प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के समारोह में जुटे श्रद्धालु
सीवान में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की स्थानीय शाखा ने मां जगदंबा सरस्वती का दिव्य स्मृति दिवस मनाया। बीके सुधा बहन ने उनकी विशेषताओं और आध्यात्मिक योगदान पर प्रकाश डाला। मम्मा ने 1965 में देह त्यागा, लेकिन उनके आदर्श आज भी प्रेरणा स्रोत हैं।

सीवान, हिन्दुस्तान संवाददाता। शहर के मखदुम सराय स्थित परमात्म दर्शन भवन में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की स्थानीय शाखा में बुधवार को कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर ब्रह्माकुमारी संस्थान में प्यार से मम्मा कही जाने वाली संस्थान की मातेश्वरी जगदंबा सरस्वती का दिव्य स्मृति दिवस बड़े ही शांतव सुरम्य वातावरण में मनाया गया। सेवा केन्द्र की संचालिका राजयोगिनी बीके सुधा बहन ने बताया कि ईश्वरीय विश्वविद्यालय की प्रथम प्रशासिका मातेश्वरी जगदंबा सरस्वती थी।
मातेश्वरी जगदंबा सरस्वती की विशेषताएँ
उन्होंने बताया कि ब्रह्मा बाबा ने उनकी आध्यात्मिक लगन को देखकर उन्हें यज्ञ की सबसे पहली संतान व मातेश्वरी जगदंबा विश्व माता के रूप में स्वीकार किया। मां ज्ञान मंथन धीरज व मधुरता अद्वितीय थी। बीके सुधा बहन ने उनके अनमोल विचार, उनके गाए भजन व ब्रह्मकुमारी के राजयोग ध्यान के बारे में विस्तार से बताया। कहा कि बिल्कुल अपने नाम के अनुरूप ही प्रेम की मूर्ति थीं। ज्ञान की देवी नाम से ज्ञान योग्यता का प्रारंभ हुआ। देह से न्यारी होकर ईश्वरी स्मृति में ऐसी मगन हो जाती कि उनकी रुहानियत भरी-बातें सुनने वाले देह से न्यारा होकर ईश्वरीय प्रेम में भाव विभोर हो जाते, उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त होती और श्रीकृष्ण का साक्षात्कार भी करते थे। तब लोगों ने उन्हें राधे की बजाय ओम राधे का नाम दिया। उन दिनों जब कभी ब्रह्मा बाबा दूसरे नगर में चले जाते तो वहां से भी ज्ञान का पत्र लिखकर ओम राधे के पास भेजते थे। वह विस्तृत व्याख्या करती थीं। सुनने वालों को ऐसा लगता कि वह ज्ञान की लोरी दे रही हैं या ज्ञान गीत सुना रही हैं। और भी उन्हें माता शब्द से संबोधित करने लगे या मम्मा कहने लगे। उन्होंने अपना सर्वस्व प्रभु को अर्पण कर दिया। मां अपनी बुद्धि परमात्मा को समर्पित कर दी। इन दोनों ही विशेषता के कारण वह मम्मा कहलाई।
मम्मा का अवसान
इस पुरुषार्थ में ब्रह्मा वत्स में से अद्वितीय व आज्ञा के फलस्वरुप उन्होंने अपने परिपक्व अनुभवों के द्वारा सभी यज्ञ बच्चों को मातृत्व ज्ञान की पालना दी, इसलिए यज्ञ माता कहलाई। मम्मा ने 24 जून 1965 को अपना देह त्याग दिया। उनके आदर्श व बाबा की शिक्षाओं का पालन आज भी ब्रह्माकुमारियों का सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत है। कार्यक्रम में एसपी पूरन कुमार झा, डीईओ राघवेन्द्र प्रताप सिंह, मंडल कारा अधीक्षक देवाशीष सिन्हा समेत ब्रह़ाकुमार व कुमारियां समेत गणमान्य लोग उपस्थित थे।
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