक बिहार पर कांग्रेस ने राज किया। 1952 से 2015 तक बिहार के 23 मुख्‍यमंत्रियों में से 18 कांग्रेेस के हुए। लेकिन 90 के दौर में मंडल की सियासत ने नए सामाजिक समीकरणों की ऐसी बयार बहाई कि सूबे से कांग्रेस का तंबू-कनात उखड़ गया। तबसे आज तक पार्टी कभी सत्‍ता में वापसी नहीं कर पाई। हालांकि आगे चलकर राममंदिर आंदोलन के साथ भाजपा की बढ़त ने समीकरणों में ऐसा उलट-फेर किया कि बिहार में कांग्रेस विरोध और मंडल सियासत की बयार बहाने वाले लालू यादव केंद्र में कांग्रेस और यूपीए के सबसे बड़े संकटमोचकों में शुमार हो गए। लालू तबसे यूपीए अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस के हिमायती बने हुए हैं। यहां तक कि बिहार में राजद और कांग्रेस के गठबंधन को अब प्राकृतिक और स्‍वाभाविक गठबंधन की संज्ञा दी जाने लगी है। 

मंडल सियासत में अलग-थलग पड़ गई कांग्रेस, बंट गया वोट बैंक
मंडल की सियासत में कांग्रेस राज्‍य में बिल्‍कुल अलग-थलग पड़ गई। उसका वोट बैंक पहले जनता दल फिर नी‍तीश और लालू की अगुवाई में उससे अलग हुए जनता दल यू और राजद में बंट गया। 1989 के भागलपुर दंगे से पहले मुस्लिम कांग्रेस के लिए ही वोट करते थे। बाद के समय में लालू यादव ने अपना 'माय' समीकरण बनाया और मुस्लिम वोटरों में अपनी गहरी पैठ बना ली। मुस्लिम उधर गए तो सवर्णों ने भाजपा का रुख कर लिया। राजनीतिक विश्‍लेषकों की नज़र में ऐसा होने की वजह कांग्रेस का असमंजस था। कांग्रेस तय नहीं कर पाई कि वह सवर्णों का साथ दे या पिछड़ों के साथ खुलकर खड़ी हो जाए। उधर, राममंदिर आंदोलन के चलते भाजपा की अगुवाई में एक नए तरह का ध्रुवीकरण हुआ और जनता यू और राजद ने अपने-अपने आधार वोट बैंक पर फोकस कर लिया। लिहाजा, अगले चुनावों में कांग्रेस बिहार के राजनीतिक परिदृश्‍य से गायब होती चली गई। 

तीन दशक बाद जमीन तैयार करने की कवायद 
तीन दशक के बाद बिहार में कांग्रेस ने एक बार फिर अपनी जमीन तैयार करने की कवायद शुरू कर दी है। पार्टी, जद यू और राजद से नाराज वोटरों को अपना बनाने और भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिशों में पिछले कई वर्षों से जुटी है। वर्ष 2015 के चुनाव में इसका असर भी दिखा जब महागठबंधन में मिलीं 41 सीटों पर लड़कर कांग्रेस ने 27 सीटों पर जीत हासिल की। 

सीटों को लेकर जारी है जोर आजमाईश 
2015 की जीत से आशान्वित कांग्रेस को इस बार बिहार में और अच्‍छे प्रदर्शन की उम्‍मीद है। लिहाजा वो महागठबंधन से ज्‍यादा सीटें मांग रही है। लेकिन राजद उसे 60 से ज्‍यादा सीटें देने को तैयार नहीं है। राजद के इस रुख से कांग्रेस में नाराजगी है। लेकिन बिहार के नेता गठबंधन तोड़ने के मूड में भी नहीं हैं। लिहाजा अब पूरा मामला आलाकमान के पास चला गया है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा है कि जल्‍द ही मामला सुलझा लिया जाएगा। सीटों की बात गठबंधन टूटने की हद तक नहीं पहुंचेगी।

माना जा रहा है कि कांग्रेस आलाकमान और राजद नेता तेजस्वी यादव के बीच इस मुद्दे पर जल्द बातचीत हो सकती है। इस बीच पार्टी ने अपने उम्मीदवारों के पैनल को अंतिम रूप दे दिया है। बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष मदन मोहन झा और विधायक दल के नेता सदानंद सिंह ने प्रदेश प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल और स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष अविनाश पांडे के साथ लंबी बैठक की। 

वरिष्ठ नेता तारिक अनवर और अखिलेश सिंह ने भी पार्टी वार रूम में गोहिल और पांडे से मुलाकात की। इसके बाद तारिक अनवर ने कहा कि दोनों पार्टियों के बीच बातचीत चल रही है। राजद और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ेंगे। जानकारी के मुताबिक पार्टी किसी वर्तमान विधायक का सामान्य तौर पर टिकट काटने के मूड में नहीं है। नये सीटों पर भी उम्मीदवारों की सूची में चयन किया जा रहा है।
 

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  • Web Title:Bihar assembly election 2020 can congress do miracle like before mandal politics lalu yadav nitish tejashwi yadav mahagathbandhan