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बिहार आता हूं तो लगता है अपने घर आया हूं : कोविंद

हिन्दुस्तान टीम,पटनाNewswrap
Fri, 22 Oct 2021 03:01 AM
बिहार आता हूं तो लगता है अपने घर आया हूं : कोविंद

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बिहार विधानसभा भवन के शताब्दी समारोह के मौके पर बिहार से आत्मीय जुड़ाव को अभिव्यक्त किया। कहा कि बिहार की रत्नगर्भा धरती और यहां के स्नेही लोगों ने मुझे हमेशा बहुत आकर्षित किया है, इसलिए जब भी मैं बिहार आता हूं तो मुझे एक सुखद अनुभूति होती है। जब मुख्यमंत्री जी मुझे बिहारी राष्ट्रपति के रूप में संबोधित कर रहे थे तो मैं अंदर से गदगद महसूस कर रहा था, क्योंकि यह देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू की धरती है। यहीं के राज्यपाल रहे डॉ. जाकिर हुसैन साहब पहले उप राष्ट्रपति और फिर राष्ट्रपति बने। इन लोगों ने जो विरासत छोड़ी है, उस विरासत को आगे बढ़ाने का दायित्व मुझे मिला है। सचमुच जब मैं बिहार आता हूं तो मुझे लगता है कि मैं अपने घर आया हूं।

राष्ट्रपति ने कहा कि मेरे सचिवालय में ही सवाल होता है कि आप बिहार का कोई निमंत्रण टाल क्यों नहीं पाते? दरअसल बिहार से मेरा नाता सिर्फ राज्यपाल का नहीं है, बल्कि कुछ और भी है। मैं इस नाते को ढूंढ़ता रहता हूं। यहां भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। बिहार में राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान मुझे समाज के सभी वर्गों और क्षेत्रों के लोगों का भरपूर स्नेह मिला। राष्ट्रपति के रूप में जब भी मेरा बिहार आना हुआ है, मेरे प्रति वैसे ही प्रेम और सम्मान का एहसास मुझे होता रहा है। इसके लिए मैं बिहार के सभी निवासियों, जन-सेवकों, अधिकारियों और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति आभार व्यक्त करता हूं।

इस धरती का मुझपर रहा है विशेष आशीर्वाद

श्री कोविंद ने कहा कि भगवान बुद्ध, भगवान महावीर और गुरु गोविंद सिंह की आध्यात्मिक धाराओं से सिंचित बिहार की धरती का मुझ पर विशेष आशीर्वाद रहा है। यहां राज्यपाल के रूप में जनसेवा का मुझे अवसर मिला और उसी कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति पद हेतु निर्वाचित होकर इस पद की संवैधानिक जिम्मेदारियों के निर्वहन का अवसर प्राप्त हुआ। यह प्रतिभावान लोगों की धरती रही है। पूरे देश को गौरवपूर्ण बनाने वाली एक महान परंपरा की स्थापना इसी धरती पर नालंदा, बिक्रमशिला व उद्वंतपुरी जैसे विश्वस्तरीय शिक्षा केंद्रों, आर्यभट्ट जैसे वैज्ञानिक, ‘चाणक्य यानी कौटिल्य जैसे नीति-निर्माता तथा अन्य महान विभूतियों द्वारा की गई थी। यहां के सभी जनसेवक उस समृद्ध विरासत के उत्तराधिकारी हैं और अब उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी बिहार के सभी निवासियों की है।

बिहार ने की है समतामूलक परंपरा की स्थापना

राष्ट्रपति ने कहा कि बिहार की धरती ने हमेशा समतामूलक परंपरा कायम की है। आज से लगभग 2400 वर्ष पहले एक गरीब महिला ‘मुरा के पुत्र चंद्रगुप्त मौर्य को मगध का सम्राट बनाने से लेकर 1970 के दशक में ईमानदारी और उज्ज्वल चरित्र के प्रतीक जननायक कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाने तक, इस धरती ने समता मूलक परंपरा स्थापित की है। बिहार में सामाजिक और आर्थिक बदलाव के लिए प्रयास और योगदान हेतु राज्य के सभी पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री प्रशंसा के पात्र हैं। हमारे स्वाधीन गणतंत्र की स्थापना के लगभग 25 वर्ष बाद, जब भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों पर कुठाराघात हुआ, तब बिहार के ही लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने लोकतंत्र के हित में देशव्यापी संघर्ष को असाधारण नेतृत्व प्रदान किया था।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कीर्तिमान स्थापित किया है

श्री कोविंद ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कामकाज की सराहना की। उन्होंने कहा कि राज्यपाल के रूप में बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों के समवेत अधिवेशन को मुझे तीन बार संबोधित करने का सुयोग प्राप्त हुआ था। बिहार में सुशासन तथा ‘न्याय के साथ विकास की दिशा में, जन-कल्याण एवं समग्र विकास के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया गया है। यह तथ्य सराहनीय है कि विगत चार वर्षों में बिहार के स्टेट जीडीपी में प्रभावशाली वृद्धि हुई है। बिहार में जनसेवा की समतामूलक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नीतीश कुमार ने स्वाधीनता के बाद सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद के निर्वहन का कीर्तिमान स्थापित किया है। उनका सहयोग मुझे बिहार के राज्यपाल के रूप में भी मिला और भारत के राष्ट्रपति के रूप में भी मिलता रहा है।

तीन चरणों में मिले सच्चिदानंद सिन्हा के प्रयासों के परिणाम

राष्ट्रपति ने कहा कि बिहार की अस्मिता के लिए संघर्ष करने वाले डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के प्रयासों के परिणाम तीन चरणों में प्राप्त हुए थे। पहले चरण में बिहार व उड़ीसा को बंगाल से पृथक करने का निर्णय सन 1911 में हुआ। सन 1912 में ‘उड़ीसा व बिहार को लेफ्टिनेंट गवर्नर के राज्य का दर्जा दिया गया और राज्य का मुख्यालय पटना में बना। सन 1913 में विधान परिषद की पहली बैठक हुई। दूसरे चरण में 1919 का ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट अस्तित्व में आया जो 1921 में प्रभावी हुआ। उस एक्ट के तहत उड़ीसा व बिहार को ‘गवर्नर प्रॉविन्स यानी पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया तथा प्रांतीय विधायी परिषद में निर्वाचित सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। उसी वर्ष इस विधानसभा परिसर का निर्माण सम्पन्न हुआ। बिहार विधान परिषद की पहली बैठक 7 फरवरी 1921 को हुई। तीसरे चरण में 1935 का ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पारित हुआ। इस एक्ट के तहत, बिहार एक अलग राज्य के रूप में स्थापित हुआ। दो सदनों से युक्त विधायिका का गठन किया गया और अंतत: डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा का सपना पूरा हुआ। सन 1935 के एक्ट के तहत स्वाधीनता के पहले, दो बार चुनाव हुए। उन दोनों चुनावों के बाद श्री बाबू बिहार के प्रधानमंत्री बने। स्वाधीनता के पहले और बाद के दशकों के दौरान श्री बाबू और अनुग्रह बाबू ने बिहार की राजनीति को परिभाषित किया।

लोकतंत्र का नया अध्याय रचने में बिहार के विभूतियों की महती भूमिका

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की संविधान सभा द्वारा हमारे आधुनिक लोकतंत्र का नया अध्याय रचा जा रहा था तब एक बार फिर बिहार की विभूतियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संविधान सभा के वरिष्ठतम सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा प्रथम अध्यक्ष के रूप में मनोनीत हुए। 11 दिसम्बर 1946 के ऐतिहासिक दिन देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान-सभा के स्थायी अध्यक्ष चुने गए। इस पर अपनी विद्वत्तापूर्ण टिप्पणी करते हुए डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने संविधान सभा के अपने वक्तव्य में कहा कि यह मात्र संयोग नहीं है कि हमारे अंतरिम अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा और हमारे स्थायी अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद दोनों ही बिहार से आते हैं। वे दोनों ही बिहार की भावना मधुरता यानी मृदुता से ओतप्रोत हैं और यह मृदुता ही भारत की मूल भावना है। संविधान सभा में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा व डॉ. राजेंद्र प्रसाद के अलावा अनुग्रह नारायण सिन्हा, श्रीकृष्ण सिन्हा, दरभंगा के महाराजा कामेश्वर सिंह, जगत नारायण लाल, श्याम नंदन सहाय, सत्यनारायण सिन्हा, जयपाल सिंह, बाबू जगजीवन राम, राम नारायण सिंह और ब्रजेश्वर प्रसाद जैसी बिहार की अनेक विभूतियों ने अपना बहुमूल्य योगदान दिया।

ग्लोबल फेस्टविल बन गया है बिहार का छठ पर्व

राष्ट्रपति ने कहा कि कुछ ही दिनों बाद हम सभी देशवासी दीपावली और छठ का त्योहार मनाएंगे। छठ-पूजा अब एक ग्लोबल फेस्टिवल बन चुका है। नवादा से न्यू-जर्सी तक और बेगूसराय से बोस्टन तक छठी मैया की पूजा बड़े पैमाने पर की जाती है। यह इस बात का प्रमाण है कि बिहार की संस्कृति से जुड़े उद्यमी लोगों ने विश्व-स्तर पर अपना स्थान बनाया है। मुझे विश्वास है कि इसी प्रकार स्थानीय प्रगति के सभी आयामों पर भी बिहार के प्रतिभावान व परिश्रमी लोग सफलता के नए मानदंड स्थापित करेंगे।

बिहार के लोगों की मधुरता के हुए कायल

राष्ट्रपति ने बिहार के लोगों की मधुरता का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने इसके लिए डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा संविधान सभा में उद्धृत महाभारत के एक श्लोक को कोट किया-‘ मृदुना दारुणं हन्ति, मृदुना हन्ति अदारुणम्/नासाध्यम् मृदुना किंचित, तस्मात् तीक्ष्णतरम् मृदु। अर्थात मधुर स्वभाव से कठिन स्थितियों पर विजय पाई जा सकती है। मधुर स्वभाव से सामान्य स्थितियों को वश में किया जा सकता है। मधुर स्वभाव द्वारा कुछ भी असाध्य नहीं है, अत: मधुर स्वभाव ही सबसे प्रभावी अस्त्र है।

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