बिहार में पर्व-त्योहार की तिथियों की दुविधा होगी दूर
बिहार में पर्व-त्योहार की तिथियों के निर्धारण की समस्या का समाधान होगा। बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद इस महीने के अंत में विद्वत परिषद की बैठक आयोजित करेगा, जिसमें ज्योतिषी और विद्वान शामिल होंगे। मुख्य पर्वों की तिथियों को एकरूपता देने पर चर्चा की जाएगी ताकि श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना न करना पड़े।

बिहार में पर्व-त्योहार की तिथियों के निर्धारण की दुविधा दूर होगी। एक ही पर्व दो तिथियों में मनाए जाने के कारण लोगों को परेशानी होती है। पर्व के लिए तिथियों में एकरूपता लाने और तिथियों को तार्किक रूप से तय करने के लिए बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद इसी महीने के अंत तक विद्वत परिषद की बैठक पटना में आयोजित करने जा रहा है। न्यास पर्षद के अध्यक्ष व पूर्व विधान पार्षद प्रो. रणबीर नंदन ने बताया कि विद्वत परिषद में विद्वान ज्योतिषियों, खगोलविद् के अलावा विश्वविद्यालय, काशी, ऋषिकेश आदि पंचांगों के विद्वान और शास्त्रों के जानकार भी शामिल होंगे। मिथिला और काशी पंचांग में पर्व निर्धारण पर विद्वान विशेष रूप से चर्चा करेंगे।
न्यास पर्षद के अध्यक्ष ने बताया कि होली, जीतिया, तीज, धनतेरस, दीपावली, छठ, रामनवमी, दशहरा आदि मुख्य पर्व दो दिन होने की स्थिति में श्रद्धालुओं और पर्वेतिन (उपवास करने वाली) के बीच उहापोह की स्थिति बन जाती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की तरफ से ऐसे विषय पर विद्वत परिषद की बैठक बुलाने की मांग की जा रही है। उदया तिथि के कारण अंतर : ज्योतिषाचार्य राजनाथ झा बताते हैं कि पर्व-त्योहार की दो तिथियां होने का बड़ा कारण सूर्योदय को लेकर तिथियों की गणना है। जब कोई पर्व दो सूर्योदय के बीच होता है तो तिथियों के बदलने सहित कई ज्योतिषिय पहलूओं को ध्यान में रखकर निर्णय देना होता है। ऐसे निर्णय पुराण और शास्त्रों में वर्णित है। कई बार पूर्णिमा, करवा चौथ दीपावली आदि लोग उदयातिथि को देखकर तय करेंगे तो इसमें गलती की संभावनाएं हो सकती हैं। ऐसे त्योहार का निर्धारण चंद्र गति के आधार पर करना होता है। इसी तरह अन्य पर्व-त्योहारों के लिए भी तय विशेष नियम के आधार पर तिथियों को तय करना उपयुक्त होगा।
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