सरोजा गांव के लोगों ने कहा-हम मृत्यु भोज पर बेजा खर्च नहीं करेंगे, उस पैसे से बच्चों को पढ़ाएंगे
सिमरी बख्तियारपुर | एक संवाददाता हम मृत्यु भोज में बेजा खर्च नहीं करेंगे, उन
सिमरी बख्तियारपुर | एक संवाददाता
हम मृत्यु भोज में बेजा खर्च नहीं करेंगे, उन पैसों से हम बच्चों को पढ़ाएंगे एवं बुजुर्गों की सेवा करेंगे ऐलान या यूं कह लें कि सामाजिक रूढ़ीवादिता के खिलाफ एक बिगुल है, जो सरोजा गांव के लोगों ने फूंका है। सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड के सरोजा के लोगों ने मृत्यु भोज को सामाजिक कुरीति बता कर बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। साथ ही साथ कहीं अन्य गांव से भी अगर मृत्यु भोज का निमंत्रण आता है, तो वहां भी खाने के लिए नहीं जाना जैसा निर्णय लिया गया है।
इस निर्णय से समाज में बदलाव की बयार लाने का प्रयास किया जा रहा है। सरोजा पंचायत के 70 वर्षीय अवकाश प्राप्त सुनील कुमार सिंह के श्राद्ध कर्म से शुरू कर दी गई है। मृतक के पुत्र प्रशांत कुमार किट्टू एवं बमबम कुमार सामाजिक बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार अपने पिता की मृत्यु पर भोज नहीं कर रहे हैं। उन्होंने अपने पिता के निधन पर अस्थि संचय, सतलाहन जैसे श्राद्ध भोज को समाप्त करने में महती भूमिका निभाई है। वहीं नखवाल, श्राद्ध एवं संपीडन के दिन मृत्यु भोज आयोजित नहीं कर सदियों से चली आ रही इस सामाजिक कुरीति को मिटाने का साहसिक कदम उठाया है। उनके पुत्र ने बताया कि पिता जी की तेरहवीं पर मृत्यु भोज आयोजित करने में उन्हें किसी तरह की कोई समस्या नहीं थी। लेकिन इस इलाके के हमने मृत्यु भोज का बहिष्कार इस उद्देश्य से किया।
इस संबंध में बैठक में नवनिर्वाचित मुखिया पति शैलेन्द्र कुमार सिंह, जयशंकर सिंह, धर्मवीर सिंह राणा प्रताप सिंह, जय प्रताप सिंह राजू सिंह, नंदन सिंह, अर्जुन सिंह, धीरेंद्र सिंह, उदयशंकर राणा, विजय सिंह आदि ने कहा कि अक्सर लोगों को मृत्यु भोज के लिए या तो कर्ज लेना पड़ता है या फिर संपत्ति बेचना पड़ता है। इससे उबरने में वर्षों लग जाते हैं। मृत्यु भोज बंद कर समाज में समरसता की भावना भी पैदा की जा सकती है। वहीं सरोजा पंचायत के नवनिर्वाचित मुखिया चित्रा सिंह, मुखिया प्रतिनिधि सह समाजसेवी शैलेंद्र सिंह ने कहा कि समाज के द्वारा लिया गया निर्णय सराहनीय है। भविष्य में पूरे पंचायत के सभी जाति में आम सहमति बनाकर मृत्यु भोज पर प्रतिबंध लगाए जाने का प्रयास किया जाएगा।
मृत्यु पर पांच दिन का होता था भोज:विदित हो कि सरोजा पंचायत में पांच दिन का भारी-भरकम मृत्यु भोज किया जाता था। जिसमें मृत्यु के चौथे दिन हाड़ संचय का, सातवें दिन सतलहान का, 12वें दिन नखवाल का,13 वें दिन में एकादशा श्राद्ध का तो 14वें दिन द्वादशा संपीडन का भोज किया जाता था। साथ ही साथ समूचे गांव सहित सामर्थ्य के अनुसार 5 गांव 10 गांव 20 गांव सहित पूरा अनुमंडल सिमरी बख्तियारपुर तक को निमंत्रण दिया जाता था।
जिसमें अनावश्यक खर्च के साथ शोक के घर में भोज शोभा नहीं देता था। इसलिए समाज के लोगों ने बैठक कर पूरी तरह से मृत्यु भोज पर रोक लगाने का साहसिक प्रयास किया है। मृत्यु भोज पर खर्च की जाने वाली राशि से मृतक के नाम से समाज में किसी धरोहर के निर्माण या बच्चों को उच्चस्तरीय शिक्षा दिलाने का फैसला लिया है।
कोष बनाने की योजना: ग्रामीणों के मुताबिक जल्दी ही एक कोष स्थापित किया जाएगा। जिसमें अपनी स्वेच्छानुसार मृतक के परिजन दान देंगे। राशि का उपयोग गरीबों के इलाज व अन्य सामाजिक कामों में किया जाएगा।
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