
जीत वाले मिठाई में डूबे, हार वाले मंथन में और जनता समीकरण में उलझी
-कोई कह रहा युवाओं ने पासा पलट दिया तो कोई दावा कर रहा है महिलाओं की खामोश लाइन ही सब बदल गई पूर्णिया, मनोज सिंह। नतीजों के बाद नेता और जनता के चेहरो
पूर्णिया, मनोज सिंह। नतीजों के बाद नेता और जनता के चेहरों में सबसे बड़ा अंतर यही है कि नेता परिणाम से जूझ रहे हैं और जनता परिणाम का आनंद ले रही है। जीतने वाले उम्मीदवार और उनके समर्थक मिठाई के डब्बों के साथ ऐसे घूम रहे हैं जैसे पूरे जनपद में मीठा फैलाकर भुखमरी मिटाने का अभियान चला रहे हों। किसी गली में मिठाई की महक है तो किसी घर में रणनीति की गरमागरम बहस। किसी चौराहे पर बधाइयों की गूंज है तो कहीं अगली बार तैयारी मजबूत करेंगे का दृढ़ संकल्प। चुनाव नतीजे आने के बाद जिले का माहौल ऐसा है जैसे पूरे शहर में एक ही साथ शादी भी चल रही हो और शोकसभा भी।
जो जीते हैं वे मिठाई का डब्बा ऐसे लेकर घूम रहे हैं जैसे हर गली उनकी निजी जागीर हो। वहीं बधाई देने वालों की लाइन ऐसे लगती है जैसे मुफ्त राशन बंट रहा हो। इधर, आम जनता अपनी चुनावी विशेषज्ञता का प्रदर्शन पूरे आत्मविश्वास के साथ कर रही है। मोहल्ले की चाय दुकानों में सुबह से लेकर देर शाम तक चर्चा का महामंच लगा है। लोग ऐसे-ऐसे विश्लेषण कर रहे हैं कि टीवी चैनलों के पैनल भी शरमा जाएं। कोई कह रहा है कि इस बार तो युवाओं ने पासा पलट दिया तो कोई दावा कर रहा है कि महिलाओं की खामोश लाइन ही सब बदल गई। तीसरी श्रेणी के विशेषज्ञ वे हैं जो हर चुनाव के बाद कहते हैं कि हम तो शुरू से कह रहे थे ये परिणाम आने वाले हैं। इन्हें नतीजों के बाद अचानक भविष्यवक्ता जैसी प्रतिष्ठा मिल जाती है। -बूथवार डेटा का रिसर्च जारी: -इन सबके समानांतर एक और दृश्य है-पराजित उम्मीदवारों का। उनके घरों और कैंप कार्यालयों में चुप्पी ऐसी है जैसे किसी ने रिमोट से आवाज बंद कर दी हो। वे अपने-अपने पन्नों पर हार का विश्लेषण कर रहे हैं। कोई वोटों की गणित में सिर खपा रहा है, तो कोई बूथवार डेटा में षड्यंत्र की रेखाएं खोज रहा है। कुछ के चेहरे पर इतना भावुक मौन है कि लगता है जैसे इतिहास उन्हें गलत समझ बैठा हो। उनके समर्थक भी आधी मुस्कान और आधी उदासी के बीच उलझे हैं, क्योंकि कल तक जो लोग हमारी जीत पक्की है कह रहे थे। आज वही लोग चाय का कप थामे गंभीर मुद्रा में पूछ रहे हैं कि चूक कहां हुई? कुल मिलाकर पूर्णिया में चुनाव खत्म हो गया है लेकिन चर्चा का मौसम अभी पूरी तरह खिला हुआ है। जहां विजेताओं की मिठाई खत्म होने का नाम नहीं ले रही और पराजितों का मंथन भी किसी निष्कर्ष पर पहुचने से इनकार कर रहा है। जनता गर्व से कह रही है कि हम तो कब से बता रहे थे, बस कोई सुनता नहीं!

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