महंगाई व लचर चिकित्सा व्यवस्था की मार झेल रहे जिले के लाखों पशुपालक
जिले के लाखों पशुपालक आर्थिक और सामाजिक संकट में हैं। महंगाई और सरकारी उदासीनता से पशुपालन घाटे का सौदा बन गया है। दूध की कीमतें स्थिर हैं जबकि पशु आहार के दाम बढ़ रहे हैं। छोटे पशुपालक कर्ज और चिंता के बोझ तले दब गए हैं। सरकार ने पशुपालकों की समस्याओं को लेकर ठोस कदम उठाने का आश्वासन दिया है।
जिले के लाखों पशुपालक आज गहरे आर्थिक और सामाजिक संकट से गुजर रहे हैं। कभी गांवों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाला पशुपालन पेशा आज महंगाई, सरकारी उदासीनता और नीतिगत असंतुलन की मार झेल रहा है। एक ओर रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दूध की कीमत वर्षों से लगभग स्थिर बनी हुई है। इस असमानता ने पशुपालकों की कमर तोड़ दी है। बीते कुछ वर्षों में भूसा, खल्ली, चारा और पशु आहार के दाम में बेतहाशा वृद्धि हुई है। जो भूसा कभी सस्ता और आसानी से उपलब्ध था, आज कई इलाकों में महंगे दामों पर बिक रहा है।
खल्ली और दाने के दाम में 30 से 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। मजबूर पशुपालक महंगे पशु आहार खरीदने को विवश हैं, लेकिन उसके अनुपात में दूध के दाम में कोई उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं हुई है। परिणामस्वरूप पशुपालन अब लाभ का नहीं, बल्कि घाटे का सौदा बनता जा रहा है। छोटे और मध्यम पशुपालक इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित हैं। जिनके पास दो-चार गाय या भैंस हैं, उनके लिए पशुपालन परिवार चलाने का मुख्य साधन था। लेकिन अब वही परिवार कर्ज और चिंता के बोझ तले दबता जा रहा है। दुग्ध संघों और निजी कंपनियों द्वारा दिया जाने वाला दूध का मूल्य उत्पादन लागत तक नहीं निकाल पा रहा है। आज भी कई जगह पशुपालकों से दूध उसी दर पर खरीदा जा रहा है, जो पांच साल पहले था। समस्याएं केवल लागत और कीमत तक सीमित नहीं हैं। सरकारी पशु चिकित्सा व्यवस्था की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। दावों के बावजूद अधिकांश सरकारी वेटनरी डॉक्टर गांवों में बथान तक जाकर पशुओं का इलाज नहीं करते। आपात स्थिति में पशुपालकों को सरकारी सहायता मिलना लगभग असंभव हो जाता है। मजबूरन उन्हें निजी डॉक्टरों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनका इलाज महंगा होता है। गरीब पशुपालकों के लिए यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ किसी आपदा से कम नहीं। संक्रामक बीमारियां इस संकट को और गहरा कर रही हैं। लम्पी स्किन डिजीज,खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियों से मवेशियों की मौत हो रही है। एक पशु की मौत का अर्थ है पूरे परिवार की आजीविका पर संकट। कई मामलों में मुआवजा समय पर नहीं मिल पाता, जबकि टीकाकरण और रोकथाम की योजनाएं कागजों तक सीमित रह जाती हैं। इन हालातों का सबसे गंभीर परिणाम यह है कि लोग धीरे-धीरे पशुपालन जैसे पारंपरिक और आवश्यक पेशे से दूर हो रहे हैं। युवा पीढ़ी इसे भविष्यहीन मानने लगी है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था, दुग्ध उत्पादन और पोषण सुरक्षा पर गहरा असर पड़ेगा। पशुपालकों की प्रमुख मांग है कि दूध की कीमत उत्पादन लागत के आधार पर तय की जाए और उसकी नियमित समीक्षा हो। अच्छी नस्ल के पशुओं के लिए गुणवत्तापूर्ण सीमन की सुलभ व्यवस्था की जाए, ताकि उत्पादन बढ़े और आय में सुधार हो। सरकारी पशु चिकित्सकों को जवाबदेह बनाया जाए कि वे गांवों में जाकर समय पर इलाज करें। साथ ही संक्रामक बीमारियों की रोकथाम के लिए प्रभावी टीकाकरण, जागरूकता अभियान और पारदर्शी मुआवजा व्यवस्था लागू की जाए।
बोले जिम्मेदार-
सरकार पशुपालकों की समस्याओं को लेकर गंभीर है। दूध की लाभकारी कीमत सुनिश्चित करने, पशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और सरकारी वेटनरी डॉक्टरों की जवाबदेही तय करने की दिशा में ठोस पहल की जाएगी। लम्पी और खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियों से बचाव के लिए टीकाकरण अभियान को और प्रभावी बनाया जाएगा। पशुपालकों को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता है।
-बीरेन्द्र कुमार, विधायक, रोसड़ा विधानसभा।
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