बिहार में 30 जिलों के बच्चों में ‘ब्लू बेबी सिंड्रोम’ का खतरा क्यों मंडरा रहा, लक्षण जान लीजिए
खासकर छह माह से कम उम्र के बच्चे इससे अधिक प्रभावित होते हैं। उनका होंठ, त्वचा और नाखून नीला पड़ने लगता है। नाइट्रेट से होने वाली बीमारी को मेथेमोग्लोबिनेमिया या ‘ब्लू बेबी सिंड्रोम’ कहते हैं।

मुजफ्फरपुर समेत बिहार के 30 जिलों में भूजल की गुणवत्ता को लेकर चिंताजनक संकेत सामने आए हैं। इन जिलों के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित सीमा से अधिक पाई गई है। इसके अलावा, मधुबनी और शिवहर सहित चार जिलों के भूजल में आर्सेनिक की मौजूदगी पाई गई है। यह केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की बीते माह आई रिपोर्ट में सामने आया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भूजल में नाइट्रेट की अधिकता से बच्चों में ‘ब्लू बेबी सिंड्रोम’ का खतरा है। वहीं, लंबे समय तक आर्सेनिक युक्त पानी पीने से आर्सेनिकोसिस हो सकता है। इससे फेंफड़े में दिक्कत आने लगती है। सांस लेने में तकलीफ होती है और दम घुटने लगता है।
इन जिलों में पानी में नाइट्रेट की अधिकता: रिपोर्ट के अनुसार, मुजफ्फरपुर, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, सारण, सीवान, पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, मधुबनी, दरभंगा, गया, भोजपुर, बक्सर, औरंगाबाद सहित 30 से अधिक जिलों में नाइट्रेट की मात्रा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर की सीमा से अधिक पाई गई है। कुल 584 नमूनों में से 78 नमूने (13.36 प्रतिशत) में नाइट्रेट की मात्रा सीमा से अधिक मिली है। इस संबंध में मोतीपुर डिवीजन के कार्यपालक अभियंता अमित स्टीफन ने बताया कि उन तक यह रिपोर्ट अभी नहीं पहुंची है। सुरक्षित पेयजल, नियमित निगरानी, वर्षा जल संचयन और भूजल संरक्षण के उपायों पर विभाग लगातार काम कर रहा है।
नाइट्रेट की अधिकता से नीली पड़ जाती बच्चों की त्वचा
एसकेएमसीएच के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जेपी मंडल ने बताया कि पीने के पानी में नाइट्रेट की अधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदेह है। खासकर छह माह से कम उम्र के बच्चे इससे अधिक प्रभावित होते हैं। उनका होंठ, त्वचा और नाखून नीला पड़ने लगता है। नाइट्रेट से होने वाली बीमारी को मेथेमोग्लोबिनेमिया या ‘ब्लू बेबी सिंड्रोम’ कहते हैं। इसमें शरीर में नाइट्रेट, नाइट्राइट में बदलकर खून की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता को घटा देता है। सांस लेने में परेशानी, कमजोरी और सुस्ती इसके प्रमुख लक्षण हैं।





