भिड़हा की होली परंपरा की थाती मिले राजकीय महोत्सव का दर्जा

Mar 02, 2026 10:39 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, समस्तीपुर
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भिड़हा गांव की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह 250 वर्षों की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यहां होली का उत्सव अनुशासन और सामूहिकता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। स्थानीय विधायक ने इसे राजकीय महोत्सव घोषित करने की मांग की है, ताकि इस परंपरा को संरक्षित किया जा सके।

भिड़हा की होली परंपरा की थाती मिले राजकीय महोत्सव का दर्जा

हार के समस्तीपुर जिले के रोसड़ा प्रखंड में स्थित भिड़हा गांव की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि पूर्वजों की सांस्कृतिक विरासत की एक जीवंत थाती है। लगभग 250 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी अपनी मूल भावना और अनुशासन को समेटे हुए है। ब्रज और वृंदावन की तर्ज पर शुरू हुई इस होली की परंपरा ने आधुनिक जमाने में भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूती से थामे हुए है। मर्यादा और अनुशासन का अनूठा उदाहरण भिड़हा की होली की सबसे बड़ी विशेषता है, जहां त्योहारों में अक्सर हुड़दंग देखने को मिलता है। वहीं, यहां के तीन दिवसीय उत्सव होलिका दहन, रंगोत्सव और मरजाद जैसी परंपरा सामूहिक अनुशासन का प्रमाण है।

होली के हुड़दंग के बीच जाति, धर्म और वर्ग के भेद मिट जाते हैं। मालिक-मजदूर और हिंदू-मुस्लिम का एक साथ रंगों में सराबोर होकर चटक सामाजिक समरसता की समावेशी तस्वीर पेश करता है। इसलिए स्थानीय स्तर पर इस धरोहर को सहेजने के लिए लोगों में जागरूकता दिख रही है। अब समय आ गया है कि इस ढाई सौ पुरानी परंपरा को राजकीय महोत्सव का दर्जा दिया जाए। ताकि सरकारी संरक्षण में परंपरा को व्यापक पहचान मिल सके। साथ ही आने वाली पीढ़ियां भी अपनी इस गौरवशाली लोक-संस्कृति पर गर्व कर सके। दरअसल,ब्रज और वृंदावन की तर्ज पर शुरू हुई भिड़हा की होली ने समय के साथ आधुनिकता को अपनाया है। लेकिन अपनी मूल भावना को अक्षुण्ण रखा है। भिड़हा की होली की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मर्यादा है। जहां देश के कई हिस्सों में होली के दौरान अनुशासनहीनता की खबरें आती हैं, वहीं इस गांव में उत्साह के बीच अनुशासन का अनुपम उदाहरण देखने को मिलता है। बैंड बाजों की प्रतियोगिता, बाहर से आने वाले कलाकारों की प्रस्तुतियां और गांव के तीनों टोलों की सजावट इसे लोक उत्सव से आगे बढ़ाकर सांस्कृतिक महाकुंभ का रूप देने में कोई कसर नहीं छोड़ती है। वर्षों से अनेक साहित्यकार और राजनेता इस अनूठी होली के साक्षी बन चुके हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर से लेकर कर्पूरी ठाकुर और रामविलास पासवान जैसे दिग्गजों की उपस्थिति इसकी ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करती है। अब जबकि स्थानीय विधायक बीरेन्द्र कुमार ने विधानसभा में भिड़हा की होली को राजकीय महोत्सव घोषित करने का प्रश्न उठाया है। राजकीय मान्यता मिलने से इस उत्सव को संरक्षित करने, पर्यटन को बढ़ावा देने का अवसर मिलेगा। प्रखंड वासियों का कहना है कि सरकार को चाहिए कि वह इस मांग पर गंभीरता से विचार करे। भिड़हा की होली केवल एक गांव का उत्सव नहीं, बल्कि बिहार की जीवंत लोक-संस्कृति का प्रतीक है। ऐसी परंपराएं यदि संरक्षित और प्रोत्साहित की जाएं, तो वे आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक प्रेरणा बन सकती हैं। भिड़हा की होली यह संदेश देती है कि उत्सव तभी सार्थक है, जब उसमें समरसता, मर्यादा और सामूहिकता का रंग घुला हो। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है और यही इसे राजकीय महोत्सव घोषित करने का सबसे मजबूत आधार भी है।

बोले जिम्मेदार-

भिड़हा की होली केवल स्थानीय उत्सव नहीं, बल्कि बिहार की समृद्ध लोक-संस्कृति और सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण है। इस ऐतिहासिक परंपरा को राजकीय महोत्सव घोषित करने की मांग को लेकर उन्होंने विस में प्रश्न उठाया है। सरकार इस मांग पर विचार करेगी व जल्द भिड़हा की होली को वह सम्मान मिलेगा जिसकी वह हकदार है।

-बीरेन्द्र कुमार, विधायक, रोसड़ा विधानसभा क्षेत्र।

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