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 सीवान में चीनी मिलों की संभावना और चुनौतियां

सीवान में चीनी मिलों की संभावना और चुनौतियां

संक्षेप: इंट्रो: सीवान जिला कृषि प्रधान क्षेत्र है, जहां गन्ना किसानों की एक बड़ी आबादी है। लेकिन वर्तमान में ये किसान गंभीर आर्थिक संकट और प्रशासनिक उदासीनता के कारण बदहाल स्थिति में हैं। उनकी समस्याएं केवल...

Sun, 9 Nov 2025 09:01 PMNewswrap हिन्दुस्तान, सीवान
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इंट्रो: सीवान जिला कृषि प्रधान क्षेत्र है, जहां गन्ना किसानों की एक बड़ी आबादी है। लेकिन वर्तमान में ये किसान गंभीर आर्थिक संकट और प्रशासनिक उदासीनता के कारण बदहाल स्थिति में हैं। उनकी समस्याएं केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि संरचनात्मक और नीतिगत भी हैं। गन्ना किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। चीनी मिलें या तो भुगतान में देरी करती हैं या फिर बहुत कम दाम पर गन्ना खरीदती हैं। इससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। खाद, बीज, कीटनाशक और डीजल के बढ़ते दामों ने किसानों की लागत बढ़ा दी है। लेकिन उनकी आय नहीं बढ़ रही, जिससे वे घाटे में जा रहे हैं।

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सीवान एक समय में चीनी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था। यहां की चीनी मिलों ने किसानों के आर्थिक विकास में अहम भूमिका निभायी थी। महाराजगंज, पचरुखी व सीवान की चीनी मिलें किसानों के उत्पादों को खरीद कर उन्हें उचित दाम देती थीं। लेकिन मिलों के बंद होने के कारण किसानों की आय में 85 फीसदी तक की गिरावट आ गयी है। इन चीनी मिलों के बंद होने से पूर्व जिले में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती थी। लेकिन महाराजगंज, पचरुखी व सीवान चीनी मिलों के एक एककर बंद होने के चलते गन्ने की खेती सिमट रही है। चीनी उत्पादों से बाजार को विकसित कर देने वाले किसान अब पर्व त्यौहार के लिए गन्ने की खेती कर रहें हैं। अब न गुण उत्पादन हो रहा है और न ही चीनी। जिसके चलते किसान छठ पर्व को ले गन्ने की खेती कर रहें हैं। गोपालगंज चीनी मिली कि दूरी अधिक होने से किसानों को बचत नहीं के बराबर हो रही है। गन्ना किसानों के अनुसार एक हेक्टेयर में गन्ने की खेती से करीब 3 लाख रुपए तक की आमदनी होती थी, जबकि अनाज की खेती से यह घटकर 20-25 हजार रुपए रह गयी है। सब्जियों की खेती से भी बमुश्किल 40-50 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर की आय हो पाती है। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती जा रही है। जिले के चीनी मिल के बंद होने से किसानों को अपना गन्ना गोपालगंज या अन्य दूर-दराज के स्थानों पर भेजना पड़ता है। इससे उनकी परिवहन लागत बढ़ जाती है और लाभ घट जाता है। साथ ही घोड़पड़ास गन्ने की फसल को काफी नुकसान पहुंचा रहें हैं। इससे किसानों की आर्थिक समस्याएं और बढ़ गयी हैं। वे लगातार सरकार और प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं, लेकिन समाधान नहीं हो पा रहा है। गन्ना उत्पादन कम होने से केवल किसान बल्कि मिलों में काम करने वाले हजारों मजदूर भी बेरोजगार हो गए हैं। कई मजदूरों को मजबूरी में दूगन्ने की खेती के जरिएसरे राज्यों में पलायन करना पड़ा है, जबकि कुछ लोग छोटे-मोटे काम करके किसी तरह जीवनयापन कर रहे हैं। कुल मिलाकर, गन्ना किसानों की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। सरकार और प्रशासन को जल्द से जल्द इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है, ताकि गन्ने की मिठास फिर से लौट सके और किसान अपनी खेती को जारी रख सकें। इससे लोगों को रोजगार मिल सके। साथ ही क्षेत्र की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके। सरकार और प्रशासन से उम्मीद की जा रही है कि वे शीघ्र इस समस्या का समाधान निकालेंगे। इससे गन्ना किसानों की खुशहाली लौट सकेगी। सीवान गन्ने की खेती का जिला , चीनी मिलों की संभावना सीवान जिले का नाम कभी गन्ना उत्पादन और चीनी मिलों के लिए जाना जाता था। जिले के कई इलाकों- जैसे महाराजगंज, रघुनाथपुर, दरौली और बड़हरिया- में गन्ने की खेती परंपरागत रूप से होती रही है। लेकिन समय के साथ यहां की चीनी मिलें बंद होती चली गईं और किसान धीरे-धीरे गन्ने की खेती से दूर हो गए। आज फिर से सीवान में चीनी उद्योग को पुनर्जीवित करने की चर्चा तेज है, क्योंकि यहां की भूमि, जलवायु और किसानों की मेहनत इस उद्योग के लिए उपयुक्त मानी जाती है।सीवान में चीनी मिलों की संभावना इसलिए भी अधिक हैं, क्योंकि जिले में अब भी गन्ने की खेती का आधार मौजूद है। किसान यदि उचित मूल्य और बाज़ार की गारंटी पाएं, तो फिर से बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती शुरू कर सकते हैं। जिले से सटे गोपालगंज और पूर्वी चंपारण में पहले से ही कुछ चीनी मिलें संचालित हैं, जिससे यहां भी इस उद्योग के विस्तार की संभावनाएं बनती हैं। साथ ही, एथेनॉल उत्पादन नीति के तहत नई इकाइयां लगाने का मौका मिलने से सीवान में रोजगार और निवेश दोनों बढ़ सकते हैं।लेकिन इन संभावनाओं के साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी चुनौती है निवेश की कमी। जिले में पुराने मिल परिसरों की हालत खस्ता है और नई इकाइयों को शुरू करने के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी की जरूरत है। गन्ना किसानों की एक और चिंता है कि उन्हें समय पर भुगतान नहीं मिलता, जिससे उनका भरोसा उद्योग से उठ गया है। इसके अलावा, बिजली की अस्थिरता, खराब सड़क नेटवर्क और प्रशासनिक जटिलताएं भी निवेशकों को हतोत्साहित करती हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य सरकार सीवान में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में एक आधुनिक चीनी या एथेनॉल मिल शुरू करे, तो किसानों में फिर से गन्ना उत्पादन का उत्साह लौट सकता है। इससे न केवल स्थानीय रोजगार बढ़ेगा, बल्कि सहायक उद्योग- जैसे ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग और गन्ना उत्पाद-भी विकसित होंगे। कुल मिलाकर, सीवान में चीनी मिलों की संभावनाएं तो बहुत हैं, लेकिन उन्हें साकार करने के लिए ठोस नीति, पूंजी निवेश और किसानों के साथ भरोसेमंद साझेदारी की जरूरत है। यदि सरकार, उद्योग और किसान मिलकर प्रयास करें, तो सीवान एक बार फिर गन्ना और चीनी उत्पादन का केंद्र बन सकता है। चीनी मिलों के बंद होने से बढ़ी समस्याएं गन्ने की खेती घटने व मिलो का बंद होना अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक असर डाल रहा है। जो किसान गन्ने की खेती कर रहें हैं उन्हें गन्ना बेचने की समस्या, समय पर भुगतान न मिलना और खेती से हो रहे नुकसान के कारण किसान अब अन्य फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, इन फसलों से उन्हें गन्ने की तुलना में बहुत कम आमदनी हो रही है। गन्ना किसानों ने बताया कि गांव के नजदीक में मिल न होने के कारण गन्ना बेचने में भी समस्याएं आ रही हैं, जिससे खेती का खर्चा बढ़ जाता है। इसके साथ ही गन्ना का उचित मूल्य न मिलने के कारण किसान अन्य फसलों की खेती करने पर मजबूर हैं। गन्ना एक नगदी फसल है, लेकिन बिना उचित मूल्य और सुविधाओं के किसान इससे दूर हो गए हैं। उधर किसानों ने बताया कि गन्ने की खेती में उच्च लागत और बिक्री की समस्या आ रही है, जिससे किसान इसे छोड़ रहे हैं। गन्ना से आय मिलने के कारण पहले हम जीवनयापन करते थे, लेकिन अब यह मुश्किल हो गया है। बिना गन्ने की बिक्री और सिंचाई की व्यवस्था के खेती करना मुश्किल हो गया है। खेती के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं। महंगी मजदूरी व खेती में आ रही लागत आर्थिक मजबूरी बनकर रह गई है। गन्ने की खेती को मनरेगा से जोड़ा जाना चाहिए। कोट - सभी फोटो नाम से सेव हैं। 1. गन्ने की खेती से हमारे घर का खर्च चलता था, लेकिन अब गन्ना की बिक्री न होने के कारण खेती छोड़ दी है। यदि सरकार गन्ना खरीदने की व्यवस्था करती है और मिलें चालू करती हैं, तो हम फिर से गन्ने की खेती शुरू कर सकते हैं। - शुभम कुमार 2. गन्ना की पर्ची बंधक रखकर किसान अपनी जरूरतें पूरी करते थे, लेकिन अब गन्ना की बिक्री और सिचाई की समस्या के कारण खेती नहीं हो रही है। अगर सरकार इन समस्याओं का समाधान करती है, तो फिर से खेती करने के लिए तैयार हो सकते हैं। - शिवम कुमार 3. गन्ने की खेती से पहले बच्चों की पढ़ाई लिखाई का खर्च निकलता था, लेकिन अब गन्ने की बिक्री नहीं हो रही है। गन्ना की खेती छोड़ने के बाद आर्थिक संकट बढ़ गया है। अगर सरकार गन्ना खरीदने की व्यवस्था करती है, तो फिर से खेती शुरू कर सकते हैं। - रोहित कुमार 4. इस क्षेत्र में गन्ने की खेती पहले किसानों के लिए वरदान साबित हो रही थी, लेकिन अब बिक्री की समस्या ने खेती को बंद करवा दिया है। अगर गन्ना बेचने की समस्या हल हो जाती है, तो किसानों की स्थिति बेहतर हो सकती है। - कन्हैया कुमार 5. गन्ना की खेती पहले आसान थी, क्योंकि एक बार फसल लगाकर तीन साल तक कटाई की जाती थी। गन्ना की बिक्री और सिचाई की समस्याओं ने किसानों को पलायन करने पर मजबूर कर दिया है। - राजू कुमार 6. गन्ना की खेती से पहले नगद आय होती थी, लेकिन अब किसानों को खेती छोड़ रहें हैं। गन्ना की बिक्री की समस्या और मिलें बंद होने के कारण किसान पलायन करने को मजबूर हो गए हैं। - बिट्टू कुमार 7. आसपास के क्षेत्रों में पहले गन्ने की खेती पचास फीसदी होती थी, लेकिन अब यह घट रही है। किसानों को अब आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। गन्ना लाभकारी फसल है, बिना उचित समर्थन के खेती नहीं हो पा रही है। - राहुल कुमार 8. किसान गन्ना की खेती पहले बड़े पैमाने पर करते थे, लेकिन बिक्री की समस्या के चलते कम में ही खेती कर रहे हैं। गन्ना की बिक्री और सही बीज की उपलब्धता में दिक्कत आ रही है, जिससे खेती मुश्किल हो गयी है। - राजू कुमार साह 9. गन्ना का न्यूनतम समर्थन मूल्य अगर सरकार बढ़ा दे, तो किसान फिर से खेती की ओर लौट सकते हैं। सिंचाई की व्यवस्था और खाद बीज की उपलब्धता पर ध्यान देना होगा, ताकि खेती की लागत कम हो सके। - अभिषेक कुमार 10. गन्ना की खेती नगदी आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत थी, लेकिन जिले के सभी चीनी मिल के बंद होने और गन्ना की बिक्री न होने के कारण यह नहीं हो रही है। जंगली जानवरों के नुकसान से किसानों को अब गन्ना उगाने से आशातीत लाभ नहीं हो रहा है। - अभिनंदन कुमार 11. गन्ना की खेती किसानों के लिए आय का एक अच्छा स्रोत था, लेकिन अब यह अतीत बन चुका है। अगर सरकार खाद बीज अनुदानित दर पर उपलब्ध कराती है और मिलें चालू करती हैं, तो फिर से गन्ना की खेती की जा सकती है। - राजेश मिश्रा 12. गन्ना की खेती पहले अच्छा मुनाफा देती थी, लेकिन अब मिल बंद होने से समस्या बढ़ गयी है। किसानों को अब गन्ना की बिक्री के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। सरकार अगर गन्ना खरीदने की व्यवस्था करती है, तो गन्ना फिर से खेती की ओर लौट सकता है। - पृथ्वीनाथ यादव 13. गन्ना की खेती से घर का खर्चा चलता था, लेकिन गन्ना बेचने की समस्या के कारण अब किसान खेती छोड़ चुके हैं। अगर सरकार गन्ना खरीदने की व्यवस्था करती है और उचित मूल्य देती है, तो फिर से गन्ने की खेती शुरू हो सकती है। - कमली देवी 14. गन्ना की खेती अब कोई आय का स्रोत नहीं बन पा रही है, क्योंकि मिलें बंद हो चुकी हैं और गन्ना कोई नहीं खरीद रहा। मजदूरी भी बढ़ गयी है, जिससे खेती का खर्चा अधिक हो गया है। पहले गन्ने की पेराई और मीठा बनाने का कारोबार भी चलता था।- - मनोज सिंह 15. सरकार को चाहिए कि वह किसानों को न्यूनतम दर पर गन्ना बीज उपलब्ध कराए और नजदीकी चीनी मिलों को चालू करे, ताकि किसान गन्ने की खेती फिर से कर सकें। उदासीनता के कारण किसान गन्ने की खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। समस्याओं का समाधान हो, तो खेती शुरू कर सकते हैं। - नीतीश कुमार 16. गांव में गन्ने की खेती सैकड़ो एकड़ में होती थी, लेकिन मिल बंद हो जाने और उचित दाम न मिलने से किसानों ने खेती करना लगभग बंद कर दिया। अब उतने एकड़ में गन्ना नहीं उगाते हैं। जल जमाव व जानवरों से नुकसान चलते परेशानी है। जिससे गन्ना उगाने में सोचना पड़ता है। - चंदन सिंह 17. गन्ने की खेती अब पहले जैसी नहीं रही। मिल बंद हो चुके हैं, जिससे किसानों को गन्ना बेचने में दिक्कत हो रही है। पिछले 10 वर्षों में गन्ने की खेती बहुत हदतक तक कम हो गयी है। अ सरकार इन मिलों को फिर से चालू करे या किसानों के लिए वैल्पिक व्यवस्था करे तो खेती जोर पकड़ेगी। - आदित्य सिंह 18. सरकार की ओर से गन्ना किसानों के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। गन्ना का उचित मूल्य न मिलने के कारण खेती छोड़ रहे हैं। पास में मिल न होने के कारण गन्ना बेचने में भी परेशानी हो रही है। इससे किसानों को गन्ने की खेती से मुंह मोड़ना पड़ रहा है। - - धर्मेन्द्र कुमार 19. इलाका पहले गन्ने की खेती के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन अब केवल तीन से चार फीसदी ही खेती हो रही है। सरकारी उदासीनता के कारण किसान गन्ने की खेती से दूरी बना रहे हैं। अगर मिलें चालू की जातीं और सरकार गन्ना किसानों के लिए उचित व्यवस्था करती, तो खेती फिर से बढ़ सकती थी। - जयप्रकाश साह 20. गन्ने की खेती के लिए सिंचाई की व्यवस्था जरूरी है, लेकिन यह उपलब्ध नहीं है। गन्ना एक नगदी फसल है। इसे लगातार पानी की जरूरत होती है, जबकि हमारे पास इसकी उचित सिंचाई व्यवस्था नहीं है। हमारी मांगों पर कोई ध्यान नहीं देता है। - सोनू कुमार