खेती पर बढ़ गयी लागत, उचित मूल्य पर आफत
-धरतीपुत्रों की व्यथा : पूर्णिया, हिन्दुस्तान संवाददाता। पूर्णिया जिले में खेती-किसानी का स्वरूप पिछले 10 से 15 वर्षों में काफी बदल गया है। पहले जहा

पूर्णिया, हिन्दुस्तान संवाददाता। पूर्णिया जिले में खेती-किसानी का स्वरूप पिछले 10 से 15 वर्षों में काफी बदल गया है। पहले जहां खेती पारंपरिक साधनों पर आधारित थी, वहीं अब आधुनिक कृषि उपकरण, उन्नत बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक और सिंचाई संसाधनों पर निर्भरता तेजी से बढ़ी है। इन साधनों के बढ़ने के साथ-साथ खेती की लागत भी कई गुना बढ़ गई है, जबकि किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य अब भी नहीं मिल पा रहा है। पूर्णिया के किसानों ने खेती को आधुनिक बनाने के लिए ट्रैक्टर, पंपसेट, थ्रेसर, हार्वेस्टर और हाइब्रिड बीज का इस्तेमाल बढ़ाया है। इससे उत्पादन क्षमता तो बढ़ी, लेकिन लागत पर भारी असर पड़ा है।
सबसे अधिक असर खाद और कीटनाशकों की कीमतों में बढ़ोतरी से पड़ा है। हाल के वर्षों में उर्वरकों की कीमतों में 15 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है । वहीं कीटनाशकों की लागत में भी 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की आशंका जताई गई है । बीज की कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं, जिससे बुआई लागत पहले की तुलना में काफी अधिक हो गई है। सिंचाई के लिए डीजल और बिजली की लागत अलग से बढ़ रही है। एक एकड़ खेत की लागत पहले जहां 10 से 15 हजार रुपये होती थी, वहीं अब कई फसलों में यह 25 से 40 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है। -गांवों में अभी भी पर्याप्त गोदाम और कोल्ड स्टोरेज नहीं :-----भंडारण और तकनीकी सहायता की बात करें तो गांवों में अभी भी पर्याप्त गोदाम और कोल्ड स्टोरेज नहीं हैं, जिससे किसानों को मजबूरी में फसल तुरंत बेचनी पड़ती है। नई तकनीक जैसे ड्रिप सिंचाई या आधुनिक कृषि मशीनें अभी सीमित किसानों तक ही पहुंची हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि लागत बढ़ने के बावजूद किसानों को फसल का उचित दाम नहीं मिल रहा है। गेहूं और धान जैसी फसलों पर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है, लेकिन मक्का, दलहन और अन्य फसलों में सरकारी खरीद व्यवस्था कमजोर है। विशेषज्ञों का मानना है कि खेती में इनपुट-आउटपुट असंतुलन बढ़ गया है, यानी लागत तेजी से बढ़ रही है लेकिन उत्पाद की कीमत उतनी नहीं बढ़ रही । इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ रहा है और कई मामलों में उन्हें घाटे में खेती करनी पड़ रही है। जलवायु परिवर्तन ने खेती को और जोखिम भरा बना दिया है। -किसानों पर मौसम की भी मार : -----पूर्णिया में अब मौसम पहले की तरह स्थिर नहीं रहा। बेमौसम बारिश से फसल कटाई के समय नुकसान, ओलावृष्टि से खड़ी फसल बर्बाद तेज आंधी से मक्का और धान गिरना, सूखा और बाढ़ दोनों की स्थिति इन कारणों से उत्पादन में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। पहले जहां किसान मौसम का अनुमान लगाकर खेती करते थे, अब अनिश्चितता इतनी बढ़ गई है कि पूरी फसल जोखिम में रहती है। पूर्णिया जिले में पहले तालाब, आहर पाइन, कुएं और छोटी नहरें सिंचाई के प्रमुख साधन थे। लेकिन समय के साथ ये पारंपरिक स्रोत या तो सूख गए या अतिक्रमण की वजह से खत्म हो गए। इसका परिणाम यह हुआ कि किसान अब पूरी तरह डीजल पंप और बोरिंग पर निर्भर हो गए हैं। डीजल की कीमत बढ़ने से सिंचाई महंगी हो गई है, जिन किसानों के पास निजी बोरिंग नहीं है, उन्हें किराये पर पानी लेना पड़ता है। बढ़ती लागत, कम कीमत, मौसम की मार और सिंचाई संकट ने खेती को पहले से ज्यादा कठिन बना दिया है। किसान अब जोखिम और कर्ज के दबाव में खेती कर रहे हैं।-बोले किसान :------------किसान ब्रज किशोर भारती ने बताया कि सभी फसलों के लिए सरकारी खरीद व्यवस्था मजबूत हो,उर्वरक, बीज और कीटनाशक की कीमतों पर नियंत्रण, सिंचाई के पारंपरिक स्रोतों का पुनर्जीवन मौसम आधारित बीमा और मुआवजा व्यवस्था भंडारण और बाजार व्यवस्था में सुधार होने से किसानों को लाभ मिलेगा। किसान शंकर झा ने बताया कि पूर्णिया जिले में खेती के साधन तो बढ़े हैं, लेकिन इससे किसानों की स्थिति मजबूत नहीं हुई है। उल्टा लागत बढ़ने और आय स्थिर रहने से संकट गहरा गया है। जलवायु परिवर्तन और सिंचाई संकट ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो खेती से किसानों का मोहभंग और बढ़ सकता है।
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