गेहूं की खेती कर किसानों को मेहनत के बाद भी नहीं बचता मुनाफा
सीवान में गेहूं की खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों की समस्या बढ़ गई है। पिछले साल प्रति एकड़ 12,000 रुपये खर्च होते थे, जो इस साल बढ़कर 18,000 रुपये हो गए हैं। मौसम की बेरुखी और पैक्स में खरीद की अव्यवस्था के कारण किसानों को उचित दाम नहीं मिल रहा है, जिससे उनका मुनाफा घट गया है।

(सीवान से नीरज कुमार पाठक)। जिले में गेहूं की खेती हर साल किसानों के लिए भारी पड़ रही है। लागत में लगातार बढ़ोतरी और मौसम की बेरुखी ने किसानों की कमर तोड़ दी है। हालात यह हैं कि जहां पहले प्रति एकड़ अच्छी बचत हो जाती थी, वहीं अब लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। दरौली प्रखंड के किसान रामजी यादव बताते हैं, पिछले साल तक एक एकड़ में 12 हजार के आसपास खर्च होता था, लेकिन इस बार 18 हजार से ऊपर चला गया। खाद, बीज, मजदूरी सब कुछ महंगा हो गया है। इतना खर्च करने के बाद भी सही दाम नहीं मिल रहा है।
उनका कहना है कि डीजल महंगा होने से सिंचाई का खर्च भी काफी बढ़ गया है। गुठनी के किसान मुन्ना प्रसाद कहते हैं, सबसे ज्यादा मार मजदूरी और खाद पर पड़ी है। पहले मजदूर 250-300 रुपये में मिल जाते थे, अब 400-500 रुपये देने पड़ रहे हैं। खाद भी समय पर नहीं मिलता और महंगा मिलता है। उन्होंने बताया कि ट्रैक्टर और थ्रेसर का किराया भी बढ़ गया है। इससे कुल लागत और बढ़ जाती है। किसानों की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। फसल तैयार होने के बाद उसे बेचने में भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हसनपुरा के किसान अशोक सिंह कहते हैं, पैक्स में गेहूं लेकर जाते हैं तो नमी का बहाना बनाकर लौटा दिया जाता है। कई-कई दिन लाइन में खड़ा रहना पड़ता है। आखिर में मजबूरी में व्यापारी को सस्ते में बेच देना पड़ता है। किसानों के अनुसार, इस साल मौसम ने भी साथ नहीं दिया। कहीं समय पर बारिश नहीं हुई, तो कहीं कटाई के वक्त बेमौसम बारिश और तेज हवा से फसल गिर गई। बसंतपुर के किसान राजेश्वर चौधरी बताते हैं, कटाई के समय बारिश हो गई, जिससे आधी फसल खराब हो गई। जो बची, उसका दाना भी कमजोर हो गया। इससे बाजार में कीमत और कम मिल रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक फसल चक्र और आधुनिक तकनीकों की कमी भी एक बड़ी वजह है। लेकिन किसान कहते हैं कि जब तक उन्हें उचित समर्थन मूल्य और समय पर खरीद की गारंटी नहीं मिलेगी, तब तक नई तकनीक अपनाना जोखिम भरा है। किसान संगठनों का कहना है कि सरकार को पैक्स व्यवस्था को दुरुस्त करना चाहिए और हर हाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही खाद-बीज की कीमतों पर नियंत्रण और सिंचाई के लिए सस्ती व्यवस्था जरूरी है। कुल मिलाकर, सीवान में गेहूं की खेती अब फायदे का सौदा नहीं रह गई है। किसानों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में वे गेहूं की खेती से दूरी बनाने को मजबूर हो जाएंगे।बढ़ती लागत और मौसम की मार से गेहूं की खेती बेअसर, किसान बोले- मेहनत के बाद भी नहीं बचता मुनाफा। सीवान में गेहूं की खेती महंगी, प्रति एकड़ लागत में 6-7 हजार तक बढ़ोतरी सीवान। जिले में गेहूं की खेती की लागत में इस साल भारी इजाफा हुआ है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है। खाद, बीज, सिंचाई, मजदूरी और ट्रांसपोर्टेशन सभी मदों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। किसानों के अनुसार, पहले प्रति एकड़ खाद पर करीब 2,800 रुपये खर्च होते थे, जो अब बढ़कर 4,200 रुपये हो गए हैं। वहीं, बीज की लागत 1,800 रुपये से बढ़कर 2,500 रुपये प्रति एकड़ पहुंच गई है। सिंचाई पर पहले जहां 2,500 रुपये खर्च होते थे, अब यह बढ़कर 3,800 रुपये हो गया है। मजदूरी में सबसे ज्यादा उछाल देखा गया है। पहले प्रति एकड़ 4,000 रुपये में काम हो जाता था, लेकिन अब 6,000 रुपये तक खर्च करना पड़ रहा है। इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन का खर्च भी 800 रुपये से बढ़कर 1,500 रुपये प्रति एकड़ हो गया है। इस तरह, कुल मिलाकर प्रति एकड़ खेती की लागत पिछले साल के 11,900 रुपये से बढ़कर इस साल करीब 18,000 रुपये पहुंच गई है। यानी एक ही साल में लगभग 6,000 से 7,000 रुपये प्रति एकड़ की बढ़ोतरी हुई है। इससे किसानों का मुनाफा घटने लगा है। पांच आपदाओं की मार से सीवान में गेहूं की पैदावार घटी सीवान। जिले में गेहूं की फसल इस साल प्राकृतिक आपदाओं की लगातार मार झेल रही है। सूखा, बाढ़, आंधी, तूफान, ओलावृष्टि और अगलगी जैसी घटनाओं ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। किसानों के अनुसार, बुआई के समय पर्याप्त बारिश नहीं होने से सूखे जैसी स्थिति बनी रही, जिससे फसल की शुरुआती बढ़वार प्रभावित हुई। वहीं, निचले इलाकों में अचानक जलभराव और बाढ़ जैसे हालात से कई खेतों में फसल खराब हो गई। कटाई के समय आंधी और तेज तूफान ने खड़ी फसल को गिरा दिया, जिससे उत्पादन में भारी कमी आई। कई जगहों पर ओलावृष्टि ने गेहूं के दानों को नुकसान पहुंचाया। इससे गुणवत्ता गिर गई। बाजार में कीमत भी कम मिल रही है। इसके अलावा अगलगी की घटनाओं ने भी किसानों को झटका दिया है। खेतों में आग लगने से कई एकड़ फसल जलकर राख हो गई। किसानों का कहना है कि हर साल किसी न किसी आपदा से नुकसान हो रहा है, लेकिन मुआवजा समय पर नहीं मिलता। ऐसे में, खेती अब जोखिम भरा काम बनता जा रहा है। किसानों की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर हो रही है। पैक्स में खरीद की सुस्ती से परेशान किसान, मजबूरी में औने-पौने दाम पर बेच रहे गेहूं सीवान। जिले में गेहूं बेचने को लेकर किसानों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी खरीद केंद्र यानी पैक्स में अव्यवस्था से किसानों को फसल बेचने के लिए बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता है। किसानों का आरोप है कि पैक्स पर गेहूं लेकर जाने के बाद नमी और गुणवत्ता का हवाला देकर अक्सर फसल लौटा दी जाती है। कई बार बोरा या कागजी प्रक्रिया में कमी बताकर भी खरीद से मना कर दिया जाता है। इसके अलावा खरीद केंद्र समय पर नहीं खुलते और खुलते भी हैं तो सीमित मात्रा में ही खरीद की जाती है। दरौली के किसान बताते हैं कि कई-कई दिन बाद भी नंबर नहीं आता। 10 से 15 दिन तक इंतजार करना पड़ता है, तब जाकर कहीं फसल बिकती है। इस देरी के कारण किसानों को तत्काल पैसे की जरूरत पूरी नहीं हो पाती। मजबूरी में किसान बिचौलियों के हाथों गेहूं बेचने को विवश हैं। व्यापारी न्यूनतम समर्थन मूल्य से 200 से 400 रुपये कम कीमत पर फसल खरीद लेते हैं। किसानों का कहना है कि अगर पैक्स व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो उन्हें हर साल इसी तरह नुकसान झेलना पड़ेगा। जिले में गेहूं की खेती में किसानों का गणित बिगड़ा सीवान। जिले में गेहूं की खेती का आर्थिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। बढ़ती लागत और अपेक्षित कीमत नहीं मिलने से किसानों का मुनाफा तेजी से घटा है, कई मामलों में घाटे की स्थिति भी बन रही है। किसानों के अनुसार, पिछले साल प्रति एकड़ खेती पर करीब 12 हजार रुपये खर्च होते थे और औसतन 20 हजार रुपये तक फसल बिक जाती थी। इसतरह करीब 8 हजार रुपये प्रति एकड़ मुनाफा हो जाता था। लेकिन इस साल लागत बढ़कर लगभग 18 हजार रुपये प्रति एकड़ पहुंच गई है। वहीं, बिक्री कीमत में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई। इस साल औसतन 20 से 21 हजार रुपये प्रति एकड़ ही किसानों को मिल पा रहा है। ऐसे में, मुनाफा घटकर महज 2 से 3 हजार रुपये प्रति एकड़ रह गया है। कई किसानों का कहना है कि अगर फसल मौसम की मार से प्रभावित हो जाए या पैक्स में देरी हो जाए, तो सीधे 2 से 5 हजार रुपये प्रति एकड़ तक का घाटा उठाना पड़ रहा है। किसानों के मुताबिक, मेहनत और लागत बढ़ रही है, लेकिन आमदनी नहीं। ऐसे में गेहूं की खेती अब फायदे का सौदा नहीं रह गई है। बेमौसम बारिश और पुराने फसल चक्र से गेहूं की खेती संकट में सीवान। जिले में गेहूं की खेती इस बार मौसम की अनिश्चितता और पुराने फसल चक्र के कारण गंभीर संकट में है। किसानों का कहना है कि समय पर बारिश नहीं होने से बुआई प्रभावित होती है, जबकि कटाई के वक्त बेमौसम बारिश फसल को भारी नुकसान पहुंचा रही है। इस साल भी कई इलाकों में देर से बारिश होने के कारण किसानों को सिंचाई पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ा, जिससे लागत बढ़ गई। वहीं मार्च-अप्रैल में हुई बेमौसम बारिश और तेज हवा ने खड़ी फसल को गिरा दिया। इससे दाने की गुणवत्ता प्रभावित हुई और उत्पादन भी कम हुआ। महाराजगंज के किसान सुरेश प्रसाद बताते हैं कि जब पानी चाहिए तब नहीं मिलता और जब फसल कटने को तैयार रहती है, तब बारिश हो जाती है। इससे पूरी मेहनत बेकार हो जाती है। किसानों का यह भी कहना है कि वर्षों से गेहूं-धान के पारंपरिक फसल चक्र में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है, जिससे मिट्टी की उर्वरता और उत्पादन पर असर पड़ रहा है। कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि बदलते मौसम के अनुसार फसल चक्र में बदलाव और नई तकनीकों को अपनाना जरूरी है। किसानों, वैज्ञानिकों और प्रशासन ने रखी अपनी बात सीवान। जिले में गेहूं की खेती को लेकर बढ़ती लागत, मौसम की मार और बाजार की दिक्कतों पर किसानों से लेकर विशेषज्ञों और प्रशासन तक सभी ने चिंता जताई है। दरौली के किसान रामजी यादव कहते हैं, लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन आमदनी नहीं बढ़ रही। अगर मौसम खराब हो जाए तो पूरी फसल पर पानी फिर जाता है। वहीं गुठनी के किसान मुन्ना प्रसाद का कहना है, पैक्स में गेहूं बेचने में काफी परेशानी होती है, इसलिए मजबूरी में व्यापारियों को सस्ते दाम पर बेचना पड़ता है।किसान संगठन के एक पदाधिकारी ने कहा, सरकार को हर हाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद सुनिश्चित करनी चाहिए, नहीं तो किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे।कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि बदलते मौसम के अनुसार नई तकनीक और उन्नत बीज अपनाना जरूरी है। एक कृषि वैज्ञानिक ने बताया, माइक्रो-इरिगेशन और फसल विविधीकरण से लागत कम और उत्पादन बेहतर किया जा सकता है। वहीं कृषि पदाधिकारी ने कहा, सरकार किसानों को हर संभव सहायता दे रही है। खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाई जा रही है और किसानों को जागरूक किया जा रहा है। खर्च मद 2025 (रु.) 2026 (रु.) खाद 2,800 4,200 बीज 1,800 2,500 सिंचाई 2,500 3,800 मजदूरी 4,000 6,000 ट्रांसपोर्टेशन 800 1,500 कुल लागत 11,900 18,000 कुल बढ़ोतरी: करीब 6,000-7,000 रुपये प्रति एकड़ वर्ष लागत (प्रति एकड़) बिक्री (प्रति एकड़) मुनाफा/घाटा 2025 12,000 20,000 8,000 2026 18,000 21,000 3,000
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