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काव्य में छंद का सर्वाधिक महत्व

काव्य में छंद का सर्वाधिक महत्व

संक्षेप:

रविवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का माहौल कुछ बदला बदला था। हाथ में चॉक और डस्टर लेकर श्यामपट्ट पर छंदों की महत्ता और उनके प्रयोग के नियमों की...

Nov 21, 2021 07:50 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, पटना
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बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का माहौल रविवार को कुछ बदला बदला था। हाथ में चॉक और डस्टर लेकर श्यामपट्ट पर छंदों की महत्ता और उनके प्रयोग के नियमों की पढ़ाई हो रही थी। छंद-शास्त्र के विद्वान आचार्य पं. मार्कण्डेय शारदेय के साथ सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने भी बारीकियां बताईं। पं. शारदेय ने वार्णिक छंद और अलंकार, डॉ. सुलभ ने मात्रिक छंद और उच्चारण-बोध तथा डॉ. मेहता नागेंद्र ने हाइकु का प्रशिक्षण दिया। एक दिवसीय कार्यशाला के मौके पर काव्य जगत के नवांकुर और कई वरिष्ठ कवि भी रचनाओं के छंदोबद्ध न होने की वजह से इनमें आने वाले दोषों के निवारण पर मंथन कर रहे थे। कार्यशाला में मात्राओं की गणना, छंद-विधान, अलंकार और प्रतीकों के ज्ञान के साथ गीत-गजल, दोहे, मुक्तक, कुंडलियां आदि के रचना-विधान से कवियों को अवगत कराया गया। काव्य कार्यशाला का शुभारंभ करते हुए डॉ. अनिल सुलभ ने कहा कि काव्य में छंद का महत्व सर्वाधिक है। यदि हम काव्य-साहित्य को बचाना चाहते हैं तो हमें छंद से जुड़ना होगा। छंद पद्य रचनाओं की आत्मा है। छंदोबद्ध रचनाएं साहित्य को लंबी आयु और स्थायित्व प्रदान करती हैं। संपूर्ण संस्कृत साहित्य छंदोबद्ध पद्य हैं। यदि वेद-वेदांग छंद में न होते तो आज हमारे समक्ष जीवित न होते।

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इस अवसर पर सम्मेलन के उपाध्यक्ष डॉ. शंकर प्रसाद, प्रो. बासुकी नाथ झा, डॉ. मीना कुमारी परिहार, डॉ. अर्चना त्रिपाठी, डॉ. पंकज वासिनी, डॉ. करुणा पीटर कमल, अभिलाषा कुमारी, कुमार अनुपम, जय प्रकाश पुजारी, सुनील कुमार दूबे, पूजा ऋतुराज, अरुण कुमार श्रीवास्तव, डॉ. कुंदन कुमार, अशोक कुमार, डॉ. नागेश्वर प्रसाद यादव, राज किशोर झा वत्स, डॉ. संजू कुमारी, माधुरी भट्ट, डॉ. पंकज कुमार सिंह, डॉ. कैलाश ठाकुर, अर्जुन प्रसाद सिंह, सुरेंद्र चौधरी, चंद्रशेखर आजाद, रीना कुमारी आदि ने प्रशिक्षण में भाग लिया।

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