DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आओ राजनीति करें: एमबीबीएस की छात्राओं ने कहा- सिस्टम नहीं, माहौल बदलना होगा

Aao Rajneeti karein: Girls Students of MBBS said that environment also should be changed with system

1 / 2 रविवार की सुबह तिलकामांझी बस स्टैंड के समीप स्थित जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस छात्राओं ने लेडिज हॉस्टल नंबर पांच परिसर में हिंदुस्तान अखबार द्वारा आयोजित चाय-चौपाल कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

Aao Rajneeti karein: Girls Students of MBBS said that environment also should be changed with system

2 / 2रविवार की सुबह तिलकामांझी बस स्टैंड के समीप स्थित जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज लेडिज हॉस्टल नंबर पांच परिसर में हिंदुस्तान अखबार द्वारा आयोजित चाय-चौपाल कार्यक्रम में शामिल एमबीबीएस छात्राएं।

PreviousNext

सिर्फ बेटों से कम नहीं हैं बेटियां, महिला सशक्तीकरण की बात करने और सिस्टम (तंत्र) को बदलने से आधी आबादी सुरक्षित नहीं होगी। इसके लिए नेताओं को माहौल बदलना होगा। एक ऐसा माहौल बनाना होगा जिसमें दिन-रात कभी भी आधी आबादी (महिलाएं व लड़कियां) न केवल भयमुक्त होकर कहीं भी आ-जा सके, बल्कि घर में बैठे मां-बाप, पति, भाई व मां भी फिक्रमंद न रहे। नहीं तो अगर सिस्टम अपग्रेड करने से भयमुक्त माहौल बन जाता तो दिल्ली में निर्भया कांड नहीं होता।
 
यह बातें जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस छात्राओं ने रविवार की सुबह तिलकामांझी बस स्टैंड के समीप स्थित लेडिज हॉस्टल नंबर पांच परिसर में हिंदुस्तान अखबार द्वारा आयोजित चाय-चौपाल कार्यक्रम में कहीं। छात्राओं का स्पष्ट कहना है कि सिस्टम नहीं, हमें पुरूष समाज की सोंच बदलनी होगी। एमबीबीएस स्टूडेंट प्रिया ने कहा कि देश के कुल वोट में करीब 49 प्रतिशत महिलाओं-युवतियों का वोट होने के बावजूद हम चुनाव के मुख्य एजेंडे में शामिल हो पाते हैं।

जूही ने कहा कि आज भी ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाएं बदहाल स्थिति में हैं। वोट का मुद्दा महिलाओं की सेहत होनी चाहिए। प्रतीक्षा का कहना था कि चुनाव में हमें वोट देने का आधार सरकार का कामकाज होना चाहिए न कि जाति, क्षेत्र व धर्म आधारित वोट। छात्राओं का कहना है कि वोट का मुद्दा हमारा बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा होनी चाहिए। चाय-चौपाल कार्यक्रम में एमबीबीएस छात्रा प्रतिमा नयन, रूचि, जूही, निधि, श्यामा, अंकिता आदि मौजूद रही।

एमबीबीएस छात्राओं की प्रतिक्रिया :

कम से कम स्ट्रीट लाइट तो जले
महिला सशक्तीकरण के नाम पर लाखों का फंड करने से महिला-युवतियां सुरक्षित नहीं रहेंगी। अरे कम से कम स्ट्रीट लाइट तो जलवा दो ताकि सुनसान सड़क व अंधेरा की जद में आकर कोई बहू-बेटी की इज्जत न तार-तार हो। 
निवेदिता, एमबीबीएस द्वितीय वर्ष

बेटियों को मिले उच्च शिक्षा का हक
शहरों में उच्च एवं बेहतरीन शिक्षण संस्थान तो उपलब्ध हैं लेकिन ग्रामीण अंचल में रह रही बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए शहर में रहना पड़ता है। ग्रामीण अंचलों में भी बेहतरीन शिक्षा मिले तो बेटियां अपने गांव-घर में रहकर तरक्की की कहानी गढ़ सकेंगी।
शगुफ्ता परवीन, एमबीबीएस प्रथम वर्ष

सही टाइम पर परीक्षा होनी जरूरी
वर्तमान में शिक्षा की हालत बहुत अच्छा नहीं है। परीक्षा टाइम पर नहीं हो रही तो शायद ही कोई परीक्षा हो, जहां धांधली न हो। सिस्टम में लगे भ्रष्टाचार के घुन को साफ करने की जवावदेही राजनीतिक दलों की है। वोट का आधार यही होगा। 
निधि, एमबीबीएस अंतिम वर्ष

ग्रामीण लड़कियों के पास शिक्षा के अवसर कम
ग्रामीण क्षेत्र में लड़कियों के पास शिक्षा के अवसर कम है। जिससे यहां की बेटियों को पढ़ने के लिए ज्यादातर अभिभावक बाहर नहीं भेज पाते। सिर्फ स्कूल खोलने से लड़कियां नहीं पढ़ेंगी बल्कि इनमें काबिल शिक्षक व बेहतर माहौल देना होगा। 
शांभवी, एमबीबीएस प्रथम वर्ष

ताकि हम भी बेखौफ बाहर निकल सकें
कदम-कदम पर पुलिस बिठाने से हम लड़कियां सुरक्षित नहीं होगी। जब तक सख्त कानून व कड़े एवं त्वरित दंड की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक बेटियों के घर से बाहर जाते वक्त उनके अभिभावक चिंतित होते रहेंगे। हमारे वोट का मुद्दा यहीं होगा। 
गुंजा कुमारी, एमबीबीएस द्वितीय वर्ष

आधी आबादी की सुरक्षा जरूरी
महिला हो या युवतियां, ये समाज के हर क्षेत्र में कामयाबी के झंडे गाड़ रही हैं। बावजूद दिल्ली हो या भागलपुर, कामकाजी महिला व लड़कियां आज भी दिल ढलने के बाद घर से बाहर निकलने से पहले सौ बार सोचती हैं। हमें ऐसी सरकार चाहिए। 
विशाखा, एमबीबीएस प्रथम वर्ष

समानता के साथ-साथ सुरक्षा चाहिए
भले ही बेटियां आज अंतरिक्ष तक पहुंच गयी हो। लेकिन परिवार से लेकर समाज एवं हरेक कार्यक्षेत्र में हमें समान नजरों से नहीं देखा जाता है। बेटियों की तुलना में बेटों को ज्यादा तरजीह मिलती है। बड़ी बात यह कि हम कहीं भी सुरक्षित नहीं। 
आरती कुमारी, एमबीबीएस द्वितीय वर्ष

विकास हो तो बदलेगी समाज की सोच
दूसरे प्रदेश की तुलना में यहां पर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलेप नहीं हैं। पटना-कोलकाता व रांची के साथ फास्ट कम्युनिकेशन नहीं हैं। सरकारी स्वास्थ्य सुविधा के मामले में तो दक्षिण भारत के राज्यों से मीलों दूर हैं। बिहार के विकसित होने पर ही बदलेगी समाज की सोंच।
नम्रता, एमबीबीएस प्रथम वर्ष

महिलाओं-बेटियों की आबरु सुरक्षित नहीं 
दिल्ली हो या बेंगलुरु या फिर भागलपुर। कहीं भी महिला या युवतियों की आबरु सुरक्षित नहीं है। जब तक आधी आबादी को भयमुक्त माहौल नहीं मिलता है, तब तक देश को विकसित नहीं माना जा सकता है। हमें भयमुक्त माहौल की अपेक्षा भावी सरकार से है। 
ऋचा, एमबीबीएस प्रथम वर्ष

निम्न तबके की लड़कियों को भी चाहिए बेहतर शिक्षा
आज महंगी व बेहतर शिक्षा उच्च मध्यमवर्गीय एवं उच्च परिवार की बेटियों को आसानी से उपलब्ध हैं। लेकिन मेधा होने के बावजूद निम्न तबके की बेटियों को ये शिक्षा मयस्सर नहीं है। सरकारों को समान शिक्षा-समान पाठ्यक्रम पर ध्यान देना होगा। 
प्रियंका, एमबीबीएस प्रथम वर्ष

महिला सशक्तीकरण बाद में, पहले मिस्यूज रोको 
देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी बढ़ रही है, और हम बेटियां धर्म-जाति के आधार पर वोट कर रही हैं। सरकारों को महिला सशक्तीकरण की बात बाद में करनी चाहिए। पहले महिला सुरक्षा के नाम पर बने कानूनों के दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था सरकार करें। 
ऐश्वर्या झा, एमबीबीएस स्टूडेंट

सोच बाद में पहले बुझी स्ट्रीट लाइट के बल्ब बदलें
आधी आबादी के प्रति पुरूष समाज के बदले नजरिये को तो अच्छे संस्कार देकर हम पुरूषों की सोंच को बदल लेंगे। सरकार को लोगों को सोंच को बदलने का दावा छोड़ पहले सूनसान एरिया में बुझे पड़े स्ट्रीट लाइट को बदल दें। ताकि हम सुरक्षित आ-जा सकें। 
वर्णाली, एमबीबीएस छात्रा
 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Aao Rajneeti karein: Girls Students of MBBS said that environment also should be changed with system