
नवादा की नदियों का मिटता वजूद, सूखने लगे पशुओं के हलक
नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता। नवादा जिले में जल संकट अब केवल इंसानों की खेती-बाड़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पशुपालन के बुनियादी ढांचे को हिलाकर रख दिया है।
नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता। नवादा जिले में जल संकट अब केवल इंसानों की खेती-बाड़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पशुपालन के बुनियादी ढांचे को हिलाकर रख दिया है। कभी छोटी-छोटी कलकल बहती नदियों और जलधाराओं के लिए मशहूर यह जिला आज अपनी पहचान खो रहा है। जिले की खुरी, सकरी, धनार्जय, तिलैया व ढाढर जैसी नदियों समेत इनकी उपनदियां पंचाने, नाटा आदि का जलस्तर न केवल नीचे गया है, बल्कि कई हिस्सों में ये नदियां पूरी तरह से मैदान में तब्दील हो गई हैं। इसका सीधा असर पशुपालकों पर पड़ा है, जिनके सामने अब अपने मवेशियों को जिंदा रखने की चुनौती खड़ी हो गई है।
नवादा की सूखती नदियां पर्यावरण की क्षति समेत ग्रामीण संस्कृति और जीविका के अंत का संकेत है। जिन नदियों में कभी पशु अठखेलियां करते थे, वहां आज धूल उड़ रही है। यदि सरकार और समाज ने मिलकर जल संचयन की दिशा में काम नहीं किया, तो आने वाले समय में दूध की नदियों वाले इस क्षेत्र में पशु केवल तस्वीरों में ही नजर आएंगे। कभी नदियों में सजती थी पशुओं की महफिल जिले के अनेक बुजुर्ग पशुपालक अर्जुन महतो, रामलाल यादव, सातो यादव, मनोज यादव आदि पुरानी यादों को साझा करते हुए भावुक हो जाते हैं। 65 वर्षीय दुलारचंद यादव बताते हैं, एक समय था जब दोपहर होते ही हम अपनी गायों और भैंसों को नदी किनारे ले जाते थे। वहां पशु घंटों पानी में रहते थे, अपनी प्यास बुझाते थे और उनकी देह की गर्मी शांत होती थी। पहले ये नदियां प्राकृतिक जल स्रोत के रूप में काम करती थीं। पशुओं को नहलाने के लिए पशुपालकों को घर से एक बाल्टी पानी भी खर्च नहीं करना पड़ता था। नदियों का बहाव साल के आठ-नौ महीने बना रहता था, जिससे मवेशियों को स्वच्छ और पर्याप्त पानी सुलभ था। आज स्थिति बिल्कुल उलट है। बालू के अवैध उठाव और जलवायु परिवर्तन की दोहरी मार ने इन नदियों को रेगिस्तान बना दिया है। नदियों के सूखने बन रहा अनेक परेशानियों का सबब नदियों का सूखना अनेक परेशानियों का सबब बन रहा है। नदियों के किनारे उगने वाली हरी घास अब गायब हो चुकी है। पानी की कमी और कीचड़ भरे गड्ढों में नहाने से पशुओं में चर्म रोग और संक्रमण बढ़ रहे हैं। पानी की कमी का सीधा असर मवेशियों की सेहत और उनके दुग्ध उत्पादन पर पड़ा है, जिससे पशुपालकों की आय घट गई है। नदियां सूखने के बाद पशुपालकों को पशुओं की प्यास बुझाने के लिए अब चापाकल (हैंडपंप) और निजी बोरिंग पर निर्भर रहना पड़ रहा है। मनोज यादव बताते हैं कि एक भैंस को दिन में कम से कम 80 से 100 लीटर पानी चाहिए। अगर हमारे पास 05 पशु हैं, तो 500 लीटर पानी रोज चापाकल चलाकर निकालना पड़ता है। यह शारीरिक रूप से बहुत थका देने वाला काम है। बिजली कटने पर मोटर बंद हो जाती है, तब संकट और गहरा जाता है। विकल्प के रूप में कुछ लोगों ने अपने खेतों में छोटे गड्ढे (डोभा) खोदे हैं, लेकिन भीषण गर्मी में वे भी सूख जाते हैं। अब ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं को पानी पिलाना एक फुल-टाइम जॉब बन गया है, जिसके कारण पशुपालक अन्य मजदूरी के कामों पर नहीं जा पा रहे हैं। गहराता संकट: आर्थिक और सामाजिक प्रभाव नवादा में पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। नदियों की इस हालत ने कई छोटे किसानों को पशु बेचने पर मजबूर कर दिया है। बाजार में पशुओं की कीमत गिर रही है क्योंकि खरीदार भी पानी के संकट से डरे हुए हैं। प्रशासन की ओर से अब तक पशुओं के लिए सार्वजनिक जलाशयों या विशेष जलकुंडों की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई है, जिससे असंतोष बढ़ रहा है।

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