
बदलाव: अब सहरसा में अंडी रेशमपालन करेंगे किसान
सहरसा जिले के 200 किसानों का चयन अंडी रेशमपालन के लिए किया गया है। इन किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है और उद्योग विभाग अंडी का बीज, कसेरू पौधे, रेशमपालन किट और खाद उपलब्ध कराएगा। अंडी रेशमपालन से किसानों को बेहतर आय मिलने की उम्मीद है।
सहरसा, रंजीत। अब सहरसा जिले के किसान मलवरी नहीं अंडी रेशमपालन करेंगे। अंडी रेशमपालन के लिए फिलहाल जिले में दो प्रखंड कहरा और सौरबाजार के 200 किसानों का चयन किया गया है। चयनित सभी 200 किसानों को अंडी रेशमपालन किस तरह से किया जाय उसके लिए प्रशिक्षित भी कर दिया गया है। अंडी रेशमपालन के लिए किसानों को उद्योग विभाग अंडी का बीज और कसेरू पौधे उपलब्ध कराएगी। रेशमपालन किट, कीड़ा रखने वाला प्लास्टिक का स्टैंड और खाद भी देगी। ककून को खादी विभाग को बेचकर किसान समृद्ध होंगे। जिला उद्योग केन्द्र के महाप्रबंधक मुकेश कुमार ने कहा कि सिल्क समग्र योजना के तहत सहरसा जिले के कहरा और सौरबाजार प्रखंड के 200 किसानों को अंडी रेशमपालन योजना से जोड़ा गया है।
अंडी रेशमपालन का फायदा बताते हुए उन्हें खेतों पर जाकर प्रशिक्षकों के द्वारा प्रशिक्षित किया गया है। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें बताया गया है कि खेत में अंडी या कसेरू का पौधा कैसे और कितनी दूरी पर लगाया जाएगा। अंडी(ऐरी) के पत्ते को जब अहिंसावादी कीड़ा खायेगा फिर उससे ककून यानी रेशा निकलेगा। ककून से ही सिल्क के धागे व कपड़े तैयार होते हैं। अंडी की उपलब्धता कम के कारण महंगा मिलने वाला कसेरू पौधे देगा: अंडी की उपलब्धता कम होने के कारण उद्योग विभाग किसानों को एक-एक फीट का तैयार कसेरू के पौधे उपलब्ध कराएगा। महाप्रबंधक उद्योग ने कहा कि कसेरू का पौधा अंडी के मुकाबले महंगा पड़ता है। लेकिन, अंडी की उपलब्धता कम रहने के कारण किसानों को कसेरू के पौधे उपलब्ध कराए जाएंगे। साथ में कम-कम मात्रा में अंडी के बीज भी दिए जाएंगे। किसानों को इसके अलावा रेशमपालन किट, कीड़ा रखने के लिए प्लास्टिक का स्टैंड और खाद उपलब्ध कराएंगे। किसानों को मात्र सिल्क बोर्ड या आसाम से सिल्क बोर्म का अंडा खरीदना पड़ेगा। 3-3 फीट पर लगाना पड़ेगा कसेरू का पौधा: किसान को 3-3 फीट की दूरी पर कसेरू का पौधा लगाना पड़ेगा। महाप्रबंधक उद्योग ने कहा कि सिल्क समग्र योजना का लाभ लेने के लिए 10 कट्ठा अपनी या लीज पर ली गई जमीन होना अनिवार्य है। अंडी व मलवरी रेशमपालन में अंतर: महाप्रबंधक ने कहा कि मलवरी रेशमपालन में कीड़ा को मारने की जरूरत पड़ती है। अंडी रेशमपालन में कीड़ा को मारने की जरूरत नहीं पड़ती। अंडी रेशमपालन का एक और फायदा है कि यह मलवरी के मुकाबले जल्दी से तैयार होता है। इसका सिल्क कपड़ा अच्छा रहता है। उत्पादन बेहतर हुआ तो सिल्क के विभिन्न परिधान तैयार करने पर होगा काम: महाप्रबंधक उद्योग ने कहा कि अंडी रेशमपालन सफल रहा और उत्पादन बेहतर हुआ तो सिल्क के विभिन्न परिधान तैयार कराने की दिशा में काम किया जाएगा। सिल्क की साड़ी, दुपट्टा, सूट, सलवार सहित अन्य परिधान तैयार कराते उसे बाजार उपलब्ध कराने की योजना बनाई जाएगी। जीविका का ना लग सका रेशम उद्योग ना ही सफल हुई मलवरी खेती: जिले के सोनवर्षाराज में रुबर्न मिशन के तहत जीविका की मलवरी प्रोड्यूसर कंपनी खोलकर कोकून का उत्पादन करते सिल्क के धागे बनाकर कपड़े तैयार करने की योजना थी। इसके लिए 3.20 करोड़ राशि का प्रोजेक्ट भी आ गया था। लेकिन, कृषि विभाग की जमीन का हस्तांतरण नहीं होने से यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट अटक गया। अगर यह प्रोजेक्ट धरातल पर उतरता तो सहरसा सिल्क हब बनता। उधर, जीविका दीदियों द्वारा की गई मलवरी खेती भी सफल नहीं हो सकी। कहते हैं अधिकारी: अंडी रेशमपालन के लिए जिले में 200 एससी-एसटी किसानों का चयन किया गया है। अंडी रेशमपालन के लिए उनके खेतों पर जाकर प्रशिक्षण भी दे दिया गया है। मुकेश कुमार, महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र

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