DA Image
हिंदी न्यूज़   ›   बिहार  ›  पटना  ›  मधुबनी पेंटिंग, कोहबर, अरिपन के बारे में अब दुनिया जानेगी
पटना

मधुबनी पेंटिंग, कोहबर, अरिपन के बारे में अब दुनिया जानेगी

हिन्दुस्तान टीम,पटनाPublished By: Newswrap
Fri, 29 Nov 2019 04:20 PM
मधुबनी पेंटिंग यानी मिथिला पेंटिंग की शुरुआत सातवीं-आठवीं सदी में हुई। तिब्बत के थंका आर्ट से प्रभावित चित्रकारी की यह लोककला विकसित हुई। फिर 13वीं सदी में पत्थरों पर मिथिला पेंटिंग होने लगी।...
1 / 3मधुबनी पेंटिंग यानी मिथिला पेंटिंग की शुरुआत सातवीं-आठवीं सदी में हुई। तिब्बत के थंका आर्ट से प्रभावित चित्रकारी की यह लोककला विकसित हुई। फिर 13वीं सदी में पत्थरों पर मिथिला पेंटिंग होने लगी।...
मधुबनी पेंटिंग यानी मिथिला पेंटिंग की शुरुआत सातवीं-आठवीं सदी में हुई। तिब्बत के थंका आर्ट से प्रभावित चित्रकारी की यह लोककला विकसित हुई। फिर 13वीं सदी में पत्थरों पर मिथिला पेंटिंग होने लगी।...
2 / 3मधुबनी पेंटिंग यानी मिथिला पेंटिंग की शुरुआत सातवीं-आठवीं सदी में हुई। तिब्बत के थंका आर्ट से प्रभावित चित्रकारी की यह लोककला विकसित हुई। फिर 13वीं सदी में पत्थरों पर मिथिला पेंटिंग होने लगी।...
मधुबनी पेंटिंग यानी मिथिला पेंटिंग की शुरुआत सातवीं-आठवीं सदी में हुई। तिब्बत के थंका आर्ट से प्रभावित चित्रकारी की यह लोककला विकसित हुई। फिर 13वीं सदी में पत्थरों पर मिथिला पेंटिंग होने लगी।...
3 / 3मधुबनी पेंटिंग यानी मिथिला पेंटिंग की शुरुआत सातवीं-आठवीं सदी में हुई। तिब्बत के थंका आर्ट से प्रभावित चित्रकारी की यह लोककला विकसित हुई। फिर 13वीं सदी में पत्थरों पर मिथिला पेंटिंग होने लगी।...

मधुबनी पेंटिंग यानी मिथिला पेंटिंग की शुरुआत सातवीं-आठवीं सदी में हुई। तिब्बत के थंका आर्ट से प्रभावित चित्रकारी की यह लोककला विकसित हुई। फिर 13वीं सदी में पत्थरों पर मिथिला पेंटिंग होने लगी। धीरे-धीरे आमजनों में मधुबनी पेंटिंग लोकप्रिय होने लगी। मिथिलांचल की यह लोककला आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। देश और दुनियाभर में इसके कद्रदान हैं पर मधुबनी पेंटिंग के बारे में कई ऐसे ऐतिहासिक तथ्य हैं, जिससे लोग अनजान हैं। दुनियाभर को मधुबनी पेंटिंग की खासियतों से रूबरू कराने के लिए मैथिलीभाषियों की राज्य में एकमात्र प्रतिनिधि संस्था चेतना समिति पटना ने कॉफी टेबल बुक तैयार किया है। जल्द ही इसका लोकार्पण करने की तैयारी है।

70 पेज के कॉफी टेबल बुक में मधुबनी पेंटिंग्स की सारी जानकारी

चेतना समिति के अध्यक्ष विवेकानंद झा ने बताया कि मधुबनी पेंटिंग की लोकप्रियता को देखते हुए समिति ने इस कॉफी टेबल बुक को तैयार करवाया है। इसे तैयार करने का जिम्मा भाषाविद् डा.भैरवलाल दास को दिया गया था। उन्होंने अथक मेहनत से मधुबनी पेंटिंग के नायाब पेंटिंग्स के साथ इससे संबंधित ऐतिहासिक तथ्यों को जुटाया है। कॉफी टेबल बुक में कुल 70 पेज हैं। इसमें चेतना समिति के पटना स्थित मुख्यालय विद्यापति भवन की दीवारों पर उकेरी गयी मधुबनी पेंटिंग्स की विस्तार से जानकारी दी गयी है। देश और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मधुबनी पेंटिंग की मांग को देखते हुए इसकी कीमत 11 सौ रुपए रखी गयी है पर समिति के सदस्यों और मैथिलीभाषियों को इसमें पचास फीसदी की छूट मिलेगी।

कोहबर में राम-सीता, शिव-पार्वती की कहानी उकेरी जाती है

कॉफी टेबल बुक को तैयार करने वाले भाषाविद् डॉ. भैरव लाल दास ने बताया कि इसमें मिथिलांचल की चर्चित मधुबनी पेंटिंग्स के प्रमुख विषय अरिपन और कोहबर के बारे में शोध के आधार पर ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी दी गयी है। कोहबर में आमतौर पर राम-सीता और शिव-पार्वती के चित्रों को उकेरा जाता है। कोहबर के तांत्रिक स्वरूप के साथ लौकिक स्वरूप के बारे में भी लोगों को बताया गया है। मिथिलांचल में हर शुभ कार्य पर बनाए जाने वाले अरिपन के बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी है। वहीं विद्यापति भवन की दीवारों पर मधुबनी पेंटिंग्स उकेरने वाले कलाकारों के बारे में भी जानकारी दी गयी है। लगभग तीस कलाकारों ने इन पेंटिंग्स को बनाया था।

संबंधित खबरें