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सोनपुर मेला: शहरों पर छाया गंवई शिल्प का जादू, दिल्ली में भी डिमांड

सोनपुर मेला: शहरों पर छाया गंवई शिल्प का जादू, दिल्ली में भी डिमांड

रविवार को मेले में काफी भीड़ है और भीड़ में शहरी लोग ज्यादा हैं। सबकी निगाह हस्तशिल्प और ग्रामीण कलाकृतियों पर है। मेले के ग्रामश्री मंडप और आर्ट एंड क्राफ्ट ग्राम में आए शिल्पियों में समस्तीपुर के चांदपुर धमौन का बांस शिल्पी संजय राम अपने भाई रामचंद्र राम और भतीजे सचिन कुमार के साथ बांस कलाकृतियों का जलवा बिखेर रहा है। 

बांस की बनी दुर्गा  की कीमत 19 हजार तो विष्णु का दाम  03 हजार रखा है। गजेन्द्र मोक्ष भूमि पर  लगे इस मेले में रविवार को उसने गज-ग्राह की एक मूर्ति 03 हजार में बेची। कलाकृतियों के ज्यादा खरीदार शहरों के लोग हैं। वे अपने ड्राइंग रूम को सजाने के  लिए हनुमान , बाज पक्षी, विदेशी पक्षी, मोर, टाइटेनिक जहाज, बास्केट, ट्रे, फूलदान आदि खरीद रहे हैं। आकर्षक कलाकृतियों में मोर की कीमत 300 से 1000, पनिया जहाज 600 से 1200 और विदेशी पक्षी की कीमत 2500 है। 

कला की हो रही कद्र, कीमत भी मिल रही जीने लायक: संजय के भाई रामचंद्र कहते हैं, सरकारी सहायता से बांस कला को काफी प्रोत्साहन मिला है। एक दशक पहले तक कड़ी मेहनत के बावजूद साल में चार-पांच हजार की भी आय नहीं हो पाती थी लेकिन आज इस शिल्प की भारी मांग है। मेलों में  इसके कद्रदां ऐसे कि एक मूर्ति तीन से दस हजार में बिक जा रही है। बांस के सोफा सेट और अन्य सामान भी बना रहे हैं। घर-परिवार में पहले की तुलना में खुशहाली आयी है। महादलित शिल्पियों के जीवन में  बदलाव आया है। आर्डर मिलने पर दूसरे राज्यों में भी कलाकृतियों की सप्लाई करते हैं। 

दिल्ली के मेलों में भी  लगाते हैं स्टॉल
सोनपुर के अलावा दिल्ली, राजगीर, गया आदि मेलों में एक दशक से स्टाल लगा रहे हैं। यहां मेले मेंउपेन्द्र महारथी शिल्प कला शोध संस्थान की ओर से  स्टाल नि:शुल्क उपलब्ध कराया गया है। सरकार इस शिल्प को बढ़ावा दे रही है। गांवों में अबतक तीन सौ से अधिक महादलित युवकों को ट्रेनिंग दी है।अधिकतर युवकों ने अपने स्वरोजगार खड़े कर लिए । सरकार ने चांदपुर धमौन में इस कला के विकास के लिए ट्रेनिंग केन्द्र खोलने जा रही है। जमीन भी चिह्नित कर ली गयी है। 

घर की बेकार चीजों को फेंकिए मत, बनाइए कलाकृतियां
आपके घर में बेकार चीजें हों तो उन्हे फेंकिए मत बल्कि उनसे दिलकश कलाकृतियां बनाइए। मेले में यह सीख पटना के अनिसाबाद से आए कलाकार सुधीर पांडेय दे रहे हैं।  उनका स्टाल मेले में पर्यटन विभाग के आर्ट एंड क्राफ्ट ग्राम में लगा है। स्टाल पर नारियल के रेशे , बेकार धागे , सुतरी आदि से बने घोड़े, पक्षियों के घोंसले, घड़ियाल , टोपी, फोल्डिंग झोपड़ी,कलश आदि दर्शकों को लुभा रहे हैं। कीमत भी साठ रुपए  से लेकर सवा सौ तक।शंख और सीप से बनी आइटमें भी हैं। वे बताते हैं, अपने घरी-मोहल्ले के युवकों को ये कला नि:शुल्क सीखाते हैं। सरकारी मदद मिलने के बाद अपनी इस कला का विस्तार किया। शिक्षा विभाग से अनुमति लेकर स्कूलों में भी वे अबतक 1500 बच्चों को यह कला सीखा चुके हैं। मेले में लगभग सौ ग्रामीण शिल्पियों के विभिन्न उत्पादों के स्टाल हैं।

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  • Web Title:Sonpur fair Magic of Shadow Rustic Crafts on Cities Demand in Delhi