शहरीकरण व व्यस्त जीवनशैली के कारण हो गया सामूहिक फगुआ कम

Mar 01, 2026 03:44 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, सीवान
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सीवान, हिन्दुस्तान संवाददाता। आधुनिक हो गया है। प्राकृतिक रंगों की जगह अब पोटिन व मिलावटी रंगों ने ले रखा है। पहले जहां होली व अबीर के दौरान फगुआ गीत व भांग-ठंडाई की परंपरा रही है, लेकिन आज इसकी...

शहरीकरण व व्यस्त जीवनशैली के कारण हो गया सामूहिक फगुआ कम

सीवान, हिन्दुस्तान संवाददाता। जिले में होली का स्वागत करने के लिए लोग भरपूर तैयारी कर बैठे हैं। बाजार में ही होली को लेकर पूरी तरह से तेजी है। वैसे तो सीवान की होली आज भी भाईचारे का संदेश देती है, लेकिन यह अलग बात है कि समय के साथ होली मनाए जाने का स्वरूप पारंपरिक से आधुनिक हो गया है। प्राकृतिक रंगों की जगह अब पोटिन व मिलावटी रंगों ने ले रखा है। पहले जहां होली व अबीर के दौरान फगुआ गीत व भांग-ठंडाई की परंपरा रही है, लेकिन आज इसकी जगह डीजे पर कानफोड़ू व फुहड़ गीतों ने होली के पारंपरिक स्वरुप को ही बदल कर रख दिया है।

सफेद कुर्ता पैजामा की जगह कलरफल कुर्ता-पैजामा, जिंस-पैंट व महिलाओं के लिए विशेष रूप से सूती की छाप वाली साड़ी व सिंथेटिक साड़ी की जगह कशीदाकारी, शिफॉन व जार्जेट साड़ियां ने ले रखा है। पुरानी पीढ़ी के अनुसार, पहले पूरा गांव व मोहल्ला साथ मिलकर होली मनाता था, लेकिन अब यह काफी हद तक सीमित व व्यक्तिगत हो गई है। जिले के स्थानीय इतिहासकार व सांस्कृतिक संरक्षक बताते है कि पिछले 50 सालों में होली मनाने के तरीके में बड़ा बदलाव आया है। बदलाव समय का प्रतीक है, लेकिन संस्कृति को बनाए व बचाए रखना सबसे जरूरी है। इतिहासकार बताते हैं कि पहले होली पूरी तरह सामुदायिक उत्सव था। अब शहरीकरण व व्यस्त जीवनशैली के कारण सामूहिक फगुआ कम हो गया है। डीजे व फिल्मी गानों ने लोकगीतों की जगह ले ली है। सोशल मीडिया व मोबाइल कैमरे ने होली को डिजिटल रूप दे दिया है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित राजवंशी देवी बालिका उच्च विद्यालय की पूर्व प्राचार्या डॉ. सुशीला पांडेय ने बताया कि सीवान में होली यानि कि फगुआ पारंपरिक ढोल-नगाड़ों, अबीर-गुलाल व भांग-ठंडाई के साथ भाईचारे का प्रतीक है। सुबह में फगुआ गीतों, झूमर के साथ होली की शुरुआत होने की परंपरा रही है। हालांकि पिछले 50 वर्षों में प्राकृतिक रंगों की जगह केमिकल रंगों ने ले ली और गांव के मेल-मिलाप की बजाय डीजे व कृत्रिम सेलिब्रेशन का चलन बढ़ा है। दयानंद आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के पूर्व प्राचार्य डॉ. प्रजापति त्रिपाठी का कहना है कि होली के दौरान अखाड़ा में ढोलनगाड़े व मांदर के साथ फगुआ या झूमर गीतों की परंपरा रही है। पुराने समय में टेसू के फूल आदि से होली खेली जाती थी, लेकिन अब केमिकल्स व पक्के रंगों ने उनकी जगह ले ली है। पारंपरिक फगुआ की जगह अब डीजे व फिल्मी गानों ने ले ली है। अत्यधिक नशीले पदार्थों के चलन ने पारंपरिक भांग-ठंडाई का महत्व कम कर दिया है। समाजिकता में भी कमी आई है। प्रो. डॉ. अशोक प्रियम्बद ने बताया कि सीवान जिले में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि लोक संस्कृति, मेल-मिलाप व परंपराओं का उत्सव है। यहां होली की शुरुआत फाल्गुन मास के आते ही हो जाती है। गांवों में चौपालों पर ढोलक-झाल की थाप के साथ फगुआ गीत गूंजने लगते हैं। हो रामा फगुआ में… जैसे पारंपरिक गीत पीढ़ियों से गाए जाते रहे हैं। मगर अफसोस कि समय के बहाव में अब होली जैसा पर्व भी दिखावे की भेंट चढ़ रहा है। अवकाश प्राप्त बीडीओ तप्ती वर्मा ने बताया कि करीब 50 साल पहले तक सीवान के गांवों में होली का मुख्य आकर्षण सामूहिक फगुआ गायन होता था। रात भर लोग टोली बनाकर घर-घर जाते, गीत गाते, अबीर लगाकर आशीर्वाद लेते थे। उस दौर में लोकगीतों में सामाजिक व्यंग्य, धार्मिक भाव व प्रेम की झलक मिलती थी। ढोलक, मंजीरा व हारमोनियम के साथ गाया जाने वाला फगुआ, गांव की पहचान हुआ करता था। हालांकि अब यह पुराने दिनों की बात हो गई है। नंदकिशोर प्रसाद श्रीवास्तव ने बताया कि होली के दिन भांग व ठंडाई की विशेष परंपरा रही है। पहले घरों में खुद भांग पीसी जाती थी, उसमें बादाम, सौंफ, काली मिर्च व दूध मिलाकर ठंडई तैयार की जाती थी। साथ ही गुझिया, दही-बड़ा, मालपुआ व पूड़ी-सब्जी का विशेष पकवान बनता था। यह सब मिलकर उत्सव को पारिवारिक और सामूहिक रंग देता था। अब अधिकतर परिवारों में पारंपरिक पकवान की जगह रेडिमेड व्यंजनों ने ले लिया है। सावित्री देवी ने बताया कि पहले पलाश के फूल, हल्दी व चंदन से प्राकृतिक रंग बनाए जाते थे। लोग सफेद कुर्ता-पायजामा या साधारण कपड़े पहनकर होली खेलते थे। अब बाजार में केमिकल युक्त रंग, पिचकारी व स्प्रे का चलन बढ़ गया है। पिछले पांच दशकों में पारंपरिक प्राकृतिक रंगों की जगह रेडीमेड रंगों ने ले ली है।

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