उच्च जोखिम गर्भावस्था की पहचान-प्रबंधन में जिले को पहला स्थान

Apr 08, 2026 12:56 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, पूर्णिया
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पूर्णिया जिला ने बिहार में उच्च जोखिम गर्भावस्था की पहचान और प्रबंधन में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। 2021-22 में 2.9% से बढ़कर 2025-26 में यह दर 14.4% हो गई। कार्यशाला का उद्देश्य मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार लाना है। जिलाधिकारी ने सभी मामलों का समय पर फॉलो-अप सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

उच्च जोखिम गर्भावस्था की पहचान-प्रबंधन में जिले को पहला स्थान

पूर्णिया, वरीय संवाददाता। बिहार में उच्च जोखिम गर्भावस्था की पहचान एवं प्रबंधन के क्षेत्र में पूर्णिया जिला ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। वर्ष 2021-22 में जहां यह दर 2.9 प्रतिशत थी, वहीं वर्ष 2025-26 में बढ़कर 14.4 प्रतिशत हो गई है। मार्च 2026 में सर्वाधिक 21.2 प्रतिशत मामलों की पहचान की गई, जो फील्ड स्तर पर बेहतर ट्रैकिंग और सक्रिय निगरानी का परिणाम है। स्वास्थ्य संस्थानों के प्रदर्शन में बायसी (27.0%), अमौर (20.7%) और रुपौली (18.1%) अग्रणी प्रखंड रहे। जिलाधिकारी अंशुल कुमार की अध्यक्षता में “उच्च जोखिम गर्भावस्था की पहचान, ट्रैकिंग, प्रबंधन, फॉलो-अप एवं संस्थागत प्रसव सुनिश्चित करने” विषय पर यूनिसेफ़ के सहयोग से एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सभी गर्भवती महिलाओं की समय पर प्रसवपूर्व (एएनसी) जांच सुनिश्चित करते हुए शत-प्रतिशत संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना है, ताकि मातृ एवं शिशु-मृत्यु दर में कमी लाई जा सके। जिलाधिकारी ने अपने संबोधन में कहा कि प्रत्येक उच्च-जोखिम गर्भावस्था एक जीवन बचाने का अवसर है। उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों को निर्देश दिया कि कोई भी मामला छूटे नहीं, सभी का समय पर फॉलो-अप हो, डाटा एंट्री लंबित न रहे और हर उच्च जोखिम गर्भावस्था का संस्थागत प्रसव सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य जिले के विकास का महत्वपूर्ण सूचक है और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही ना की जाए। कार्यशाला में बताया गया कि उच्च जोखिम गर्भावस्था की समय पर पहचान और समुचित प्रबंधन मातृ एवं शिशु-मृत्यु दर को कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं। यदि गर्भावस्था के शुरूआती चरण में ही जोखिम की पहचान कर नियमित फॉलो-अप और संस्थागत प्रसव सुनिश्चित किया जाए, तो गंभीर जटिलताओं और मृत्यु के मामलों में काफी कमी लाई जा सकती है। अधिकारियों ने कहा कि हर उच्च जोखिम गर्भावस्था एक चुनौती के साथ-साथ जीवन बचाने का अवसर भी है, इसलिए सरकार प्रयासरत है कि कोई भी गर्भवती महिला जांच और देखभाल से वंचित न रहे। कार्यशाला में जिले के सिविल सर्जन डॉ. पीके कनौजिया, जिला कार्यक्रम प्रबंधक सौरेंद्र दास, जिला सामुदायिक उत्प्रेरक संजय कुमार दिनकर, आलोक कुमार, यूनिसेफ के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. सिद्धार्थ शंकर रेड्डी समेत सभी प्रखंड स्वास्थ्य प्रबंधक, सामुदायिक उत्प्रेरक, अस्पताल प्रबंधक, स्टाफ नर्स, एएनएम और डाटा ऑपरेटर मौजूद रहे। कार्यशाला के दौरान जिलाधिकारी ने अंशुल कुमार ने कहा कि उच्च जोखिम गर्भावस्था की पहचान ही नहीं, प्रसव के दौरान किसी भी मां बच्चे की जान न जाए इसका भी ध्यान रखना होगा। इसके लिए उच्च जोखिम की पहचान के साथ फॉलोअप जरूरी है। उन्होंने प्रखंड स्वास्थ्य प्रबंधक, सामुदायिक उत्प्रेरक, अस्पताल प्रबंधक, स्टाफ नर्स, एएनएम और डाटा ऑपरेटर से कई सवाल जवाब किये। उन्होंने साफ कहा कि फॉलोअप के मामले में काफी पीछे हैं। हाई रिस्क पहचान के 25 इंडीकेटर्स के बारे में उन्होंने जानकारी ली। गर्भवती की हीमोग्लोबीन जांच के बारे में पूछा। उसके खान-पीन के बारे में जाना। बताया गया कि करीब 10 से 20 प्रतिशत महिला गरीबी के कारण गर्भावस्था के दौरान बेहतर भोजन नहीं कर पाती हैं। ऐसी महिलाओं को चिह्नित कर इसकी सूची आईसीडीएस को सौंपते हुए टीएचआर उपलब्ध कराने के साथ रेडक्रास से भी भोजन सामग्री देने का डीएम ने भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि संस्थागत प्रसव सौ प्रतिशत हो और बच्चा भी ढाई किलो वजन का होना चाहिए।

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