घोड़पड़ासों के आतंक व बीज की कमी से दलहन की खेती प्रभावित

Feb 13, 2026 03:16 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, सीवान
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सीवान, हिन्दुस्तान संवाददाता।कथा मनुष्य की सभी इच्छाओं पूरी करती - रामजी शुक्लामहाराजगंज। अनुमंडल मुख्यालय के रामेश्वरम धाम मंदिर के 14 वें वार्षिकोत्सव पर भागवत कथा सप्ताह व ज्ञान महायज्ञ का आयोजन...

घोड़पड़ासों के आतंक व बीज की कमी से दलहन की खेती प्रभावित

सीवान, हिन्दुस्तान संवाददाता। जिले में दलहन की खेती वर्तमान समय में घोड़पड़ासों के आतंक व गुणवत्तापूर्ण बीज की कमी से प्रभावित हो रही है। इन दोनों कारणों से चना, मसूर व अरहर की फसल पर व्यापक असर पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि घोड़पड़ास के झुंड रात के समय खेतों में घुसकर फसलों को रौंद देते हैं, खासकर अरहर व मसूर की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान होता है। सदर प्रखंड के किसान रामाशीष भगत, उस्मान अंसारी, जितेन्द्र यादव, अरुण राय आदि ने बताया कि घोड़पड़ासों के रौंदने से एक ही रात में कई कट्ठा फसल बर्बाद हो जाती है।

इससे पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है। खेतों की सुरक्षा के लिए बाड़ लगाने या रखवाली करने में अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर, प्रमाणित व उन्नत किस्म के बीज समय पर उपलब्ध नहीं हो पाते। सरकारी अनुदान पर बीज की घोषणा तो होती है, लेकिन सीमित मात्रा में वितरण के कारण अधिकतर किसानों को बाजार से महंगे दाम पर बीज खरीदना पड़ता है। कई बार स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बीज की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती, जिससे उत्पादन घट जाता है। किसानों का कहना है कि आम किसानों को सरकारी बीज आसानी से नहीं मिल पाती, रुसूख वाले विभाग से बीज उठा लेते हैं। इन समस्याओं के कारण जिले में दलहन का रकबा व उत्पादन दोनों प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि सिंचाई भी आड़े आती है। दलहन की खेती के लिए मुख्य रूप से स्प्रिंकलर पटवन की जरूरत होती है, जो कि जिले में उपलब्ध नहीं है। किसानों का कहना है कि यदि घोड़पड़ासों पर नियंत्रण व गुणवत्तापूर्ण बीज की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित हो, तो जिले में दलहन उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। 2021-22 की तुलना में 2025 में बढ़ा दलहन की खेती का रकबा रबी वर्ष 2021-22 की तुलना में 2025 में दलहन की खेती का रकबा बढ़ा है, फिर भी खेती कहीं न कहीं प्रभावित होती दिख रही है। वैसे रकबा बढ़ने से स्वाभाविक तौर पर उत्पादन भी बढ़ा है। हालांकि पहले लोग दलहन फसलों की खेती अधिक करते थे, लेकिन अब उसमें कहीं न कहीं कमी दिख रही है। जिला कृषि कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार, 2021-22 में जहां 2619 हेक्टेयर में दलहन की खेती होती थी। वहीं, वर्ष 2025 में दलहन की खेती का रकबा बढ़कर 10880.122 हेक्टेयर हो गया। वर्ष 2025 में करीब पांच हजार हेक्टेयर में अरहर, दो हजार में मटर,140.89 में खेसारी, 2329.11 में मसूर, 11.84 में राजमा, 49.52 में उड़द, 1250.858 में चना व 100.28 हेक्टेयर में मूंग की खेती हुई। वहीं, 2021-22 में चना 610, मसूर 1389, मटर 993, खेसारी 68 जबकि राजमा की खेती सिर्फ 9 हेक्टेयर में जिले में की गई थी। जिले को दलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए योजनाएं जिले में रबी सीजन 2025-26 के दौरान लगभग 8,929 हेक्टेयर भूमि पर दलहन विशेषकर मसूर की खेती का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। कृषि विभाग ने जिले को दलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए विशेष रूप से मसरूर की खेती को बढ़ावा देने के लिए सिसवन व रघुनाथपुर जैसे प्रखंडों में त्वरित दलहन उत्पादन योजना के तहत बीज व सहायक सामग्री उपलब्ध कराई है। जिले में रबी सीजन 2025-26 में कुल लक्ष्य 8,929 हेक्टेयर है। मसूर, चना समेत अन्य दलहनी फसलों को लेकर जिला कृषि कार्यालय द्वारा किसानों को उन्नत बीज, तकनीकी सहायता व अनुदानित दर पर सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। इस क्रम में सिसवन, रघुनाथपुर व दारौंदा प्रखंडों पर विशेष जोर दिया गया है। जिले में बड़ी मात्रा में दाल की आवश्यकता 2011 की जनगणना के अनुसार, लगभग 33.3 लाख की आबादी वाले सीवान जिले में प्रति व्यक्ति 100 ग्राम की दैनिक आवश्यकता के आधार पर, सैद्धांतिक रूप से बहुत बड़ी मात्रा में दाल की जरूरत होती है। जिले भर में पोषण सुरक्षा के लिए प्रति माह अच्छी खासी मात्रा की आपूर्ति आवश्यक होती है। जानकारों के अनुसार, यदि प्रति व्यक्ति 100 ग्राम दाल प्रतिदिन मानी जाए, तो जिले को बड़ी मात्रा में दाल की आवश्यकता होती है। बताया जा रहा कि पोषण के लिए राशन वितरण में बदलाव किए हैं। इसमें प्रति व्यक्ति दाल की मात्रा का भी ध्यान रखा गया है। जिले में मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के कटनी से दाल की आपूर्ति होती है। जिले में एक माह में कमोबेश दस गाड़ियां विभिन्न प्रकार की दालों की आती हैं, इसमें एक गाड़ी में 16 टन दाल होता है। क्या कहते किसान फोटो संख्या - 4 कैप्शन - अशोक कुमार सिंह अच्छी गुणवत्ता वाले चना और मसूर के प्रमाणित बीज समय पर उपलब्ध नहीं हो पाते। सरकारी अनुदान पर बीज की घोषणा तो होती है, लेकिन सीमित मात्रा में वितरण होने से अधिकांश किसानों को बाजार से महंगे दाम पर बीज खरीदना पड़ता है। इससे लागत बढ़ जाती है। अशोक कुमार सिंह, बसंतपुर फोटो संख्या - 5 कैप्शन - अजय कुमार कुशवाहा। दलहन की फसल के लिए समय पर सिंचाई बड़ी चुनौती है। नहरों में पर्याप्त पानी नहीं आता और डीजल पंप से सिंचाई महंगी पड़ती है। बिजली आपूर्ति भी अनियमित रहती है, जिससे फसल की बढ़वार प्रभावित होती है। अजय कुमार कुशवाहा, बड़हरिया फोटो संख्या - 6 कैप्शन - रत्नेश सिंह। दलहनी फसलों में मुख्य रूप से अरहर और मसूर की फसल में कीट व रोग का प्रकोप बढ़ गया है। कीटनाशक महंगे हैं और सही तकनीकी सलाह समय पर नहीं मिलती। इसके अलावा नीलगाय और जंगली पशु भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे दलहनी फसल की खेती करने वाले किसान परेशान हैं। रत्नेश सिंह, रघुनाथपुर फोटो संख्या - 7 कैप्शन - सत्येन्द्र राय। बाजार में उचित समर्थन मूल्य का लाभ नहीं मिल पाता। खरीद केंद्र समय पर सक्रिय नहीं होते, जिससे किसानों को औने-पौने दाम पर फसल बेचनी पड़ती है। यदि समय से बीज, सिंचाई, सुरक्षा और बाजार की समस्याएं दूर हों, तो सीवान में दलहन उत्पादन काफी बढ़ सकता है। सत्येन्द्र राय, रघुनाथपुर

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