समय के साथ बदला होली का स्वरुप, बाजार में केमिकलयुक्त रंगों की भरमार
सीवान, हिन्दुस्तान संवाददाता।आंखों की सुरक्षा के लिए होली खेलते समय सनग्लासेस पहनें : डॉ. शरद चौधरीबाजार में मिलने वाले चमकीले सिंथेटिक रंग व अबीर में खतरनाक रसायन होते हैं। आंखों की सुरक्षा के लिए...

सीवान, हिन्दुस्तान संवाददाता। होली का पर्व जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, बाजारों में रंग-गुलाल की बिक्री तेज होती जा रही है। खाद्य सामग्री व पहनने के लिए चटख कपड़ों के साथ होली की पहचान रंग-अबीर, गुलाल व पिचकारी की दुकान पर खरीदारों की भीड़ बढ़ती जा रही है। होली के पारंपरिक गीतों के साथ ही होली की तैयारी जोर पकड़ती जा रही है। हालांकि समय के साथ होली का रंग भी बदलने लगा है। कभी विशुद्ध रूप से मिट्टी, गोबर, प्राकृतिक रंग व गुलालों से खेली जाने वाली होली अब पोटिन, मिलावटी रंग, मिलावटी रंग-अबीर ने ले रखा है। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय होली का त्योहार पूरी तरह प्राकृतिक रंगों के साथ मनाया जाता था।
केसर, हल्दी, चंदन व पलाश के फूलों से बने रंगों की खुशबू व कोमलता ही होली की पहचान हुआ करती थी। गांवों में लोग पलाश के फूलों को उबालकर केसरिया रंग तैयार करते थे। वहीं, घर की महिलाएं बेसन व हल्दी से अबीर बनाती थीं। उस समय रंग सिर्फ उल्लास का प्रतीक था, स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं। लेकिन समय के साथ होली का स्वरूप बदल गया है। बाजार में अब केमिकल युक्त रंगों की भरमार है। रोडियामिन बी, मेटालिक पेंट, सिलिका पाउडर व अन्य कृत्रिम रसायनों से तैयार सस्ते रंग खुलेआम बिक रहे हैं। 10 से 20 रुपये में मिलने वाले ऐसे रंग लोगों को आकर्षित तो करते हैं, लेकिन इनके दुष्प्रभाव गंभीर हो सकते हैं। दूसरी तरफ हर्बल व प्राकृतिक रंग 100 से 200 रुपये तक में उपलब्ध है। इनकी कीमत व गुणवत्ता के बीच बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है। यही वजह है कि सस्ते रंगों की मांग अधिक रहती है, वहीं, गुणवत्ता पीछे छूट जाती है। होली की मस्ती में तो इनका फर्क नजर नहीं आता लेकिन बाद में इसका परिणाम मुश्किल में डालने वाला हो सकता है। इससे होली के रंग-अबीर त्वचा से लेकर आंख तक के लिए दुष्प्रभाव पैदा कर सकते हैं।
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