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जीरादेई की पहचान प्रथम राष्ट्रपति से ही नहीं भगवान बुद्ध से भी है जानें, कैसे

सीवान का जीरादेई। प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के जन्मस्थल से विख्यात। हालांकि यह स्थल भगवान बुद्ध से भी जुड़ा है। तीन हजार साल से भी अधिक समय का इसका इतिहास रहा है। जीरादेई के मुईयांगढ़, तितरा और भरथईगढ़ में जो पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं उससे पता चलता है कि यह इलाका कभी बौद्ध विहारों के लिए जाना जाता होगा। यहां के टीले देखने में स्तूप जैसे लगते हैं। टीलों की जो थोड़ी बहुत खुदाई हुई है उसमें कई मृदभांड, मृणमूर्तियां मिली हैं। 
गुरुवार को जीरादई के मुईयांगढ़ से सटे पूरब खुदाई के दौरान बुद्ध की प्राचीन प्रतिमा मिली है। ग्रामीण रमेश सिंह ने बताया कि मुईयांगढ़ से सटे पूरब खेत है। इसमें मिट्टी काटने से यह गढ़ के रूप में तब्दील हो गया है। वहीं से भगवान बुद्ध की पत्थर की छोटी खंडित प्रतिमा मिली है। ग्रामीण अभय सिंह ने बताया कि बुजुर्ग बताते हैं कि भगवान बुद्ध का संबंध इस गढ़ से है। इस स्थान पर उनकी तबीयत खराब हो गई थी। बताया कि पिछले साल यहां खुदाई में बहुत बड़ी चक्की व कुएं की खुदाई में नाव का टुकड़ा मिला था।

ग्रामीण गुड्डू सिंह ने बताया कि गढ़ के उत्तर तरफ इंडियन ऑयल का पाइप बिछाने के लिये खुदाई के क्रम में एनबीपीडब्लू एवं टेराकोटा के खिलौने व गोली मिल रहे हैं। गढ़ के अंदर काले पत्थर की एक प्रतिमा है। ग्रामीण आस कामनी माई के नाम से इनकी पूजा करते हैं। यहां एक प्राचीन मीठा कुआं भी है। इलाके के कलिंदर सिंह, शिव शंकर सिंह, सत्य प्रकाश श्रीवास्तव, साधु बाबा , सुबोध सिंह, कमल सिंह, अंकित मिश्र आदि ने बताया कि टीले की ठीक से खुदाई हो तो कई नई चीजें सामने आएंगी।
चप्पे-चप्पे में है ऐतिहासिकता : यह जगह ऐतिहासिक रहा है। इसके जर्रे-जर्रे में ऐतिहासिकता भरी हुई है। खासकर यह पूरा इलाका भगवान बुद्ध से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि जीरादेई में ही भगवान बुद्ध को निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। आधुनिक काल में पुरातत्वविद डब्ल्यू होल 1899 में जीरादेई के पतौर पहुंचा था। पतौर में वह तीन साल रहा था। उसने सबसे पहले बताया कि यह क्षेत्र भगवान बुद्ध से जुड़ा है। उसने बताया कि लौरिया के अंगार स्तूप से 12 योजन की दूरी पर कुशीनारा है। कुशीनारा से 12 योजन की दूरी पर जीरादेई का इलाका है। इस आधार पर उसने इस जगह को भगवान बुद्ध की ऐतिहासिकता से जोड़ा।  
सीवान का नाम था शवयान : सीवान को प्राचीन काल में शवयान भी कहा जाता था। शवयान संस्कृत का शब्द है। माना जाता है कि भगवान बुद्ध का शवयान यहीं से निकला था। बता दें कि सीवान स्टेशन का नाम 1974 तक सवान ही था। सारण गजेटियर में भी इसे सवान नाम से ही अधिसूचित किया गया है। यहां तक कि 1974 के पहले के जितने भी स्टाम्प हैं उस पर सवान ही लिखा हुआ है। 
तीन टीले हैं जीरादेई में : जीरादेई में तीन टीले हैं जिनका संबंध स्तूप से जोड़ा जाता है। पहला टीला या डीह तितरा है जो 20 फीट ऊंचा है। वहीं मुईयांगढ़ टीला 35 फीट ऊंचा है। यह 15 बीघे में है। हालांकि पूरा इलाका 52 बीघे में है। तीसरा टीला भरथुईगढ़ में है। यहां अभी घनी आबादी है। यानी टीले के ऊपर लोग बस गये हैं। गजट में इसे कुहरगढ़ में उल्लेखित किया गया है। पुरातत्वविदों के अनुसार, जीरादेई के पश्चिमी छोर की ओर तीन से चार किमी के इलाके में पुरातात्विक अवशेष बिखरे पड़े हैं। यदि इन टीलों की ठीक से खुदाई हो तो इस प्राचीन जगह की ऐतिहासिकता सामने आएगी। पुरातत्विवद डा नीरज पांडेय ने बताया कि इस इलाके में जो एनबीपीडब्ल्यू फेज के मृदभांड व अन्य चीजें मिली हैं वो आरंभिक काल के हैं। यानी कम से कम तीन हजार साल पुराने हैं। गुरुवार को जो बुद्ध की मूर्ति मिली है वो बलुआ पत्थर की बनी है। वहीं एनबीपीडब्ल्यू फेज के जो मृदभांड मिले हैं वे इतने परिष्कृत हैं कि ये प्लास्टिक से भी हल्के हैं।
जगदीश्वर पांडेय की पुस्तक में है उल्लेख : केपी जायसवाल शोध संस्थान के पूर्व निदेशक जगदीश्वर पांडेय ने अपनी पुस्तक बुद्ध का यात्री पथ में जीरादेई के इस इलाके का जिक्र किया है। उन्होंने बताया है कि सोना नदी (पूर्व में हिरण्यवती नदी, हिरण्य को सोना ही कहा जाता है) के पश्चिमी तट पर भगवान बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। इस पर उन्होंने साक्ष्य भी प्रस्तुत किए हैं। वहीं पुरातात्विक स्थलों पर शोध कर रहे शोधार्थी कृष्ण कुमार सिंह ने अपनी पुस्तक प्राचीन कुशीनारा का अध्ययन में तितिरा स्तूप और अन्य डीहों की ऐतिहासिकता के बारे में लिखा है। कृष्ण कुमार सिंह ने बताया कि जीरादेई का पश्चिमी क्षेत्र पुरातात्विक साक्ष्यों से भरा पड़ा है। आवश्यकता है केवल उत्खनन कर सामने लाने की। बताया कि पिछले माह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसी स्थान से मात्र तीन किलोमीटर उत्तर परीक्षण उत्खनन में महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त किया। यहां प्राप्त हो रहे मृदभांड की प्राचीनता के बारे में डॉ. जगदीश्वर पांडेय ने बताया कि इसे एनबीपी कहते हैं जो काले रंग का पतला व हल्का होता है। उसका काल 600 से 200 ईपू तक माना जाता है। बौद्धकाल में भी इसका बहुत प्रचलन था तथा समाज के धनी व संभ्रांत व्यक्ति इस मृदभांड में भोजन करते थे।
छात्र अवशेषों को बटोर कर रहे अध्ययन : मुइयां गांव के चंवर में इंडियन ऑयल के पाइप बिछाने के लिये खुदाई के क्रम में जो पुरातात्विक साक्ष्य मिल रहे हैं इसे देखने के लिये लोगों में उत्सुकता बढ़ रही है। कुछ विद्यार्थी इसे चुन कर अध्ययन करने के लिये रख रहे हैं। यह स्थान मुइयां गढ़ से उत्तर मात्र 100 मीटर की दूरी पर है। लगभग पांच सौ मीटर की रेंज में खुदाई से मृदभांड मिल रहा है। हालांकि खुदाई पाइप बिछाने के लिए मात्र 6 फीट गहरी व 3 फीट चौड़ी हो रही है। 
लाल व भूरा मृदभांड भी दिखा : पुरातत्वविदों ने बताया कि यहां लाल व भूरा मृदभांड भी दिखाई दे रहा है तथा बालू भी इस स्थान से मिल रहा है। रेत का मिलना प्राचीन समय में किसी नदी के होने का संकेत है। पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि प्राचीन समय में यह क्षेत्र विकसित शहर था। ग्रामीण कमल सिंह, अंकित मिश्रा के अनुसार पूर्व में भी इसके आसपास पुरातात्विक महत्व के अनेकों साक्ष्य मिल चुके हैं।

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  • Web Title:Lord Buddha gots Nirvana in Ziradei of Siwan district