Farmers in Ragunathpur Face Drought Concerns as Kharif Crop Season Approaches किसानों की आसमान पर टिकी निगाहें, धान की फसल सूखने लगी, Siwan Hindi News - Hindustan
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किसानों की आसमान पर टिकी निगाहें, धान की फसल सूखने लगी

रघुनाथपुर में खरीफ फसलों का मौसम निर्णायक मोड़ पर है। किसानों को बारिश की कमी से चिंता है, जिससे फसलें कमजोर हो रही हैं। कई किसान निजी पंपसेट से सिंचाई कर रहे हैं और डीजल पर अनुदान की मांग कर रहे हैं।...

Newswrap हिन्दुस्तान, सीवानTue, 9 Sep 2025 03:23 PM
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  किसानों की आसमान पर टिकी निगाहें, धान की फसल सूखने लगी

रघुनाथपुर, एक संवाददाता। खरीफ की फसलों का मौसम अपने निर्णायक मोड़ पर है। इस समय समय पर बारिश होना धान समेत सभी खरीफ फसलों के लिए बेहद अहम है। लेकिन मौसम की बेरुखी ने किसानों को चिंता में डाल दिया है। खेतों में खड़ी फसलें पानी को तरस रही हैं और किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। जगह-जगह किसान इंद्रदेव से वर्षा कराने की प्रार्थना कर रहे हैं, ताकि उनकी मेहनत और लागत पर पानी फिरने से बच सके। 30 अगस्त को वर्षा का मघा नक्षत्र समाप्त हुआ और 31 अगस्त से पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र आरंभ हो गया है। परंपरागत मान्यताओं के मुताबिक यह नक्षत्र फसलों की बढ़वार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस दौरान खरीफ फसलों को पर्याप्त पानी की जरूरत होती है। कृषि विशेषज्ञ भी मानते हैं कि इस समय यदि बारिश न हुई, तो फसलें कमजोर पड़ने लगेंगी और पैदावार पर असर पड़ेगा।मघा नक्षत्र में इस बार भी स्थिति बेहतर नहीं रही। हल्की-फुल्की बारिश तो हुई, लेकिन वह खेतों की प्यास बुझाने के लिए काफी नहीं थी। किसानों का कहना है कि पिछले कई वर्षों से मघा नक्षत्र में पर्याप्त वर्षा नहीं हो रही है। इस बार भी हाल लगभग वैसा ही रहा। अब किसानों की उम्मीदें पूर्वा नक्षत्र पर टिकी हैं। इसके बाद उतराफाल्गुनी और फिर हथिया नक्षत्र चढ़ेगा, जिन्हें परंपरागत रूप से बारिश के लिहाज से अहम माना जाता है। फसलों की दूसरी बार सिंचाई करनी पड़ रही निखती कला और करसर गांव के किसानों ने बताया कि बारिश न होने के कारण उन्हें अपनी फसलों की दूसरी बार सिंचाई करनी पड़ रही है। इसके लिए उन्हें निजी पंपसेट का सहारा लेना पड़ रहा है। जिनके पास अपना पंपसेट है, उन्हें भी प्रति घंटे 100 रुपये तक खर्च करना पड़ रहा है, जबकि जिन किसानों को भाड़े पर पंपसेट लेना पड़ता है, उन्हें 200 रुपये प्रति घंटे की दर से भुगतान करना पड़ रहा है।किसान सत्येन्द्र राय कहते हैं, सरकार पंपसेट मालिकों को डीजल पर अनुदान देती है, लेकिन जो किसान भाड़े पर सिंचाई कराते हैं, वे इस सुविधा से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में उनकी लागत और भी बढ़ जाती है। उनका कहना है कि डीजल पर सब्सिडी का लाभ वास्तविक जरूरतमंद किसानों तक पहुंचना चाहिए। एक लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि पर धान की रोपनी जिले में इस बार 1 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि पर धान की रोपनी हुई है। किसान पहले ही बीज, खाद और रोपनी पर भारी खर्च कर चुके हैं। अब यदि पर्याप्त बारिश नहीं हुई, तो उत्पादन घटने के साथ-साथ लागत वसूल करना भी मुश्किल हो जाएगा। कई किसानों का कहना है कि अगर सिंचाई पर खर्च इसी तरह बढ़ता रहा, तो धान की खेती घाटे का सौदा साबित हो सकती है। कृषि विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए किसानों को वैकल्पिक इंतजाम करने की सलाह दी गई है। उन्होंने कहा कि विभाग स्तर से डीजल अनुदान योजना चलाई जा रही है, ताकि किसान निजी सिंचाई के जरिए अपनी फसलों को बचा सकें। डीजल पंप सेट से ही अब सिंचाई का असारा हालांकि, किसानों को अब भी आसमान से बरसात की आस है। उनका कहना है कि समय पर पानी मिल जाए तो फसलें पटरी पर आ सकती हैं, लेकिन अगर पूर्वाफाल्गुनी और उतराफाल्गुनी नक्षत्र भी सूखे गुजर गए, तो खरीफ की फसलें पूरी तरह प्रभावित होंगी।कुल मिलाकर, जिले के खेतिहर किसान आज हालात से जूझते हुए उम्मीद और मायूसी के बीच झूल रहे हैं। उनके पास पंपसेट और डीजल ही फिलहाल सहारा हैं, मगर असली राहत तो तभी मिलेगी जब आसमान से पानी गिरेगा और खेत लहलहा उठेंगे। डीजल अनुदान योजना से किसे मिल रहा लाभ, कौन वंचित? सरकार किसानों को खरीफ सीजन में डीजल पर अनुदान देने की योजना चला रही है, ताकि वे निजी पंपसेट से सिंचाई कर सकें। इसके तहत पंजीकृत किसान प्रति एकड़ सिंचाई पर निर्धारित दर से डीजल सब्सिडी प्राप्त कर सकते हैं। जिनके पास अपना डीजल पंपसेट है, उन्हें यह सुविधा आसानी से मिल जाती है।लेकिन, बड़ी संख्या में ऐसे किसान भी हैं जिनके पास खुद का पंपसेट नहीं है। इन्हें भाड़े पर पंपसेट लेकर सिंचाई करनी पड़ती है। इस स्थिति में किसानों को प्रति घंटे 200 रुपये तक का भुगतान करना पड़ता है, जबकि उन्हें डीजल सब्सिडी का लाभ नहीं मिल पाता। वास्तविक रूप से सबसे ज्यादा संकट उन्हीं किसानों पर है जिनके पास सिंचाई का साधन नहीं है। वे न सिर्फ महंगा डीजल खरीद रहे हैं, बल्कि भाड़े पर पंपसेट लेकर दोहरी मार झेल रहे हैं। किसानों का मानना है कि अगर इस वर्ग को सब्सिडी से जोड़ा गया, तो फसल बचाने में मदद मिलेगी और लागत का बोझ कुछ कम होगा।

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