ट्रेंडिंग न्यूज़

Hindi News बिहारगजब! बिहार में यहां तालाब में मछली उत्पादन संग ऊपर नाव पर हो रही आर्गेनिक सब्जियों की खेती

गजब! बिहार में यहां तालाब में मछली उत्पादन संग ऊपर नाव पर हो रही आर्गेनिक सब्जियों की खेती

बिहार का सहरसा सूबे का पहला जिला है जहां तालाब में नीचे मछली और ऊपर सब्जी का उत्पादन शुरू किया गया है। सहरसा जिले के कहरा प्रखंड के बनगांव और नवहट्टा के रमोती गांव में तालाब में 200-200 लीटर के आठ-आठ...

गजब! बिहार में यहां तालाब में मछली उत्पादन संग ऊपर नाव पर हो रही आर्गेनिक सब्जियों की खेती
सहरसा, रंजीत। Thu, 04 Mar 2021 07:25 PM
ऐप पर पढ़ें

बिहार का सहरसा सूबे का पहला जिला है जहां तालाब में नीचे मछली और ऊपर सब्जी का उत्पादन शुरू किया गया है। सहरसा जिले के कहरा प्रखंड के बनगांव और नवहट्टा के रमोती गांव में तालाब में 200-200 लीटर के आठ-आठ ड्रम लगाकर ऊपर नावनुमा बांस का मचान तैयार करते सब्जी उपजाने की व्यवस्था की गई है।

धूप और पानी में बर्बाद नहीं होने वाली ग्रो बैग में वर्मी कम्पोस्ट, नारियल की भूसी, लकड़ी का बुरादा, स्लिम स्वायल जैसी सामग्रियों का उपयोग डस्ट तैयार कर सब्जी उत्पादन के लिए किया गया है। मिट्टी की मात्रा तनिक भी नहीं डाली गई है। ना ही रसायनिक खाद का उपयोग किया गया है। दोनों जगहों पर पालक, लाल साग, करेला, बैगन और धनिया पत्ता की बुआई की गई है। जिला कृषि परामर्शी डॉ. मनोज कुमार सिंह ने कहा कि बनगांव में 8 और रमोती में 11 फरवरी को आर्गेनिक सब्जियों की बुआई की गई। अभी स्थिति यह है कि 10 से 12 सेंटीमीटर का एक पौधा हो गया है। इस तरह से सब्जी उत्पादन की वैकल्पिक व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि बाढ़ के दौरान भी सब्जियों की उपज होती रहे। किसानों को खाने के लिए सब्जी मिलती रहे। शेष सब्जी को चयनित किसान बाजार में बेचकर आय का जरिया भी इजाद कर सके। 

साउथ एशियन फोरम फॉर एनवायरमेंट के निदेशक अमृता चटर्जी और चिरंजीत चटर्जी ने कहा कि कृषि विभाग के द्वारा 25-25 की संख्या में चयनित किसानों के लिए पायलट प्रोजेक्ट के तहत तालाब में मुफ्त में सब्जी और मछली उत्पादन के लिए यह व्यवस्था की गई है। यह परियोजना किसानों को हाइड्रोपोनिक खेती और मत्स्य पालन में आपदा और जलवायु परिवर्तन के दौरान एक अनुकूली कदम के रूप में प्रशिक्षित करती है। खाद्य सुरक्षा, स्थाई आजीविका और वित्तीय सशक्तिकरण प्रदान करता है। 

सौर ऊर्जा से सिंचाई की व्यवस्था
हाइड्रोपोनिक खेती के तहत की गई सब्जी की खेती को सौर ऊर्जा के तहत पर्याप्त पानी मिल रहा है। सोलरचलित यंत्र का उपयोग सिंचाई के लिए किया जा रहा है। ऑटोमेटिक सिंचाई व्यवस्था के कारण सब्जी के पौधे में पानी डालने के लिए किसानों को अधिक मशक्कत भी नहीं करनी पड़ रही। निदेशक ने कहा कि पानी के कम उपयोग के लिए सूक्ष्म सिंचाई का उपयोग किया जाता है। कृषि सलाहकार चंदन कुमार ने कहा कि प्रतिदिन सब्जी फसल की निगरानी रखी जाती है। कहीं भी कीड़े लगने की अगर जानकारी मिलती तो तुरंत उसे दूर किया जाता है। जिला स्तर से जिला कृषि पदाधिकारी और जिला कृषि परामर्शी इसकी मॉनिटरिंग करते हैं। किसान टुन्ना मिश्र ने कहा कि वैकल्पिक सब्जी खेती की यह व्यवस्था बाढ़ प्रभावित कोसी क्षेत्र इलाके के लिए वरदान साबित होगी। 

इसी माह में सुपौल जिले में दो जगहों पर होगा उत्पादन
मार्च से ही पड़ोसी जिले सुपौल में दो जगहों पर तालाब में ऊपर सब्जी और नीचे मछली का उत्पादन करना शुरू होगा। साउथ एशियन फोरम फॉर एनवायरमेंट के निदेशक अमृता चटर्जी ने कहा कि सुपौल के डीएम और डीएओ से बातचीत हो चुकी है। जल्द ही उनके द्वारा दो जगहों पर तालाब चिन्हित करने की बात कहीं गई है। 

असम से शुरू हुआ उत्पादन बांग्लादेश फिर बिहार पहुंचा
असम के मांझली आइलैंड के तालाब में सब्जी-मछली उत्पादन की हाइड्रोपोनिक खेती व्यवस्था शुरू हुई थी। निदेशक ने बताया कि ब्रह्मपुत्र नदी से तबाही के कारण असम के मांझली आइलैंड में हाइड्रोपोनिक खेती शुरू की गई। उसके बाद बंगाल के दक्षिण 24 परगना के सुंदरवन में इस वैकल्पिक खेती को शुरू किया गया। फिर बांग्लादेश के सुंदरवन क्षेत्र में भी दो जगहों पर सब्जी की खेती की गई। उसके बाद बिहार राज्य के सहरसा जिले में इसे शुरू किया गया। इसी माह मार्च में सुपौल जिले में दो जगहों पर सब्जी की खेती शुरू हो जाएगी। 

ड्रम लगाने और बांस का नाव जैसा मचान तैयार करने में खर्च
ड्रम लगाने और बांस का नाव जैसा मचान तैयार करने में साउथ एशियन फोरम फॉर एनवायरमेंट को 20 हजार से अधिक राशि का खर्च पड़ता है। इसके अलावा सामग्रियों पर अलग खर्च पड़ता है। निदेशक ने कहा कि पायलट प्रोजेक्ट के तहत फिलहाल कृषि विभाग से चयनित किसानों के लिए यह मुफ्त की व्यवस्था है। 

तालाब में नाव पर खेती नाम से हुआ प्रचलित
किसानों ने पानी भरे तालाब के बीच शुरू हुई इस खेती को नाव पर खेती का नाम दे दिया है। जिले में नाव पर खेती के नाम से प्रचलित हो गया है।

भविष्य में सहकारी समितियों के गठन की योजना
भविष्य में किसानों की सहकारी समितियों के गठन की भी योजना है। निदेशक ने कहा कि भविष्य में प्रशिक्षित किसान स्थानीय संस्थाओं को मजबूत करने के लिए सहकारी समितियों का गठन करेंगे। जो कोविड या बाढ़ जैसी आपदा की घड़ी में सहायता कर सकेंगे।

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें