
पप्पू, प्रभुनाथ, सूरजभान, मुन्ना, रीतलाल; बिहार में ज्यादातर बाहुबली पहली बार निर्दलीय ही सदन पहुंचे
अपनी ताकत पर भरोसा रखने के कारण ही बिहार के बाहुबलियों ने अपना राजनीतिक सफर अकेले ही शुरू किया। बगैर किसी दल की सहायता से उतरे इन बाहुबलियों ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की और राजनीति में अपनी पहचान बनाई।
Bihar Election 2025: एक समय था जब बिहार के बाहुबली दूसरों के राजनीतिक फायदे के लिए बंदूकें उठाते थे। उनकी ताकत के बूते ही कई राजनेता सदन तक पहुंचे। मगर धीरे-धीरे बाहुबलियों को सियासत ने अपनी ओर आकर्षित किया। राजनेताओं की ताकत और रसूख देख उनके अंदर राजनीति का आकर्षण पैदा हुआ। दूसरे की जीत के लिए दमखम लगाने की जगह खुद ही सियासत की पिच पर बैंटिंग करना मुफीद समझा। यह अहसास पैदा हुआ कि जब वे दूसरों को जीतवाकर सदन भेज सकते हैं तो फिर खुद ही क्यों नहीं सदन पहुंचें। इसी सोच के साथ बाहुबलियों के कदम राजनीति की ओर बढ़ने लगे।

अपनी ताकत पर भरोसा रखने के कारण ही बिहार के बाहुबलियों ने अपना राजनीतिक सफर अकेले ही शुरू किया। बगैर किसी दल की सहायता से उतरे इन बाहुबलियों ने जीत दर्ज की और राजनीति में अपनी पहचान बनाई। इनमें वीर महोबिया, मुन्ना शुक्ला समेत कई बाहुबली शामिल हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में बाहुबलियों का दौर 1970 के दशक में शुरू हुआ। 1970 से 1990 के दशक दो दर्जन से अधिक बाहुबली चुनाव जीतकर सदन पहुंचे। इनमें कुछ तो दलों के टिकट पर चुनाव जीते, लेकिन ज्यादातर बड़े बाहुबलियों ने अपना संसदीय जीवन निर्दलीय ही शुरू किया। वीर महोबिया, वीर बहादुर सिंह, प्रभुनाथ सिंह, सूरजभान सिंह, पप्पू यादव, राजन तिवारी, मुन्ना शुक्ला आदि ने पहली बार विधानसभा का चुनाव निर्दलीय ही जीता। इसी तरह बड़े बाहुबली काली पांडेय ने लोकसभा चुनाव में पहली बार जीतकर तो रीतलाल यादव ने विधान परिषद का चुनाव निर्दलीय जीतकर राजनीति में अपनी यात्रा शुरू की।
इस क्रम में राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव का नाम भी शामिल है। 1990 के दशक में बिहार के बाहुबलियों में उनका नाम सबसे तेजी से उभरा। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही कोसी और सीमांचल में अपनी समानांतर सत्ता स्थापित कर ली। उनके आतंक से पूरा इलाका आतंकित था। इसी बीच उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया और 1990 में महज 23 वर्ष की उम्र में मधेपुरा के सिंहेश्वर से निर्दलीय चुनाव जीत गए।
वर्ष 2000 में कई बाहुबलियों ने निर्दलीय विधानसभा का चुनाव जीतकर सदन तक पहुंचने में सफलता हासिल की। इनमें पहला नाम सूरजभान सिंह का है। वे उस समय बिहार के सबसे तेजी से उभरते बाहुबली थे। उन्होंने मोकामा से उस समय राबड़ी सरकार के मंत्री रहे दिलीप सिंह के खिलाफ निर्दलीय ही मैदान में उतरने का फैसला किया। दिलीप सिंह बाहुबली अनंत सिंह के बड़े भाई थे और श्याम सुंदर सिंह धीरज को 1990 में हराकर चुनाव जीते थे। वे खुद बाहुबली थे और इसके पहले धीरज के लिए ही चुनाव में काम करते थे। उनकी सहायता से ही धीरज चुनाव जीतते थे। इनका पूरे इलाके पर दबदबा था। मगर सूरजभान ने उन्हें बगैर किसी राजनीतिक दल की सहायता से बुरी तरह पराजित किया।
मुन्ना शुक्ला
वैशाली-मुजफ्फरपुर के बड़े बाहुबली मुन्ना शुक्ला ने भी अपना राजनीतिक सफर निर्दलीय ही शुरू किया। उनके बड़े भाई छोटन शुक्ला अपने समय के बड़े बाहुबली थे। तब के बाहुबली अशोक सम्राट के बेहद करीबी मित्र थे। उनकी हत्या के बाद मुन्ना शुक्ला ने उनकी विरासत संभाली। उन्होंने वर्ष 2000 में हुए विधानसभा का चुनाव बगैर किसी दल के समर्थन के अपने बाहुबली मित्रों के सहयोग से जीता।
राजन तिवारी
राजन तिवारी का नाम भी बड़ी तेजी से उभर रहा था। उन्होंने भी गोविंदगंज से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीतकर विधानसभा पहुंचे। उन्होंने तब वहां के दिग्गज नेता एवं मौजूदा विधायक भूपेन्द्र नाथ दूबे को पराजित किया था। भूपेन्द्र नाथ दूबे के पहले उनके भाई देवेन्द्र नाथ दूबे वहां के विधायक थे।
वीर महोबिया
वीरेन्द्र सिंह उर्फ वीर महोबिया वैशाली के बड़े बाहुबली थे। महोबिया दसों अंगुलियों में अंगूठी पहनते थे और हाथी पालते थे। उन्होंने 1980 में जन्दाहा विधानसभा क्षेत्र से पहली बार निर्दलीय चुनाव जीता। उनके समर्थक वीर महोबिया कड़ाम-कड़ाम, वोट गिरेगा धड़ाम-झड़ाम के नारे के साथ क्षेत्र में भ्रमण करते थे। ऐसे तो उन्होंने 1977 विधानसभा का चुनाव भी लड़ा, लेकिन उसमें बुरी तरह हार गए और पांचवें स्थान पर रहे। बताया जाता है कि उसके बाद महोबिया ने अपने तेवर बेहद सख्त कर लिये। वे जहां भी जाते, लोगों से बड़ी विनम्रता से धमकी देते कि चुनाव में यदि उन्हें वोट नहीं मिला तो फिर बाद में समझिएगा। इसके बाद लोग दहशत में आ गए और उन्हें थोक के भाव वोट मिले।
वीर बहादुर सिंह
इसी तरह वीर बहादुर सिंह भी बक्सर के बड़े बाहुबली थे और दर्जनों नक्सलियों की हत्या के आरोपित थे। पिता की हत्या के बाद उन्होंने बंदूक उठा ली। फिर तो उनके नाम से विरोधी कांपने लगे। उन्होंने भी 1977 में चुनाव में भाग्य आजमाया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इस हार को उन्होंने चुनौती के रूप में ली और अपने इलाके के सामाजिक समीकरण पर काम किया। फिर उन्होंने राजपूत और कोईरी का गठबंधन बनाया। इसी बूते 1980 में निर्दलीय चुनाव जीतकर वे विधानसभा पहुंचे।
काली पांडेय और रीतलाल भी निर्दलीय ही जीते
काली पांडेय ने सांसद के रूप में तो रीतलाल यादव ने विधान पार्षद के रूप में निर्दलीय ही अपना राजनीतिक सफर प्रारंभ किया। काली पांडेय ने तो 1980 में कांग्रेस की लहर में भी गोपालगंज लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। उसी तरह रीतलाल यादव ने विधान परिषद का चुनाव 2015 में दानापुर से निर्दलीय जीता।
प्रभुनाथ सिंह
प्रभुनाथ सिंह 1980 के दशक में सारण में सबसे तेजी से उभरता राजनीतिक चेहरा बन गए थे। उन्होंने 1985 में मशरक से निर्दलीय ही चुनाव जीतकर सबको अपनी ताकत का अहसास करा दिया। वे 1990 में विधानसभा और फिर 1998 में लोकसभा का चुनाव जीत कर अपने राजनीतिक सफर को आगे बढ़ाया। हालांकि बाद में वे राजद और जदयू दोनों दलों में शामिल रहे।





