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सराय बेलदारी गांव में पांच साल से पानी को तरस रही 100 घर की आबादी

सराय बेलदारी गांव में पांच साल से पानी को तरस रही 100 घर की आबादी

संक्षेप:

​मेसकौर। रविन्द्र कुमार सिन्हानवादा जिले के मेसकौर प्रखंड अंतर्गत सहवाजपुर सराय पंचायत का सराय बेलदारी गांव आज आधुनिक विकास के दावों और धरातल की कड़वी हकीकत के बीच एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा है।

Jan 07, 2026 03:02 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नवादा
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मेसकौर। रविन्द्र कुमार सिन्हा नवादा जिले के मेसकौर प्रखंड अंतर्गत सहवाजपुर सराय पंचायत का सराय बेलदारी गांव आज आधुनिक विकास के दावों और धरातल की कड़वी हकीकत के बीच एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा है। मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी सात निश्चय योजना के तहत हर घर नल का जल का सपना इस गांव के लिए एक क्रूर मजाक साबित हो रहा है। यहां कागजों पर तो योजना पूर्ण है, लेकिन हकीकत यह है कि पिछले 05 वर्षों से ग्रामीण अपने घरों के नलों में जल नहीं, बल्कि योजना की विफलता का जवाब ढूंढ़ रहे हैं। सराय बेलदारी की यह तस्वीर जिले के अन्य कई गांवों की भी हो सकती है, लेकिन यहां की समस्या की निरंतरता यानी बीते 05 साल वाली परेशानी इसे समस्या की चरम पर पहुंचा रही है।

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निराशाजनक पहलु यह है कि इसके समाधान को लेकर सार्थक कुछ भी नहीं हो रहा। 2026 में होने वाले विकास कार्यों की सूची में क्या इस गांव का नाम शामिल होगा? क्या यहां की महिलाओं को सिर से गगरी उतारने का मौका मिलेगा? यह सवाल नवादा जिला प्रशासन और राज्य सरकार के सामने मुंह बाए खड़ा है। शायद तब ही गांव वालों के दिन बहुरें। हाथी के दांत साबित हुई योजना सराय बेलदारी गांव की करीब 100 घरों की बस्ती में 05 साल पहले जब पानी की बड़ी टंकी रखी गई और गलियों में पाइप बिछाए गए, तो ग्रामीणों को लगा था कि अब उनकी पीढ़ियों की प्यास बुझेगी। महिलाओं ने सोचा था कि अब उन्हें सिर पर गगरी रखकर कोसों दूर नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन आज स्थिति यह है कि आधी आबादी यानी 50 प्रतिशत घरों में नल तो लगे हैं, टंकियां भी सीना ताने खड़ी हैं, पर पाइपलाइन सूखी पड़ी है। योजना यहां हाथी के दांत बनकर रह गई हैं, जो दिखाने के लिए तो है, पर काम की बिल्कुल नहीं। प्यास, पसीना और अंतहीन इंतजार गांव की गलियों में सन्नाटा पसर जाता है जब दोपहर की चिलचिलाती धूप में महिलाएं और बच्चे दूर-दराज के खेतों में लगे चापाकलों की ओर दौड़ते हैं। 05 साल का लंबा वक्त बीत गया, मोटर लगी, बिजली का कनेक्शन हुआ, पर पानी की एक बूंद आज तक किसी ग्रामीण के घर तक नहीं पहुंची। हर चुनाव में यहां के ग्रामीण नेताओं की मीठी बातों पर भरोसा करते हैं, पर वोट पड़ते ही विकास की गंगा सराय बेलदारी की सीमा से पहले ही सूख जाती है। ग्रामीणों का आरोप है कि इस योजना में शुरू से ही भारी अनियमितता बरती गई है। घटिया पाइप का इस्तेमाल, बिना प्लानिंग के बिछाई गई लाइन और देखरेख का अभाव इस विफलता के मुख्य कारण हैं। यहां तक कि कई घरों में तो पाइप पहुंचे ही नहीं, और जहां पहुंचे वहां नल सिर्फ लोहे का एक निर्जीव ढांचा बनकर रह गए हैं। सिस्टम की लापरवाही और कागजी विकास नवादा और रजौली डिवीजन के कंधों पर पूरे मेसकौर प्रखंड में पानी पहुंचाने की जिम्मेदारी है। लेकिन सरकारी फाइलों में जो आंकड़े शत-प्रतिशत सफलता का दावा करते हैं, उनकी पोल सराय बेलदारी जैसे 20 से अधिक गांव और टोले खोल रहे हैं। प्रखंड के सहवाजपुर सराय, मिर्जापुर, तेतरिया और मेसकौर पंचायतों में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, पर जनता की प्यास नहीं बुझी। पहले यह जिम्मेदारी वार्ड क्रियान्वयन समिति की थी, फिर इसे पीएचईडी को सौंपा गया, लेकिन जिम्मेदारी के इस फुटबॉल मैच में जनता का हक कहीं खो गया। आज चापाकल खराब हैं, नलकूपों के चारों ओर झाड़ियां उग आई हैं और सिस्टम गहरी नींद में सोया है। ग्रामीण राजनीति और जनप्रतिनिधियों की बेरुखी गांव के प्रबुद्ध नागरिक और ग्रामीण राजनीति राजवंशी, रवींन्द्र रविदास, चुरामन प्रसाद, पवन कुमार, बाल्मीकि राजवंशी, मोसाफिर चौहान, रामदुलार चौहान, अरविंद कुमार, आनंद कुमार, रविन्द्र यादव समेत राजेश चौहान का कहना है कि वे अब थक चुके हैं। उनका कहना है कि चुनाव के समय विधायक और सांसद गांव की गलियों की धूल फांकते नजर आते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन जीतने के बाद सराय बेलदारी उनके नक्शे से गायब हो जाता है। न तो यहाँ पानी की व्यवस्था की गई और न ही नली-गली की स्थिति में कोई सुधार हुआ। महिलाओं और बच्चों पर दोहरी मार पानी की यह किल्लत केवल प्यास तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। स्कूल जाने से पहले बच्चों को पानी ढोना पड़ता है। महिलाओं का दिन पानी की चिंता में शुरू होता है और उसी में खत्म। गंदा पानी पीने की मजबूरी के कारण गांव में जलजनित बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। यह सिर्फ एक गांव की प्यास नहीं, बल्कि एक पूरी व्यवस्था की विफलता की कहानी है। स्वास्थ्य का बढ़ता खतरा शुद्ध पेयजल के अभाव में ग्रामीण असुरक्षित स्रोतों जैसे खुले कुओं या कम गहराई वाले चापाकलों पर निर्भर हैं। इससे जलजनित बीमारियों जैसे डायरिया, टाइफाइड और चर्म रोगों का खतरा बढ़ गया है। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं पर करोड़ों खर्च कर रही है, वहीं दूसरी तरफ मात्र शुद्ध पानी न मिलने से ग्रामीण आर्थिक रूप से इलाज के बोझ तले दब रहे हैं। सराय बेलदारी की स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर पांच वर्षों तक किसी भी स्तर पर सोशल ऑडिट क्यों नहीं हुआ? क्या फाइलों में पानी बह रहा है जबकि धरातल पर धूल उड़ रही है? यदि योजना पीएचईडी को सौंपी गई, तो हैंडओवर की प्रक्रिया में जमीनी हकीकत की जांच क्यों नहीं की गई? यह खंडित व्यवस्था सराय बेलदारी के सवा सौ परिवारों के लोकतांत्रिक विश्वास को चोट पहुंचाती है। अब समय आ गया है कि विकास को केवल बजट के चश्मे से न देखकर उपयोगिता की कसौटी पर कसा जाए। -------------------------- ग्रामीणों की जुबानी बदहाली की दास्तां- 1.05 साल पहले जब गांव में टंकी लगी थी, तो हमने उत्सव मनाया था। लगा था कि अब हमारी बहु-बेटियों को धूप में भटकना नहीं पड़ेगा। पर अफसोस, वो टंकी सिर्फ शो-पीस बनकर रह गई है। साढ़े चार सौ से ज्यादा दिन बीत गए, पर नल से हवा के अलावा कुछ नहीं निकलता। वोट मांगने सब आते हैं, पर पानी देने कोई नहीं आता। हम ठगे हुए महसूस कर रहे हैं। -साधु यादव, स्थानीय ग्रामीण, सराय-बेलदारी। 2.सराय बेलदारी गांव में सवा सौ घर हैं, पर विकास के नाम पर यहां शून्य है। न तो नली-गली बनी है और न ही नल-जल योजना का लाभ मिला। पाइप बिछाकर ठेकेदार गायब हो गए। हमने कई बार शिकायत की, लेकिन हमारी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गई। अगर 2026 तक स्थिति नहीं सुधरी, तो हम सब आंदोलन करने को बाध्य होंगे। -मुसाफिर चौहान, स्थानीय ग्रामीण, सराय-बेलदारी। 3.सरकार कहती है हर घर नल का जल, लेकिन हमारे यहां तो हर घर प्यास ही प्यास है। आधे घरों में तो नल का कनेक्शन तक नहीं हुआ। जहां हुआ, वहां पाइप लीकेज हैं। सिस्टम की लापरवाही ने इस महत्वाकांक्षी योजना को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया है। बुजुर्गों को इस उम्र में पानी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है, जो शर्मनाक है। -राजनीति राजवंशी, स्थानीय ग्रामीण, सराय-बेलदारी। 4.यह सिर्फ पानी की समस्या नहीं, हमारे भविष्य का सवाल है। प्रशासन पीएचईडी पर डालता है और पीएचईडी वार्ड पर। इस बीच सराय बेलदारी के लोग बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। हम मांग करते हैं कि इस योजना की उच्च स्तरीय जांच हो और दोषियों पर कार्रवाई की जाए। जब तक घर-घर पानी नहीं पहुंचता, हमारा संघर्ष जारी रहेगा। -रविन्द्र चौहान, स्थानीय ग्रामीण, सराय-बेलदारी। ------------------- वर्जन: मामला मेरे संज्ञान में आया है। सराय बेलदारी गांव में नल-जल योजना की विफलता और तकनीकी खामियों की जांच कराई जाएगी। पीएचईडी विभाग के साथ तालमेल बिठाकर मेंटेनेंस का काम जल्द शुरू होगा। जो भी एजेंसियां या कर्मचारी इसमें लापरवाह पाए जाएंगे, उन पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। हमारा लक्ष्य हर ग्रामीण तक शुद्ध जल पहुंचाना है। - अश्विनी कुमार, बीडीओ, मेसकौर। ------------------------------- प्यास की कीमत और टूटते सामाजिक सरोकार मेसकौर। सराय बेलदारी गांव में नल-जल योजना की विफलता केवल एक तकनीकी खामी या प्रशासनिक लापरवाही नहीं है, बल्कि यह एक गहरे सामाजिक और मानवीय संकट का प्रतिबिंब है। जब किसी बस्ती में पांच साल तक बुनियादी सुविधाओं का अभाव रहता है, तो उसका असर केवल भौतिक सुविधाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरे समाज की कार्यक्षमता और भविष्य को प्रभावित करता है। यह बातें आमलोगों ने कही। ग्रामीण भारत में पानी जुटाने की प्राथमिक जिम्मेदारी आज भी महिलाओं और किशोरियों के कंधों पर है। सराय बेलदारी की महिलाएं प्रतिदिन 03 से 04 घंटे केवल पानी के इंतजाम में बिताती हैं। यह वह समय है जिसे वे स्वरोजगार, बच्चों की परवरिश या अपनी शिक्षा में लगा सकती थीं। हर घर नल का जल योजना का मूल उद्देश्य महिलाओं को इस कठिन श्रम से मुक्ति दिलाना था, लेकिन यहां की महिलाएं आज भी सिर पर लोहे की गगरी और प्लास्टिक के डिब्बे लादकर गांव की मर्यादा और अपनी सेहत, दोनों को दांव पर लगा रही हैं। इस संकट का सबसे दुखद पहलू बच्चों पर पड़ने वाला प्रभाव है। गांव के कई बच्चे स्कूल जाने से पहले या स्कूल से आने के बाद खेल-कूद की उम्र में पानी ढोते नजर आते हैं। जब बचपन पानी की तलाश में गलियों में भटकता है, तो शिक्षा की नींव कमजोर पड़ जाती है। कई बार पानी लाने की थकान और समय की बर्बादी के कारण बच्चों की पढ़ाई के प्रति एकाग्रता कम हो जाती है, जो अंततः उनके भविष्य के विकास को बाधित करती है।