सरयू तटीय क्षेत्र में दुग्ध उत्पादन समृद्ध, पर लाभ से वंचित पशुपालक
सरयू नदी के तटीय क्षेत्र में दूध का उत्पादन लाखों लीटर हो रहा है, लेकिन पशुपालक आर्थिक संकट में हैं। बिचौलिए दूध को औने-पौने दामों में खरीदकर मुनाफा कमा रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में दूध उत्पादन में लगातार गिरावट आई है, जिससे किसानों की आय कम हो रही है। सरकार को बिचौलियों की भूमिका सीमित कर किसानों को उचित मूल्य दिलाने की आवश्यकता है।

इंट्रो- सरयू नदी के दियारे में कभी दूध की धारा बह रही थी। सरकारी आंकड़े यही दर्शा रहे हैं कि यहां हर रोज लाखों लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। इनमें आधे दूध की ही खपत है। अवशेष दूध जिले व दूसरे शहरों में खप रहा है। दूध का बेहतर उत्पादन होने के बाद भी पशुपालक आर्थिक रूप से कंगाल बने हुए हैं, लेकिन औने-पौने दामों पर दूध खरीद कर बिचौलिए मालामाल हो रहे हैं। हालांकि, पिछले पांच सालों का ग्राफ देखें तो साल-दर-साल दूग्ध उत्पादन घट रहा है। इससे दुग्ध उत्पादक किसानों की आय दिनोंदिन घटती जा रही है।
प्रस्तुत है रिपोर्ट- उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे सरयू नदी के तटीय इलाके में पशुधन की भरपूर संपदा है। पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जिले में महीष व गोवंशीय पशुओं की संख्या पांच लाख से अधिक है। इनमें करीब 2.50 लाख दुधारू पशु शामिल हैं, जिनसे प्रतिदिन लाखों लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। बावजूद इसके, उत्पादन और खपत के बीच का लाभ पशुपालकों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है। जानकारी के मुताबिक, जिले में प्रतिदिन 20 से 25 हजार लीटर दूध की खपत स्थानीय बाजार में होती है। वहीं 70 से 80 हजार लीटर दूध सरकारी और निजी डेयरियों द्वारा खरीदा जाता है। यह दूध छपरा, मुजफ्फरपुर सहित अन्य जिलों और प्रदेशों तक पहुंचता है। हैरानी की बात यह है कि यहां उत्पादित दूध विभिन्न कंपनियों द्वारा पैक कर दोबारा जिले में ही ऊंचे दामों पर बेचा जाता है। यानी उत्पादन और स्थानीय मांग के बावजूद लगभग 50 प्रतिशत दूध बाहरी जिलों और प्रदेशों में चला जाता है। दूध की बढ़ती खपत के बीच बिचौलियों की भूमिका भी अहम हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालकों से 30 से 35 रुपये प्रति लीटर की दर से दूध खरीदा जाता है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यही दूध 60 से 70 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। बिचौलिए इसे डेयरियों को 45 से 50 रुपये प्रति लीटर की दर से आपूर्ति करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा मुनाफा बिचौलियों की जेब में जा रहा है। दियारा क्षेत्र के दूध से मुजफ्फरपुर और अन्य महानगरों की मिठाई दुकानों की शान बढ़ती है, लेकिन स्थानीय पशुपालकों को उसका समुचित लाभ नहीं मिल पाता। तेजी से घटती पशुपालकों की संख्या इस संकट की पुष्टि कर रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हर साल करीब 10 प्रतिशत की दर से दूध उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रही है। लागत बढ़ने और मुनाफा घटने के कारण कई किसान पशुपालन से दूरी बना रहे हैं। शहरी क्षेत्र में पशुपालन पर पाबंदी शहरी इलाकों में बढ़ते प्रदूषण और आबादी के दबाव के चलते प्रशासन ने आवासीय क्षेत्रों में पशुपालन पर पाबंदी सख्ती से लागू करनी शुरू कर दी है। इसका असर दुग्ध उत्पादन पर भी पड़ रहा है। सिसवन के पशुपालक दिनेश कुमार बताते हैं कि पहले उनके पास पांच मवेशी थे, अब केवल एक रह गया है। भूसा किसी तरह मिल जाता है, लेकिन हरा चारा छुट्टा मवेशी खा जाते हैं। चोकर और अन्य आहार की कीमतों में लगातार वृद्धि से दूध उत्पादन की लागत बढ़ गई है। यही स्थिति अन्य पशुपालकों की भी है। समितियों का ठप पड़ता संचालन जिले में रियायती दरों पर शुद्ध दूध उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विभिन्न दुग्ध समितियां संचालित हैं। इनके माध्यम से गांवों में दूध की खरीद की जाती है, लेकिन दशकों से इनके कमीशन में कोई वृद्धि नहीं हुई है। परिणामस्वरूप कई समितियां कागजों पर सक्रिय हैं, जबकि जमीनी हकीकत में वे बंद होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं। समय पर भुगतान नहीं मिलने से भी इन समितियों की कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बिचौलियों की भूमिका सीमित कर सीधे किसानों को उचित मूल्य दिलाया जाए, दुग्ध समितियों का कमीशन बढ़ाया जाए और भुगतान प्रणाली पारदर्शी बनाई जाए, तो दुग्ध उत्पादन में स्थिरता लाई जा सकती है। अन्यथा, पशुपालकों की घटती संख्या और गिरते उत्पादन से भविष्य में दूध संकट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रस्तुति- शैलेश कुमार सिंह
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