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उचित इलाज से नवजात नहीं होते एचआईवी के शिकार

प्रतीकात्मक तस्वीर

माता-पिता अगर दोनों एचआईवी पॉजीटिव हैं तो जरूरी नहीं कि उनके बच्चे भी एचआईवी संक्रमित हों। पैरेंट्स टू चाइल्ड ट्रांसमिशन प्रोग्राम के जरिए जो भी एचआईवी पॉजीटिव गर्भवती महिलाएं वर्ष 2008 से इलाज करा रही हैं, उनके बच्चे एचआईवी मुक्त पैदा हुए हैं।  

डॉक्टरों का भी मानना है कि अगर एचआईवी पॉजीटिव महिला गर्भवती है और उसका सही तरीके से इलाज कराया जाता है तो बच्चे का एचआईवी संक्रमण होने की संभावना बहुत कम रहती है। ऐसी महिलाओं पर गर्भधारण के समय से लेकर बच्चा पैदा होने तक विशेष नजर रखनी पड़ती है। पटना नेटवर्क फॉर पीपल लीविंग विथ एचआईवी/एड्स सोसाइटी का दावा है कि नेटवर्क सदस्यों के वर्ष 2009 के बाद जितने भी बच्चे पैदा हुए हैं उसमें सिर्फ दो फीसदी बच्चे ही एचआईवी पॉजीटिव पैदा हुए हैं। जो बच्चे पॉजीटिव हुए हैं, उनमें इस बात की संभावना थी कि गर्भ के दौरान और जन्म के बाद दोनों समय में उचित इलाज नहीं हुआ।

दरअसल, पीपीटीसी प्रोग्राम के तहत गर्भवती पॉजीटिव महिला को सभी तरह के चिकित्सीय जांच से गुजरना पड़ता है। हर माह उसका फॉलोअप किया जाता है। जन्म के बाद बच्चे को 45 दिन की दवा दी जाती है। पीपीटीसी प्रोग्राम आने से पहले मां का दूध भी बच्चे को नहीं पिलाया जाता था, लेकिन इस प्रोग्राम के आने के बाद जन्म से पांच महीने तक बच्चों को मां का दूध पिलाया जाता है। पांच महीने के बाद बच्चे को भोजन खाने की आदत डाली जाती है।

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  • Web Title:Victims of HIV Prevention Neonatal treatment does not occur