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अलर्ट हो जाइए, टेलीकाउंसिलिंग में मारने-मरने की बात कर रहे छात्र

छात्रों के बीच आपसी स्टेट्स हिंसक रूप ले रहा है। अपने स्टेट्स के लिए छात्र कुछ भी करने को तैयार हो जा रहे हैं। सीबीएसई की टेली काउंसिलिंग के दौरान ऐसे कई मामले सामने आए हैं। इनमें छात्र अपने टीचर, दोस्त यहां तक कि कई बार अभिभावक तक पर आरोप लगाते हैं। 
काउंसलर की मानें तो छात्र का स्टेट्स उनकी जिद है। यह जिद मोबाइल, पैसा, कुछ महंगे गजेट्स और ब्वायफ्रेंड-गर्ल फ्रेंड के रूप में होता है। सीबीएसई टेली काउंसिलिंग यूनिट की मानें तो एक साल के अंदर डेढ़ सौ के लगभग फोन कॉल्स आए हैं, जिसमें विद्यार्थी मारने और मरने तक की बातें शेयर कर चुके हैं।  इसमें 8वीं से लेकर 10वीं तक के छात्रों की संख्या अधिक है। काउंसलर की माने तो अधिकतर बच्चे पढ़ाई की कम बात करते हैं बल्कि अपनी जिद को पूरा करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं। इसके लिए वो सलाह लेना चाहते हैं। ऐसे बच्चों की सही से काउंसिलिंग की जा रही है।
अभिभावक खुद दे रहे बच्चों को छुपाने की ट्रेनिंग 
हर हमेशा अभिभावक का स्टेट्स बच्चों को गलत करने को प्रेरित करता है। स्कूल में मोबाइल, पैसे आदि लाने की पाबंदी लगी होती है। लेकिन अधिकतर अभिभावक बच्चों को मोबाइल देते हैं। ऐसे में बच्चे स्कूल में मोबाइल छुपाकर रखते हैं। आए दिन स्कूल के बाथरूम, कॉमन रूम में प्रिंसिपल और टीचर द्वारा मोबाइल पकड़ा जाता है। इसके लिए जब अभिभावकों को बुलाया जाता है तो अभिभावक प्रिंसिपल से मिलने तक नहीं आते हैं। 
अभिभावक और स्कूल में नहीं है कोऑर्डिनेशन 
बच्चों को लेकर स्कूल और अभिभावकों के बीच कोआर्डिनेशन का भी काफी अभाव है। शिक्षा के अधिकार के तहत बच्चों को डांटने तक का अधिकार अब स्कूल प्रशासन को नहीं है। ऐसे में बच्चे की शिकायत डायरी या पैरेंट्स टीचर मीट में कहने की कोशिश स्कूल करता है। लेकिन इस पर अधिकतर अभिभावक ध्यान नहीं देते हैं। 
 
बच्चे असंवेदनशील होते जा रहे हैं। स्कूलों में काउंसिलिंग भी सही से नहीं होती है। इससे उनके अंदर जो बातें होती हैं वो घर कर जाती है। किशोरावस्था से ही काउंसिलिंग होनी चाहिए, लेकिन अधिकतर स्कूलों में काउंसिलिंग नहीं होती है। इससे बच्चे टेली काउंसिलिंग में अपनी बातें रखते हैं। 
- कुमुद श्रीवास्तव, काउंसलर, सीबीएसई 
 

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  • Web Title:Student talking about killing and die in tele counselling programme