सतरंगी लड़ियों का बढ़ा क्रेज तो मिट्टी के दीये की लौ हुई कम

Oct 19, 2024 12:14 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, सीतामढ़ी
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सीतामढ़ी में दीपावली के दौरान लोग दीयों की जगह इलेक्ट्रिक लाइट्स को प्राथमिकता दे रहे हैं। कुम्हारों का पेशा अब मुनाफे का नहीं रह गया है। पहले एक परिवार 50,000 दीये बेचता था, अब यह संख्या घटकर...

सतरंगी लड़ियों का बढ़ा क्रेज तो मिट्टी के दीये की लौ हुई कम

सीतामढ़ी। दीपावली को लेकर लोग तैयारी में जुट गए है। इस त्योहार में दीये का खास महत्व है। परंतु फैशन के इस दौर में दीये की जगह बिजली लाइट की लोग ज्यादा प्राथमिकता दे रहे है। वहीं दीया-बाती से लोग धीरे-धीरे दूर होते जा रहे है। जबकि मिट्टी के दीये से दीपोत्सव मनाने का एक अलग ही आनंद व खुशियां मिलती है। वहीं सदियों से मिट्टी के दीये बनाने वाले समाज कुम्हार की रोजी-रोटी के लिए आय का साधन है। जब भी दीपावली आता है तो कुम्हार लोग अपने पुस्तैनी धंधे में लग जाते है। कमल पंडित, दिनेश पंडित, बिनोद पंडित, सुरज पंडित ने बताया कि पर्व त्योहार के समय दीप, कुप्पी, कलश आदि की मांग रहती है। इसको लेकर काम में लग जाते है। हालांकि अब लोग दीपावली में दीप जलाने के बजाय बिजली के रंगीन बल्बों से घरों को सजाना ज्यादा पसंद करने लगे है। यहीं कारण है कि दीपावली के मौके पर जितना उल्लास कुम्हारों के मोहल्लों में कुछ साल पहले तक होता था। वह अब नहीं दिखता है। सतरंगी लड़ियों के बढ़ते क्रेज के कारण दीये की लौ कम होती जा रही है। हाल यह है कि अब दीपावली में पूजा तक ही मिट्टी के दीये का उपयोग लोग करते है।

आधुनिकता के दौर में मुनाफे का नहीं रहा पेशा : कुम्हार किशोर पंडित बताते है कि पहले दीपावली में एक परिवार 50 हजार दीये बेच लेते थे। अब आठ से दस हजार पर आकर सिमट गया है। इस साल मिट्टी के दीये 80 से 100 रुपये सैकड़ा, खिलौना 30 से 40 रुपये सेट, चुक्का पांच रुपये प्रति पीस, कलश 15 से 20 रुपये प्रति पीस बिक रहा है। कुंभकारों ने बताया कि दुर्गा, दीपावली व छठ के समय ही मुख्य रूप से दीप, कुप्पी, कलश की मांग रहती है। इसके बाद उनलोगों को खेत में मजदूरी कर जीवन गुजारना पड़ता है। आधुनिकता के इस दौर में यह पेशा अब मुनाफे का नहीं रह गया है।

अब तो लागत निकालना भी हो गया है मुश्किल :

कुम्हारों ने बताया कि दीये बनाने के लिए मिट्टी से लेकर लकड़ी व कोयला तक खरीदनी पड़ती है। एक ट्रैक्टर मिट्टी के लिए दो हजार खर्च पड़ता है। सौ रुपया का सौ पीस गोइठा तो 50 रुपये में पांच किलो कोयला मिलता है। इतनी पूंजी लगा कर भी कमाईनहीं हो पाती है।

मोमबती व इलेक्ट्रिक लाइटें से बिक्री घटी : कुम्हार विश्वनाथ पंडित ने बताया कि मोमबती व इलेक्ट्रिक लाइटें आने से दीये की बिक्री नाममात्र रह गई है। बेरोजगारी का आलम यह है कि फैशन के इस दौर में भी मजबूरी में मिट्टी का बर्तन बनाना लाचारी है। क्योंकि दीपावली के अलावा शादी-विवाह में मिट्टी का बर्तन कम ही उपयोग में लाया जाता है।

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