सभी मार्गों पर हो बस संचालन और प्रशासन का सहयोग हो तो मिले राहत
शहर में मिनी बसों की संख्या कम होने से आम लोगों, छात्रों और कामकाजी महिलाओं को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। उन्हें ऑटो या अन्य साधनों पर अधिक किराया चुकाना पड़ रहा है। बस संचालक बताते हैं कि कोरोना महामारी के बाद स्थिति और खराब हो गई है, जिससे बसों की कमाई में गिरावट आई है।
मिनी बसों की शहर में संख्या घटने से सबसे ज्यादा नुकसान आमलोगों, छात्र-छात्राओं, कामकाजी महिलाओं आदि की होती हैं। इन्हें ऑटो या अन्य साधनों पर दोगुना किराया तक खर्च करना पड़ता है। बसों में सफर काफी सस्ता होती है। दूसरी ओर, बस मालिकों का कहना है कि पहले बस ड्राइवर के लिए वेतन निर्धारित था। साल में बोनस भी दिया जाता था, लेकिन स्थिति ऐसी बदली कि सारी व्यवस्था बदहाल हो गई। अब बस ड्राइवर अपना पैसा और पेट्रोल खर्च आदि निकालकर उन्हें पैसे देते हैं। एक तरह से कहा जाए कि अब बस ड्राइवर ही बस मालिकों को चला रहे हैं, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
शहर का एकलौता बस स्टैंड कर्पूरी बस पड़ाव में एक दशक पूर्व बसों की संख्या 250 थी। जो अब धीरे धीरे 50 से 60 तक सीमट कर रह गई है। बस संचालकों ने बताया कि शुरुआत में ग्रामीण क्षेत्रों में आमल लोगों सहित विद्यार्थियों के लिए बस ही एक साधन था, जिससे वे सस्ते में सफर कर सकते थे। कंपनी के कर्मचारी भी बसों से ही सफर करते थे, लेकिन अब सभी के पास अपनी गाड़ी हो गई है. कंपनियों और स्कूलों में अपनी बस सेवा हो गई है। इस कारण बसों में यात्रियों की संख्या भी कम होने लगी है और इसका असर बस मालिक और स्टाफ सभी पर पड़ रहा है। 2020-21 में आई कोरोना माहामारी ने तो सब कुछ बिखेर दिया। स्थिति यह है कि बस संचालक और ड्राइवर अब तक उस स्थिति से उबर नहीं पाए हैं। अब बसों से होने वाली कमाई काफी घट गई है, बस बसें सड़क पर इसलिए चलाई जा रहीं हैं, कि पड़े-पड़े वे खराब न हो जाएं। 50 फीसदी बस स्टाफ चला रहे ऑटो: बस संचालकों का कहना है कि वर्तमान समय में बस के लिए स्टाफ मिलना मुश्किल हो रहा है। बसों के बंद होने और दूसरे अन्य कारणों से करीब 50 प्रतिशत बस स्टाफ ऑटो चला रहे हैं। ऐसे में बस चलाने के लिए ड्राइवर और दूसरे स्टाफ भी नहीं मिल रहे हैं। इधर बसों के संचालन में लगातार घाटा का ही सौदा हो रहा है। हर रूट पर रंगदारी का ही बोल बाला है। समस्तीपुर से मुजफ्फरपुर, पटना, बेगुसराय, दरभंगा सहित सभी तमाम रूट में बस संचालित हो रहे है। लेकिन पहले की तरह फायदा नहीं रह गया है। निजी संस्थानों की बस सेवा ने भी डाला प्रभाव: अब स्थिति यह है कि शहर की मिनी बस सेवा को चौतरफा हमलों से नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। इसका सबसे अहम कारण है शहर में ऑटो की बढ़ती संख्या। जिला प्रशासन द्वारा इसकी संख्या निर्धारित नहीं की गई है। लगातार ऑटो का रजिस्ट्रेशन हो रहा है और शहर में ऑटो की बाढ़ सी आ गई है। इसी तरह सेंट्रल ट्रांसपोर्ट की बसों को केवल कर्मचारियों के आने-जाने के लिए रखा गया है, लेकिन वे बसें भी खाली रहने पर यात्रियों को ढोने लगी हैं। उनकी प्राइवेट बुकिंग भी हो रही है। इसका असर भी मिनी बस सेवा पर देखने को मिल रहा है। परिवहन विभाग में पारददर्शिता व सुधार की उम्मीद : शहर में बस चालकों को अपना लाइसेंस बनवाने में गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। परिवहन विभाग में लंबी प्रक्रियाओं और ऊंची फीस के कारण, कई बस चालक बिना दलालों की मदद के अपना काम पूरा नहीं कर पा रहे हैं। दलालों का नेटवर्क इतना मजबूत है कि बहुत परेशानी होती है।
बोले जिम्मेदार-
मिनी बसों का संचालन अब धीरे-धीरे कम हो रहा है। लोग जल्द से जल्द अपने मंजिल तक पहुंचने को लेकर ऑटो का सहारा लेते है। हालांकि लॉट रूट पर जाने के लिए यात्रियों के लिए अब भी बसों का ही संचालन किया जा रहा है। बस संचालकों के लिए कई योजनाएं चला रखी गई है। -विवेक चन्द्र पटेल, डीटीओ

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